तलाक की तीन पत्ती और भाजपाई जुआ

मैथिली में एक कहावत है : ” हारल नटुआ झुटका बीछय ” इसका हिन्दी भावानुवाद है कि गलियों में नाच नाच कर तारीफ़ बटोरने वाली और कद्रदानों के द्वारा उसके नाच पर लुटाए गये पैसे को इकट्ठा करके आराम से जीवन यापन करने वाली नचनियाँ ( नर्तकी ) अपने आयुगत ढलान के नैराश्यपूर्ण दिनों में अपने तदनुरूप उत्कृष्ट प्रदर्शन पर भी उचित तारीफ़ और उस प्रकार निछावर किये गये पैसे न पाकर गलियों में बिखरे मिट्टी के घड़ों के और खपड़ों के  टुकड़े बीनने लगती है।

शायद आप मेरे शब्दों में छिपे या इंगित हारी हुई हताश और बेवज़ह खुद को सत्ता की ढली हुई साँझ में पड़ी हुई मानने वाली नर्तकी को आप पहचान चुके होंगे और उसके द्वारा चुने जा रहे घड़े के टूटे टुकड़ों को भी।

शायद जवानी बुज़ुर्ग के अनुभव की अहमियत नहीं पहचान पाती है। मुनव्वर राना ने अपने एक शेर में लिखा है कि –

इश्क़ में राय बुज़ुर्गों से नहीं ली जाती
आग़ बुझते हुए चूल्हों से नहीं ली जाती॥

पर ज़वानी इस शेर पर गौर फ़रमाना भूल जाती है कि –

ये कल के छोकड़े आशिक़ मिज़ाज़ बनते हैं
किसी बुज़ुर्ग से पूछें कि आशिकी क्या है॥

क्योंकि सिर्फ़ अनुभव ही जानता है कि

” परवाना जल के शम्मा को बदनाम कर गया
हम खाक हो रहे हैं बड़े एहतियात से॥ “

ये एहतियात से खाक होने की कला सिर्फ़ अनुभव को आती है जोश या अदम्य उत्साह के जिम्मे धैर्य की सम्पदा शायद आती है। जोश और उत्साह किसी पर द्रवित होकर किसी ज़रूरतमंद पर छप्पड़ फाड़ कर धन तो बरसा सकता है पर उसकी अनुभवहीनता का ये परिणाम हो सकता है कि उस ज़रूरतमंद वो सारा धन उसी छप्पड़ के रिपेयरिंग में खर्च करना पड़े और वह वापिस वैसा हीं ज़रूरतमंद रह जाये।

आप सबको पता होगी वह कहानी जिसमें आधी रोटी अपने मुँह  में दवाए पुल पर से गुजरता एक कुत्ता जब अपनी परछाईं नदी के पानी में देखता है तो जो कुछ होता है उसके बारे में एक दोहा है – ” आधी छोड़ पूरी को धावै, आधी बचै न पूरी पावै।”

शायद आज भाजपा उसी दौर में आ गई है जिसमें परिस्थितियों के आगे विवश होकर वह सार्थक कदम उठाने के बदले राजनीति की गलियों से कंकड़ चुनकर राम सेतु बनाने की कोशिश कर रही है।

तीन तलाक की परंपरा के आगे उठाया जाने वाला सामाजिक सुधार का कदम भाजपा के सत्तासीन होने की वज़ह से धार्मिक मामलों में राजनैतिक हस्तक्षेप कई कोशिश से ज़्यादा कुछ भी नहीं बन पाई है।

यह तीन तलाक के विरुद्ध सरकारी विधेयक ज़्यादा दिन चल नहीं सकता क्योंकि एक तो राज्य सभा से स्वीकृति के बाद महामहिम के दस्तखत की दरकार होगी इसे पूर्ण कानून बनने के लिये जो कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में असंभव है क्योंकि वर्तमान सरकार अपनी जीत को स्पीड कर पाने में अक्षम दिख रही है और महामहिम को ४ साल और निकालने हैं, वहीं विपक्ष इस प्रस्ताव को भाजपा के द्वारा मुसलमानों के धार्मिक मामले में हस्तक्षेप बता कर उनका रहनुमा बनने का सफल प्रयास कर लेगी।

