पता नहीं क्यों कुछ तथ्यों की अनदेखी कर जाते हैं, मोदी सरकार के आलोचक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करते हुए किसी लेख के कमेंट में एक मित्र ने मुझे टैग करते हुए मेरी राय पूछी।

सामान्यतः मैं ऐसे जवाब देने से बचता हूँ क्योंकि समय का अभाव है और मष्तिष्क में बहुत से ऐसे विषय उमड़ते रहते है जिन पर लिखने का मन करता है।

लेकिन कुछ समय से ऐसी आलोचना से युक्त लेख देख रहा हूँ. अतः, प्रतिउत्तर आवश्यक है।

उक्त लेख का सार यह है कि –

  • मोदी-शाह ने संगठन पर अपना एकछत्र नियंत्रण स्थापित कर लिया
  • समस्याओं से घिरे इस देश को नीयत से बढ़ कर परिणामों की अपेक्षा थी जिसमें मोदी विफल रहे
  • नोटबन्दी झंझावाती परिणाम लेकर सामने आई और साथ ही, इसने बैंकिंग सिस्टम की कलई भी उतार दी
  • क्रियान्वयन की जटिलताओं के कारण GST छोटे और मंझोले व्यापारियों की अंतहीन परेशानियों का सबब बन गया
  • मोदी, इंदिरा गांधी से सीख ले सकते थे जो प्रतिभाओं का सम्मान करती थीं और उन्हें कार्य करने की स्वतंत्रता भी देती थीं
  • कौशल विकास योजना का भ्रामक नारा दलित, पिछड़ों और ग्रामीण युवाओं के प्राइवेट नौकरियों में प्रवेश में सहायक नहीं बन सका
  • मोदी राज में इन नकारात्मक शक्तियों ने जम कर उत्पात मचाया और देश को सांस्कृतिक विभाजन के रास्ते पर धकेला
  • नरेंद्र मोदी अपने नीतिगत निर्णयों और कार्यकलापों में कॉरपोरेट शक्तियों द्वारा संचालित होने का आरोप झेलने लगे; इत्यादि, इत्यादि…

सर्वप्रथम मुझे सबसे ज्यादा इस बात ने अचंभित किया कि इस लेख में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विशिष्ट उपलब्धियों को पूरी तरह से इग्नोर कर दिया गया है, जैसे –

  • जम्मू कश्मीर को छोड़कर शेष भारत में नगण्य आतंकवादी घटनाएं
  • महंगाई पर पूरी तरह से नियंत्रण
  • भारत सरकार में भ्रष्टाचार पर लगाम
  • स्वच्छ प्रशासन
  • स्वतंत्रता के बाद पहली बार गरीबों का आर्थिक सशक्तिकरण
  • प्रत्येक गांव में बिजली, निर्धनों के लिए घर, शौचालय, गैस कनेक्‍शन
  • राष्ट्रीय सुरक्षा का सुदृढ़ीकरण
  • अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में भारत और प्रधानमंत्री मोदी का सम्मान; इत्यादि, इत्यादि…

क्या इन उपलब्धियों को संज्ञान में लिए बिना मोदी के कार्यकाल का उचित आंकलन किया जा सकता है?

अब बिंदुवार जवाब।

सर्वप्रथम, मोदी-शाह के नियंत्रण की आप आलोचना करते हैं, लेकिन पिछली सरकार में सिर्फ एक महिला, वह भी विदेशी और सत्ता के बाहर, का पूरी सरकार और पार्टी पर नियंत्रण था। अगर पश्चिमी बंगाल देखें तो वहां पर भी एक महिला का नियंत्रण है। तमिलनाडु में पहले जयललिता का नियंत्रण था; उत्तर प्रदेश में मायावती का नियंत्रण था, बिहार में लालू और अब नितीश का। और भारत जैसे जटिलताओं से भरे देश में आप किस प्रकार की सत्ता चाहते हैं? क्या 20 लोगों की कमेटी प्रधानमंत्री पद और पार्टी को सुशोभित करे? कैसा मॉडल चाहते हैं?

