हिन्दू एकजुट न हो जाएं, बस इसलिए ही वे ‘फिलहाल’ शांत हैं

यह लेख कुछ अलग बात करता है।

नीचे दिए गए वीडियो को देखने जाएँ तो इसमें एक पाकिस्तानी गायिका सरवत है और पाकिस्तानी चैनल जियो टीवी के स्टुडियो में भारतीय फिल्म ‘ज्वेल थीफ’ का प्रसिद्ध गीत ‘होठों पे ऐसी बात’ प्रस्तुत कर रही है।

सनद रहे कि यह Geo टीवी है, Jio नहीं है। गायन अपने आप में बुरा नहीं है और जिस तरह से भारतीय म्यूज़िक को वहाँ सराहा जाता है, देखकर अच्छा भी लगता है लेकिन यहाँ आप का ध्यान कुछ अलग चीज की ओर आकर्षित कर रहा हूँ।

यह एक लाइव रिकॉर्डिंग है और यहाँ साथ के वादकों पर भी अच्छा फोकस किया गया है, मुझे इसी बारे में कुछ अलग बात करनी है। कृपया धैर्य रखकर आगे पढ़ें, शायद यह पहलू किसी ने आज तक आप के सामने नहीं रखा है।

मेरी आप से विनती है कि आप केवल वादकों पर कॉन्संट्रेट कीजिये, गायिका या ऑडियन्स पर नहीं। चाहे तो उसके लिए वीडियो दुबारा देखिये क्योंकि यह बात महत्व की है।

अब आप बताइये – जब आप कोई गाना सुनते हैं जहां ताल का बढ़िया प्रयोग किया गया है – क्या आप की उँगलियाँ अपने आप ताल बजाने नहीं लगतीं?

अगली बात, आप हर ताल (beat) पर बजाते रहेंगे, भले ही तालवाद्य बदल गया हो और उसका ताल भी अलग हो।

जैसे कि आप इस वीडियो में देखेंगे कि डफ, मृदंग, ढोलक और तबला तरंग इतने तो दिख ही रहे हैं और मेटल ट्रायंगल तथा एक और चर्मवाद्य भी सुनाई दे रहा है।

लेकिन आप बिना रुके ताल बजाते रहेंगे। क्योंकि आप श्रोता है, आप के ताल बजाने से कोई कहीं डिस्टर्ब नहीं होता। लेकिन ज़रा वादकों को देखिये, हर कोई अपना नियत टुकड़ा ही बजाकर शांत रहता है अगले नियत अवसर तक।

और तो और, यहाँ आप ने देखा होगा कि कोई कंडक्टर नहीं है और ना ही किसी के सामने नोट्स (Score) हैं जो बता देती हैं कि उस वादक को कहाँ बजाना है।

क्या उनकी उँगलियाँ थिरकती नहीं होंगी? वे तो संगीतज्ञ हैं, आप से अधिक जानकार हैं और जहां मुख्य गायक या वादक कहीं कोई बेहतरीन ‘जगह’ लेता है, क्या उनको “वाह!” कहने का मन नहीं होता होगा? लेकिन वे ऐसा हरगिज़ नहीं करते और अपने ही ‘पीस’ की प्रतीक्षा में एकाग्रचित्त रहते हैं। क्योंकि जरा सी चूक पूरा performance बिगाड़ देती है। वे यह जानते हैं।

अगर हम एक सैनिकी ऑपरेशन से इनकी तुलना करें, तो शारीरिक क्षमता का भाग छोड़ दें तो अनुशासन और ‘प्रोग्राम’ के प्रति समर्पण कहाँ कम या अलग है? सैनिकी ऑपरेशन भी एक प्रोग्राम ही होता है जहां हर किसी को नियत समय पर अपना अपना रोल निभाना है। बस हम ये तुलना करने की दृष्टि नहीं रखते।

2019 के लिए हम युद्धरत हैं। यहाँ मैं गिरोह के वोटिंग या अन्य गतिविधियों की तुलना ऐसे बैंड या सैनिकी ऑपरेशन से करूंगा। समस्याएँ उनकी भी हैं लेकिन अपने लक्ष्य के लिए वे प्रतिबद्ध हैं। उनको वे सरकारें चाहिए जो उनको खुली छूट दें। अभी वे शांत हैं तो दो कारण हैं। एक तो हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण होगा, और बड़ी मेहनत से काँग्रेस और वामी थिंक टैंक्स ने हिन्दू वोट को जातियों में बिखेर दिया है, नोटा का खोटा ऑप्शन परोसकर नुकसान भी करा दिया है। इसलिए वे नहीं चाहते कि वे अभी ऐसा कोई काम करें जिससे हिन्दू वोट फिर से एकजुट हो।