जिस महिला समाज से उसे उम्मीद है कि वह इसे अपने विजय के रूप में  देखकर अपना मत भाजपा को देगी यह भाजपाई दिवास्वप्न से ज़्यादा कुछ नहीं है। इसका कारण जानना आपके लिये बेहद ज़रूरी होगा।

पहला यह कि ३ तलाक़ मुसलमानों का आतंरिक मामला है जिसे लगभग सारी महिलाओं  ने तहे दिल से या दर से मंज़ूर कर लिया है। इस समाज में महिलायें हिन्दू समाज की तरह भ्रूण हत्या का शिकार कम हीं होती हैं। इसीलिये शायद ही आपको कोई मुसलमान कँवारा मिल जाये बल्कि चार शादियाँ तक मज़हबी तौर पर ज़ायज़ हैं…. वज़ह मुझे न बतानी हैं और न पूछनी। लड़कियाँ हैं तभी तो चार चार शादी संभव हैं वर्ना कई हिन्दू समाज में तो अनेक युवा वृद्ध होने के कगार पर हैं पर शादी नहीं हो पाई है और न होगी। उसपर से हिंदुओं में कुछ वामपंथी बुद्धिजीवी भी पलते हैं जो 377 डिग्री फ़ीवर से पीड़ित हैं और बेटे  के लिये दामाद और बेटी के लिये बहू ढूँढ़ने का भी पुरजोर समर्थन करते हैं।

जिस समाज में हर खाविंद को एक बीवी मयस्सर है और चुटकियों में 3 तलाक की गूँज उस मोहतरमा को पल में यतीमों या कहें बेवाओं की हालात में ला सकती है और अपने बच्चों की नज़रों से दूर कर सकती है आप उन खवातीनों से ये उम्मीद कैसे रख सकते हैं कि वे अपने खाविन्द की धमकियों को धता बता कर भाजपा को वोट देंगी? आप हिन्दुओं के समाज की महिलाओं से भी ये उम्मीद नहीं पाल सकते हैं।

अकलियतों के इस तबके में खवातीनों की इतनी तादाद मौज़ूद है कि ये अगर जाग जायें तो 3 तलाक कब तितर बितर हो जाये पता न चले, पर ये अकीदतमन्द और मज़हबपरस्त खवातीनें हक़-ए-मेहर के बदले निकाह कबूल करने को आसमानी फ़रमान मान लेती हैं। मर्दाना चौधराहट इस तबके की महिलाओं की रूह तक अपने कब्ज़े में कर चुका है, इसलिये एक आर्डिनेन्स पास करवा कर इनसे अपने पक्ष में मतदान करवा लेने का दिवास्वप्न पालना ख्वाब में भी भाजपा को भारी पड़ेगा ही और इसका नुकसान ये हुआ है कि कुछ बड़बोलों को अपोजिशन में वोट डालने से बेवज़ह शोहरत मिल गई और कुछ पार्टियों को बायकॉट करके भी इस समाज की सहानुभूति हासिल हो गई। इसलिये भाजपा 3 तलाक की तीन पत्ती खेलकर चुनावी जुआ जीतने का प्रयास छोड़ कर अब भारतीयों के पक्ष में पाञ्चजन्य का उद्घोष करे यही उचित है।

अकलियतों के इस तबके में खवातीनों की इतनी तादाद मौज़ूद है कि ये अगर जाग जायें तो 3 तलाक कब तितर बितर हो जाये पता न चले, पर ये अकीदतमन्द और मज़हबपरस्त खवातीनें हक़-ए-मेहर के बदले निकाह कबूल करने को आसमानी फ़रमान मान लेती हैं। मर्दाना चौधराहट इस तबके की महिलाओं की रूह तक अपने कब्ज़े में कर चुका है, इसलिये एक आर्डिनेन्स पास करवा कर इनसे अपने पक्ष में मतदान करवा लेने का दिवास्वप्न पालना ख्वाब में भी भाजपा को भारी पड़ेगा ही और…https://goo.gl/PXeWxf