दूसरा… क्या बिना सही नीयत के सही परिणाम निकल सकते हैं? कौन से परिणाम में मोदी विफल रहे हैं? भारत में 130 करोड़ लोग रहते हैं। मोदी ने सिर्फ साढ़े चार वर्ष सत्ता संभाली है। जिन लोगों ने 60 वर्ष तक शासन किया, क्या परिणाम दिया उन लोगों की सरकारों ने? क्या पश्चिमी बंगाल जहां कम्युनिस्टों का शासन रहा है वहां से गरीबी गायब हो गयी? या केरल में अल्पसंख्यकों के नाम पर की जा रही सांप्रदायिक राजनीति का दमन हो गया है? या बिहार के लोगों ने अन्य राज्यों में जीवनयापन ढूंढना बंद कर दिया है?

तीसरा… क्या नोटबंदी के बिना सरकार अपना टैक्स का आधार बढ़ा सकती थी? कैसे पता चलता कि किसके पास कितना पैसा दबा हुआ है? वह सारा पैसा बैंकों में वापस आ गया है। अगर बैंकों की कलई खुल गई तो क्या इस कारण यह कदम नहीं लेना चाहिए था? जो पैसा बैंकों में वापस आया है क्या उस पर टैक्स नहीं मांगा जा रहा है?

चौथा… छोटे व्यापारियों को कंपोज़िट स्कीम के अंतर्गत जीएसटी रिटर्न फाइल करने में काफी सुविधा दी गई है। देखते, देखते अधिकतर व्यापारियों ने जीएसटी का रिटर्न फाइल करना समझ लिया है। इनसे समस्या केवल उन्हीं व्यापारियों को है जो कर चोरी नहीं कर पा रहे हैं। वैसे, उत्सुकतावश मैं यह जानना चाहता हूँ कि छोटे और मंझोले व्यापारियों की अंतहीन परेशानियों से निपटने के लिए आपके पास क्या सुझाव है? सुझाव भी ऐसे कि कर की चोरी रुक जाए और सरकार को राजस्व भी मिल जाए।

पांचवा… इंदिरा गांधी ने किन प्रतिभाओं का सम्मान किया था और किन्हे कार्य करने की स्वतंत्रता दी थी, जरा कुछ नाम बताएँगे। RBI के पूर्व गवर्नरों – बेनेगल रामा राव, एस जगन्नाथन, के आर पुरी और आर एन मल्होत्रा को किसने और क्यों हटा दिया? एमरजेंसी में किसको स्वतंत्रता मिली थी? कितनी राज्य सरकारों को बहुमत के बाद भी बर्खास्त कर दिया गया? इंदिरा गाँधी को 1971 के चुनाव में भ्रष्टाचार का दोषी पाया गया था जिसके बाद उन्होंने बाद में देश में इमरजेंसी घोषित कर दी थी। वैसे प्रधानमंत्री बनने की उनकी स्वयं की क्या योग्यता थी? यही ना, कि वे प्रधानमंत्री नेहरू की पुत्री थी।

छठा… आपको क्यों लगता है कि सरकार उन खाली पड़े पदों को भरकर वाहवाही नहीं लूट रही है? सबसे आसान कार्य है खाली पड़े पदों को भरना। लेकिन अगर उन खाली पदों की आवश्यकता ही ना हो, तो? या फिर, वे पद मुलायम, लालू एंड कंपनी ने अपने भाई-बंधुओं को नौकरी देने के लिए हाल ही क्रिएट किये हों जिनकी वास्तव में कोई आवश्यकता ही ना हो और एक तरह से वे सभी पद हमारे टैक्स की बरबादी हों?

