नारी सुरक्षा और बिजली

बात 2013 के अंत की होगी। मैं मुम्बई रहता था तब। बॉस से ऐसे ही बातें चल रही थी। गुज्जु थे, थोड़े दिनों पहले ही दिल्ली से जॉब के कारण मुम्बई शिफ्ट हुए थे। नारी सुरक्षा की बात आई। मुझे मुम्बई में लगभग 3 साल हो ही चुके थे, हम बस फट पड़े कि कैसे मुम्बई औरतों के लिए बहुत सेफ है, और दिल्ली की तो इस हालत खराब है।

वैसे फटने जैसी बात भी नहीं, फैक्ट भी ये ही है। मुम्बई में मैंने लड़कियों को रात 2 बजे भी अकेले टैक्सी में घर आते देखा है। और दिल्ली के हाल किसी को समझाने की ज़रूरत नहीं।

तब बॉस ने एक ऐसी लॉजिकल बात कही, जिसने सोचने पर मजबूर कर दिया। मुंबई एक vertical island है, जहां जगह की भारी कमी है। कहीं भी आपको अंधेरा या सुनसान नहीं मिलेगा। लगभग हर वक़्त, हर जगह कोई न कोई मिल ही जायेगा। जबकि दिल्ली लंबी भी है, और चौड़ी भी। कई हिस्से ऐसे मिलेंगे जो रातों में अंधेरे भरे, सुनसान होंगे जहां आपको कुत्ते तक नहीं नजर आएंगे।

मान लीजिए, लड़की अकेली क्या, किसी के साथ भी ऐसे किसी एरिया से निकले तो भी रिस्क बना ही रहता है। उदाहरण के लिए इतनी सुरक्षित मुंबई में भी शक्ति मिल्स रेप केस हुआ था जिसका कारण एकदम सुनसान होना ही था।

उस चर्चा के 2 साल बाद मेरा गुड़गांव ( दिल्ली NCR) शिफ्ट होना हो गया। और मैंने ऊपर लिखे कथन को एकदम सत्य पाया। अधिकांशतः मुम्बई के नौकरीपेशा होकर सीधा सरल होना और दिल्ली के ‘तू जानता नहीं, मेरा बाप कौन है’ वाले सतही तौर पर दिखने वाले फर्क को एक बार दरकिनार करें तो आप पाएंगे, दिल्ली NCR के काफी इलाके रात को एकदम घुप्प अंधेरे में होंगे।

नोएडा जैसे शहर में तो हालात और भी खराब है। महीने भर पहले नोएडा गया था तो मेट्रो स्टेशन से 10 किलोमीटर दूर मेरे गंतव्य तक कई जगह स्ट्रीट लाइट्स तक नहीं थी। अगर कोई गनपॉइंट पे पास पड़े लैपटॉप, पर्स, फ़ोन क्या, ‘कुछ’ और भी कर लें तो आप कुछ नहीं कर सकते। अभी कल ही NCR में एक गिरोह पकड़ा गया है जिसने ऐसी 120 डकैतियां करनी स्वीकार की हैं। बाकी NCR में आए दिन कैंडल मार्च निकलते रहते हैं।

अब हम महानगरों को छोड़ गांव की तरफ आते हैं। समाज की बेटियों को आज भी रात में शौच के लिए घर से दूर जाना पड़ता है। हर मर्द बलात्कारी नहीं होता पर घने अंधेरे में कई नरपिशाच तो ऐसी फिराक में रहते हैं कि कब कोई बाहर निकले।

ये याद रखिये, जितनी क्राइम रेट रिपोर्ट होती हैं उससे ज्यादा ही क्राइम होता है। जो रसूखदार होते हैं, वो अपने स्तर पर ही निपट लेते हैं जबकि गरीब वंचित हैं उनकी कई बार सुनवाई ही नहीं होती। 12 – 15 साल की बच्चियों के साथ होती दुर्घटनाओं के कारण लड़कियां माँ-बाप के लिए बोझ बन रह जाती है, जिसकी परिणीति कम उम्र की शादी में होती है, जहां घरवालों समझते हैं कि वो निवृत्त हुए, आगे की जिम्मेदारी पति की है।

ऐसे में अगर हर एक ग्रामीण घर में बिजली और शौचालय पहुँच पाए तो शायद कितनी ही बच्चियों को ये दंश ना झेलना पड़े। ये पहले शायद किसी ने सोचा नहीं, और अब जब ऐसा किसी ने सोचा तो जिनके पास पहले से हैं, उन्हें ये शिकायत हैं कि इससे हमें क्या।

हमारी अपनी बच्चियों के साथ जब बलात्कार होता है, तब हम उन्हें ‘निर्भया’ जैसा आलंकारिक नाम तो दे देते हैं, पर कोई उन्हें जाति नहीं दे पाता, वही जाति जिसके आधार पर हम हमारा सब कुछ निर्धारित करते हैं। बाकी, कैंडल मार्च से सहानुभूति मिल सकती है, सुरक्षा नहीं।

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