अकलियतों के इस तबके में खवातीनों की इतनी  तादाद मौज़ूद है कि ये अगर जाग जायें तो 3 तलाक कब तितर बितर हो जाये पता न चले पर ये अकीदतमन्द और मज़हबपरस्त खवातीनें हक़ ए मेहर के बदले निकाह कबूल करने को आसमानी फ़रमान मान लेती हैं। मर्दाना चौधराहट इस तबके की महिलाओं की रूह  तक अपने कब्ज़े में कर चुका है इसलिये एक आर्डिनेन्स पास करवा कर इनसे अपने पक्ष में मतदान करवा लेने का दिवास्वप्न पालना ख्वाब में भी भाजपा को भारी पड़ेगा ही और इसका नुकसान ये हुआ है कि कुछ बड़बोलों को अपोजिशन में वोट डालने से बेवज़ह शोहरत मिल गई और कुछ पार्टियों को बायकॉट करके भी इस समाज की सहानुभूति हासिल हो गई। इसलिये भाजपा 3 तलाक की तीन पत्ती खेलकर चुनावी जुआ जीतने का प्रयास छोड़ कर अब भारतीयों के पक्ष में पाञ्चजन्य का उद्घोष करे यही उचित है।

भाजपा की अंटी में अब भी उसके अपने जमा किये गये काफ़ी सिक्के भरे पड़े हैं जिनकी खनक उसके पारम्परिक वोटर को लुभाने के लिये काफ़ी है। उसे विपक्ष के आँगन में जाकर झुटका बीछने की ज़रूरत ही नहीं। मँहगाई नियंत्रण, विवादास्पद मुद्दों को सुलझाने की ईमानदार कोशिशें, अपराधियों और भगोड़े कर्ज़दारों की घर वापसी करवा कर ऋण वसूली, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा में केन्द्रीय हस्तक्षेप द्वारा सुधार, अयोध्या-मथुरा-बनारस- आगरा अदि के राष्ट्रीय मुद्दों को क्षेत्रीय मुद्दा बना कर कलेक्टर लेवल पर इनके निपटारे की सुनियोजित प्रयास, सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता और अगर योजना विफल रही तो अपनी भूल स्वीकार करना आदि कुछ ऐसे मुद्दे हैं कि इनका निपटारा या निपटारे की ईमानदार कोशिश भी अगर भारतीय मतदाता को नज़र आ जाये तो ये मतदाता क्रोध से मतवाले होने के बदले चुनाव में मत-वाले बन सकते हैं और भाजपा की विजय अवश्यंभावी हो जायेगी।

पर इसके लिये भाजपा को कांग्रेस के दिखावटी हिन्दुत्व जैसा कोई भी अल्पसंख्यक तुष्टिकरण टाइप का कदम उठाने से बचना होगा। अपने पुरानी प्रतिज्ञाओं का स्मरण करना होगा। जोश के ऊपर अनुभव की लगाम लगानी होगी और सिकंदर की तरह विजेता का स्वरूप त्याग कर लोक कल्याणकारी रूप अपनाना होगा।

अगर बुद्धिजीवियों की तरह धर्मनिरपेक्ष दिखने की कोशिश की तो बस गीता का एक श्लोक याद कर लेना होगा कि –

“स्वधर्मे निधनम् श्रेयः पर धर्मो भयावहः”

और हो सकता है कि पूर्ण हिन्दुत्व और धर्मनिरपेक्षता रूपी अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के दो नावों पर अपना दोनों पैर रख कर कांग्रेसी तरीके से चुनावी नदी पार करने की कोशिश में भाजपा को शायद यह शेर न दुहराना पड़ जाये कि –

ना ख़ुदा ही मिला ना विसाल ए सनम
न इधर के रहे ना उधर के रहे॥

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