अगर भारत में इतनी बेरोज़गारी है तो प्रधानमंत्री मोदी के आने के बाद ‘बेरोज़गार’ युवाओ ने समूचे भारत में एक भी बड़ा प्रदर्शन क्यों नहीं किया? इतनी अधिक संख्या में राजमार्ग, जलमार्ग, बंदरगाह, एयरपोर्ट, बिजली की लाइने और संयंत्र, घर, टॉयलेट बन रहे हैं। डिजिटल इकॉनमी, सॉफ्टवेर इंडस्ट्री, ऐप्प्स, सेल फ़ोन, ओला और उबेर टैक्सी, Airbnb, ऑनलाइन शॉपिंग, इलेक्ट्रिक कार, सर्विस सेक्टर (ब्यूटी पार्लर, स्वास्थ्य, वकील, रेस्टोरेंट, ट्रासपोर्ट, mass media, विज्ञापन, प्रॉपर्टी इत्यादि) में वृद्धि हो रही है; अरबों खरबों की इकॉनमी हो गई है।

इसमें किसे रोज़गार और जीवनयापन मिल रहा है? चीन से आये लोगों को? 13 करोड़ लोगों को उद्यम के लिए मुद्रा लोन मिले हैं; क्या वह सब उड़ा दिए गए हैं? खेती के लिए 600 रुपये प्रति दिन पर भी मजदूर नहीं मिल रहे हैं और आप कह रहे हैं कि बेरोज़गारी है। अगर सरकार 3 लाख से अधिक कंपनियों को रातोंरात बंद कर दिया है तो उन में नौकरी कर रहे लोग विरोध क्यों नहीं कर रहे हैं?

सातवां… देश को सांस्कृतिक विभाजन के रास्ते पर धकेलने के पक्ष में क्या आधार है आपके पास? क्या प्राकृतिक संसाधनों पर अल्पसंख्यक समुदाय का पहला अधिकार बोलने से सांस्कृतिक एकता को बढ़ावा मिलता? या फिर, पश्चिमी बंगाल में दुर्गा पूजा में बाधाएं डालना, केरल में खुले आम गाय काटना, समुदाय विशेष का तुष्टिकरण करना, केरल के ईसाई प्रोफेसर का कुछ मुस्लिमों द्वारा हाथ काटने और मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को बढ़ावा ना देने से सांस्कृतिक एकता मजबूत हो रही थी?

कमलनाथ जब समुदाय विशेष से 90 प्रतिशत वोट डालने को कहते है तो वह सांप्रदायिक सौहार्द्र का उत्तम उदहारण है? क्या यह तथ्य नहीं है कि सोनिया सरकार के समय में ‘उनके’ NGO एक कानून ला रहे थे जिसमें सभी दंगों के लिए हिन्दुओं को दोषी ठहराया जाना था? क्या यह ‘सकारात्मक’ शक्तियों का कार्य है?

आठवां… आरोप तो कोई भी लगा सकता है। मैं भी कह सकता हूँ कि राहुल गाँधी और कम्युनिस्ट, कॉरपोरेट शक्तियों के इशारे पर मोदी सरकार को बदनाम कर रहे हैं जिससे उन्हें लोन ना चुकाना पड़े। क्या यह तथ्य नहीं है कि मोदी सरकार ने इन्ही कॉरपोरेट घरानों के मुंह में हाथ डालकर अब तक तीन लाख करोड़ रुपये निकाल लिया है?

क्या यह तथ्य नहीं है कि पूर्व सरकारों के समय बजट में गोपनीयता के नाम पर उद्योगपतियों के वारे-न्यारे कर दिए जाते थे? क्या यह तथ्य नहीं है कि मोदी सरकार ने सवा तीन लाख से ज्‍यादा संदिग्‍ध कंपनियों का पंजीकरण रद्द कर दिया है? जिन कॉरपोरेट शक्तियों की आप बात कर रहे हैं, क्या उनका सृजन नरेंद्र मोदी ने किया है?

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