बाकी कमलनाथ का वीडियो आप ने भी देखा होगा जहां वो सीधा कह रहे हैं कि ‘बाद में निपट लेंगे लेकिन तब तक बरदाश्त करना होगा’। विश्वास कीजिये, मप्र में लोकसभा चुनाव तक वो दंगा नहीं होने देंगे क्योंकि लोकसभा में उन्हें केंद्र में काँग्रेस सरकार लानी है। अगर वो इस दुष्ट हेतु में सफल हुए तो फिर जिस तरह से निपटने देंगे, आप सोच भी नहीं सकते।

कई सालों पहले एक इज़राएली महिला सैनिक का वीडियो देखा था। वो कहती है कि आज हम शस्त्र चलाने की ट्रेनिंग लेती हैं, सैनिकी अनुशासन की आदत है वह हमारे बच्चों के भविष्य के लिए आवश्यक है। ताकि हमारे बच्चों के लिए अपना देश बचा रहे जहां वे स्वतन्त्रता से निर्भय जी सके।

बाकी हम तो खुद को भगवान नीलकंठ के अवतार समझते हैं शायद… कि हलाहल के साथ सदियों से जी रहे हैं तो हमने हलाहल को पचा लिया है। भ्रम से बाहर आइये और ज़मीन कैसी कुतरी जा रही है ज़रा इसपर भी ध्यान दीजिये। धंधे कैसे छीने जा रहे हैं यह भी देखिये।

यहाँ मैं दोहरा रहा हूँ, गिरोह अपने ध्येय को समर्पित है, उनको वो सरकार चाहिए जो उनको अपना लक्ष्य पूरा करने को खुली छूट दें। हम भले ही कहते रहे हैं कि काँग्रेस उनको भी कम नहीं पीटती, लेकिन जवाब में एक ही बात कहूँगा – जब भी उनके सहारे सत्ता पायी गयी है, हिंदुओं ने ज़मीन खोयी है। छिटपुट यहाँ वहाँ, समझ नहीं आया तत्काल, लेकिन अब परिणाम दिखाई दे रहा है।

काँग्रेस को इस देश से केवल लेना रहा है, देश को देना केवल समस्याओं की विरासत है। और हाँ, ब्यूरोक्रेसी से देशभक्ति की आस न रखें। अपवाद सर्वत्र होते हैं, लेकिन अगर ये बाबू लोग देशभक्त होते तो अपने बच्चों के लिए देश रहने लायक बनाते, उतनी शक्ति तो सिस्टम में हमेशा रही है।

आप देखिये, कितने मिलेंगे जिन्होंने अपने बच्चों को विदेशों में ही सेटल किया है और कितने मिलेंगे जिन्होने बच्चों को अपने दम पर देश में ही अपना भविष्य बनाने दिया है? ‘अपने दम पर’ का अर्थ है बच्चों के अपने दम पर, बाप के दम पर नहीं।

लोकतन्त्र के और एक खंभे को लेकर भी कहने के लिए बहुत है लेकिन कहना गुनाह बना दिया गया है उन्होने ही, इसलिए उनको लेकर ॐ शांति।

नोटा के बारे में झूठ बोलकर तो जो किया गया वह दिख ही रहा है। सेल्समैनशिप जब सिखाई जाती है तो इस बात पर ज़ोर दिया जाता है कि बेचने का दबाव न डालो, ग्राहक को हमेशा यही लगना चाहिए कि उसने जो खरीदा है वह उसने न केवल अपनी मर्ज़ी से खरीदा है बल्कि उसके खरीदने में सेल्समैन का कोई रोल ही नहीं था, वह पूरी तरह उसका अपना डिसीज़न था। जो सेल्समन इस तरह बेच सकता है – not selling but making the customer buy – वही अच्छा सेल्समैन माना जाता है।

आज दो शब्द प्रचलित हैं – नोटासुर और नोटावीर। दोनों एक नहीं है, दोनों में फर्क है। नोटासुर सेल्समैन है, नोटावीर ग्राहक। नोटासुर मारीच है, नोटावीर सीता। बाकी यहाँ रावण की माँ को ताड़का भी कहा जाता है।

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