इन बंद कमरेवालों को भी भीतर से समझो, जीवन में इनके भी संघर्ष है

आज से पहले मेरे द्वारा कभी सोचा नहीं गया था कि एक ऐसे बंद कमरे में जीवन सम्भव है, जिसकी ट्यूबलाइट की सफेद रोशनी में ही हम धूप जी लेते हों, और बंद करके रात को महसूस कर लेते हों।

जिस कमरे की दीवारें दिन-रात चिल्लाती रहती हो तुम्हें अफसर बनना है, किताबों के पन्नों पर पिता की मेहनत का पैसा दिखता है, वो पैसा जो दांव पर लगाया गया है इस उम्मीद के साथ कि हमारा कल कलरफुल हो।

ऐसे कमरे में जो जीवन है, बस वही जीवन है, वही तपस्या है, वही त्याग है, वही समर्पण है, वही दुनिया है।

हम मध्यमवर्ग के लोग हैं, हमें पिता द्वारा प्रत्येक महीने पर उनकी तनख्वाह का एक चौथाई हिस्सा पहुंचा दिया जाता है, हमारे माथे पर आर्थिक सामाजिक, मानसिक सभी रुपों में चिंता रहती है, और इसके साथ साथ ही हमें पढ़ना होता है।

समाज का प्रतिनिधित्व करने वाला एक हिस्सा हमें गरियाने के लिए ही बना होता है, जो हर बार हमारे घर जाने पर कह देता है कि तुम अबे तक नौकरी नही लगा पाए, बगल के शर्मा जी को लड़का बाबू बन गया, भले बाबू को बनने में 10 साल लगे हो, किन्तु हमारे समाज में “चमत्कार को नमस्कार” करने की परंपरा है।

हमें एक साल बाद ताने बाते सुनना होती हैं और उन्हें अनसुना करके पढ़ना होता है, मेहनत करनी होती है, एक सीमित समय में कुछ करके ही दिखाना होता है।

गर हम सफल होते हैं तो प्रसंशा की झड़ी लगेगी, अरे बहुत मेहनत करता था वो, हमें तो पहले ही पता था, और असफल होने पर वही समाज कह देता है कि अरे उनके बेटे ने बाहर रहकर सिर्फ जवानी की रातें रंगीन की है – इश्क में फंस गया होगा तबही तो आ गया बिना कुछ किये, अब चलाएगा हल खेतों में, और तरह तरह की गोपनीय टिप्पणियों से हमको नवाजा जाता है।

आसान नहीं होता है बाहर पढ़ने वाले का जीवन, हमारा कर्तव्य है मेहनत करना, फल एवं साथ देना ईश्वर का काम है।

हम कुछ बनते हैं तो अपने माँ बाप के लिये, हम असफल होते हैं तो अपने माँ बाप के लिए, माँ बाप हमें हर स्तिथि में मंजूर करते हैं।

समाज और सोसायटी वाले गरियाएँगे! गरियाना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। हमें अपना लक्ष्य देखना है, उन्हें अनसुना करना है क्योंकि हमारे असफल होने पर कोई दुई पैसा देने नहीं आता हमें।

इन बंद कमरे वालों को भी भीतर से समझो, जीवन में इनके भी संघर्ष है।

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