पकोड़ा महात्म्य, मज़ाक और फूड जिहाद

पकोड़े भारत में सभी जगह बनाए जाते हैं। इसमें वेरायटी लगभग अनगिनत कह सकें इतनी है। हर प्रदेश, राज्य, जिला, समाज, जाति की अपनी अपनी खासियत है। पकोड़ा अक्सर चटनी के साथ खाया जाता है और इसकी भी वेरायटी उतनी ही हैं।

जिसे स्वाद का सेंस हो ऐसा कोई भी व्यक्ति – महिला ऑफ कोर्स प्रथम, लेकिन पुरुष भी – मात्र नमक के प्रकार के बदलाव और उसमें भी मिक्स्चर और मात्रा के बदलाव से भी कई वेरायटी सृजित कर सकता है।

बाकी अपने यहाँ मसालों की भी इतनी वेरायटी है, हल्की सी इसकी उसकी चुटकी तो हर सुगृहिणी का माँ या सास से विरासती सीक्रेट होता ही है। सास भी देती ही है बहू को, क्योंकि आखिर वो भी एक माँ है और उसे अपने बेटे की फिकर होती है कि उसे माँ के हाथ का स्वाद मिलता रहे। अस्तु।

मुद्दा यह है कि यह एक वाकई कमाई कराने वाला रोज़गार है और कई लोग इसमें धाकड़ कमाई कर ही रहे हैं। इतनी, कि इन्कम टैक्स वालों के भी नज़र में आ गयी और उनका नज़र रखना निराधार नहीं था, बड़ी रोकड़ मिल गयी।

IIT और IIM से MBA में कुछ लाख खर्च कर के टाई लगाकर हल्दीराम के पकोड़े सेव बेचने हैं या खुद ही एक एम्प्लायर बनना है, यह आप के हाथ है।

फूड जिहाद की बात करें तो कभी आँखें खोलकर अपने आस पास देखिये, खाने का स्वरूप क्या हो गया है, आप क्या खा रहे हैं और खाना कहाँ से आ रहा है। आप के पैसों का फायदा किसे हो रहा है यह भी देखिये।

ज़कात में सरकार पलट कर इस्लामी सरकार लाने के लिए जो प्रयत्नशील होते हैं, लड़ते हैं उनका भी हिस्सा होता है, यह जानकारी मैं समय समय पर आप को देते रहता हूँ, सबूत के साथ, पता है ना?

ऐसे ही देखेंगे तो पारंपरिक व्यवसाय हिंदुओं से छीनने के लिए काँग्रेस की सहायता से कम्युनिस्टों ने शिक्षा के नाम पर जो घृणास्पद कार्य किया है उसके लिए उन्हें जो सज़ा दी जाये, कम है। जिस व्यवसाय में लाखों की कमाई है उसके प्रति शर्म, घृणा उत्पन्न की और विशेष कर टीवी के माध्यम से, साहित्य के माध्यम से विकृत छवि बनाई।

वामपंथी पत्रिकाओं की इसमें महती भूमिका है। परिणाम यह हुआ है कि आज महिलाएं और युवतियाँ, पारंपरिक व्यवसाय से जुड़े युवा से विवाह के लिए मना कर देती हैं, भले ही वह नौकरी से अधिक कमाता हो और अपनी मर्जी का मालिक हो।

अगर हिन्दू समाज का अस्तित्व बनाए रखना है तो इस सोच को रिवर्स करना होगा। जो ‘राजस्थान और मध्यप्रदेश का राष्ट्रपति कौन है’ इस प्रश्न में भी क्या गलत है यह नहीं समझती, लेकिन पति को जॉब ही होनी चाहिए इसपर अडिग हैं, तो इस सोच को लेकर सोचना होगा, इस सोच को किसने और क्यों बढ़ावा दिया, यह भी सोचना होगा।

पकोड़े बनाना बेचना किस हिसाब से गलत है ज़रा बताएंगे? बस इस विषय का मज़ाक उड़ाने वाले कौन हैं उनको खोजिए, और देखिये कि क्या ये लाल parasites कभी अपने पसीने की कमा सकते हैं?

There is profit and prosperity in Pakoda, just add pride! फूड जिहाद का साथ देने वालों को एक्सपोज़ कीजिये, स्वरोज़गार से ही व्यवहारिक हिन्दुत्व उभरेगा।

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