गिद्ध-लकड़बग्घे तो शायद कुछ छोड़ दें, ‘वे’ सारा चाट जाते हैं हड्डी, चर्म समेत!

मैं कई बार सोचता कि ह्रितिक रोशन, करण कपूर, जुगल हंसराज जैसे सुदर्शन पुरुष फिल्मों में क्यों नहीं चले?

मुझे अभिनय क्षमता का कारण न देना, क्योंकि जो प्रस्थापित ठूंठ सुपरस्टार हैं उन में इस क्षमता का होना दिखाई कम ही देता है!

मेरे आंकलन से इस का कारण बस यही है, कि आम जनता को अपने से कुछ अलग दिखने वाले लोगों से लगाव जोड़ने में असहजता होती है।

जो बात अभिनेताओं की, वही नेताओं की!

बस यही कारण है कि लालू जैसे भयानक भ्रष्ट व्यक्ति ने अपनी राजनीति की शुरुआत में बड़े ज़ोरशोर से साइकिल पर कार्यालय जाना, पाइप के पानी से गरीबों के नंग-धडंग बच्चे नहलाना, आम आदमी की भाषा में अनाड़ी की तरह बात करना…. सारे ढकोसले उस ने इस तरह प्रस्थापित किए कि आज तक बिहार के पदेच्छु नेता गरीबों के बच्चों के टट्टी-सने पिछवाड़े धोना, उन के गलियों के रस्ते बुहारना वगैरह सुतियापे में लगे हुए हैं।

लेकिन इस सादे मनोवैज्ञानिक तत्त्व के कारण बिहार की जनता पिछले दो दशकों से भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी की चरम सीमाएं देख रही है, पिसी जा रही है, अपनी संतानों को दो कौड़ियों के लिए हड्डियां पिसाने दूर देश भेज रही है!

आज वही बात देश के प्रधानमंत्री के बारे में हो रही है।

नरेंद्र मोदी कहने को तो आम निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से हैं, पर उन का परिवार उन के साथ न होने के कारण प्रसार माध्यमों की चकाचौंध से दूर ही रहता है, उस पर विचार करने के लिए कोई बाध्य नहीं होता।

नरेंद्र मोदी आजकल जनता से मिलाप वाला सीन नहीं कर पाते, सुरक्षा कारणों से। न ही उनका काम से अधिक वार्ता परिषद् कर ढिंढोरा पीटने का स्वभाव है। उनके काम का 80 प्रतिशत सीधे जनता से सम्बन्ध नहीं रखता, भले ही वह देश के लिए कितना ही महत्त्वपूर्ण हो।

ऊपर से उन के कोट, अम्बानी-अदानी वगैरह से सम्बन्ध वगैरह का सतत उल्लेख कर, ‘चौकीदार ही चोर है’ का घोष कर, राफेल जैसे फालतू स्कैम पैदा कर काँग्रेस उन के प्रति जनता में अविश्वास का वातावरण पैदा करने का प्रयास करने में नहीं चूकती है।

इसके विपरीत भाल पर चन्दन, त्रिपुण्ड लगा कर, मंदिर-मंदिर घूम कर, कोट के ऊपर जनेऊ पहन कर, कौल दत्तात्रेय गोत्र (!) का ब्राह्मण होने का दावा कर, फटे कुर्ते दिखा कर, सूती साड़ियाँ पहन कर, देश के लिए अपने यतीम-बेवा होने का बार बार उल्लेख कर काँग्रेस का प्रथम परिवार देश की जनता का हिस्सा होने की बात उसे जता रहा है।

सच्चाई तो यह है कि पिछले सौ-डेढ़ सौ वर्षों से इस परिवार का मध्यमवर्गीय होने से जो एकमात्र सम्बन्ध है, वह है सोनिया गांधी उर्फ़ एंटोनिया माइनो का कुछ पचास वर्ष पूर्व एक मध्यमवर्गीय इतालवी परिवार से होना है।

मोतीलाल नेहरू के तो कपड़े धुलने पैरिस भेजे जाया करते थे। अकूत संपत्ति के मालिक मोतीलाल नेहरू के लाल जवाहर ने कभी अपने निर्वाह के लिए कष्ट नहीं उठाए। अपनी संपत्ति के कारण काँग्रेस के कार्यकलापों में बिना उदरनिर्वाह की चिंता किए लगे रह सके, और अन्य सारे नेताओं के आधार की जड़ें खोद कर उन्हें निकाल बाहर करते रहे।

राजीव, संजय देश के प्रथम परिवार की बिगड़ैल संतानें थीं। उन्होंने एक क्षण के लिए भी, गरीबी तो छोड़िए, मध्यम वर्ग के माहौल का परिचय न था। पिछले 50 वर्षों से सोनिया गाँधी ने भी कभी ज़मीन पर नंगे पाँव रखे नहीं होंगे। उन से अगली पीढ़ी के तो क्या कहने! पुश्तैनी सामंत है यह परिवार!

इस पृष्ठभूमि पर उन का मोदी को जनता से कटा बताना, और खुद को आम आदमी के करीब बताना एक बड़ी साज़िश का परिचायक है, जिसके परिणामों को हम छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान के चुनाव नतीजों में देख चुके हैं।

हमें चाहिए कि जहां जहां काँग्रेसी प्रचार तंत्र अपने ‘गोएबल्स जैसे’ हथकंडों से देश की जनता को मोदीजी के प्रति दुर्भावना पैदा करने का प्रयास करे, वहां वहां हम उन प्रयासों को उस से दस गुनी शक्ति से परास्त करें!

वर्ना तैयार रहें, अपनी संतानों को हड्डियां पिसवाने किसी दूर देश भेजने के लिए, क्योंकि गिद्ध और लक्कड़बग्घे शायद भक्ष्य का कुछ बाकी छोड़ते होंगे, काँग्रेसी सारा चाट जाते हैं – हड्डी, चर्म समेत!

अतः सावधान मित्रो!

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