ये डर वाकई अच्छा लग रहा है

कल एक मित्र ने आगामी नये वर्ष की बधाई देनी चाही, फिर अचानक झेंप गया और स्वयं ही ने मुझे वर्षप्रतिपदा की याद दिलाई।

ठीक है, लोगों की क्रयशक्ति बढ़ी है तो कुछ खर्च करने का बहाना ढूंढते हैं। इन दिनों वैसा कोई त्यौहार भी नहीं है जिस पर खर्च किया जा सके।

ठण्ड में लोग बाग थोड़ा खाना पीना भी चाहते हैं, दारू, मीट, अंडा सब जगह सहज उपलब्ध है, ऊपर से शाकाहार आंदोलन टोटल फेल हो गया, सब्ज़ी फ्रूट ज़हर से भरे हैं और लोक में भी यह देखा जाता है कि निर्व्यसनी और सात्विक लोग ज्यादा बीमार रहते हैं, अस्तु लोग अश्रद्धा से भर गये हैं।

जनवरी के नये वर्ष का एक और पहलू सेक्स भी है। किसी बहाने से गर्म आलिंगन, थोड़ा शराब, कुछ डांस वगैरह, कुछ अनैतिक करने का लाइसेंस मिल गया है, बाकी कोई इस गलतफहमी में नहीं रहे कि वे ईसाई बन जाएंगे।

मेरे मित्र की झेंप बता रही है कि लोग विरेचन का भारतीय विकल्प तलाश रहे हैं, जो उन्हें भौतिक सुख प्राप्ति का कोई बहाना दे, उदाहरण के लिए, पहले भी हमारे यहाँ फाग, वगैरह में गाली का प्रयोग और स्पर्श छूट, कतिपय उत्सवों में मजाक उड़ाने और छोटी चोरी करने की परंपरा थी।

भारतीय जन पहले तो पश्चिम को पी जाएंगे, फिर पचा भी लेंगे।

नहीं टिकेगा तो वामपंथी नरेटिव द्वारा सेट किया झूठ, उसकी बखिया उघड़ चुकी है। सबसे ज्यादा चोट उन्हें पहुंची है, सोशल मीडिया द्वारा।

अब कोई भी कार्यक्रम हो, दीप, फूल, माला वगैरह का प्रचलन बढ़ गया है।
मंच से वक्ता सशंकित दिखते हैं, हर समय उन्हें एक भय तो है।
अब ताजमहल को प्रेम का प्रतीक कहते हुए उन्हें डर लगता है।
गंगा जमनी तहजीब अथवा अमन पसंद शब्द निरा मज़ाक बन कर रह गया है।
आरक्षण हमारा हक, वगैरह बोलने में भी झिझक होती है।

आतंकवाद के मज़हब को सब पहचान गये हैं और उस गली में कोई वक्ता झांकने में भी डरता है। आतंकवाद की जननी किताब, और उसके रचनाकार का ज़िक्र, बड़े बड़े फिलॉसफर भी करते हैं, अनौपचारिक बातचीत में आप उनसे चाहो जो उगलवा सकते हैं।

भारत तेरे टुकड़े होंगे की कुत्सित भावना उजागर होने के बाद, बड़े बड़े फन्ने खां, जो विशाल सेमिनारों की शोभा थे, टके के भाव, फुटपाथों की धूल चाट रहे हैं, कोई कुत्ता भी नहीं आता उन्हें सुनने।

बड़ी बिंदी गैंग और उनके रखवाले सरे आम दौड़ाए जा रहे हैं। लोग लात घूंसों से जमकर खबर ले रहे हैं। एयरपोर्ट, रेलवे और सार्वजनिक यात्राओं में उनका चलना मुश्किल हो गया है।

कई ‘बड़े पत्तलकार’ इन दिनों भूखों मर रहे हैं। आदत से मजबूर उन्हें कोई युगानुकूल भाषा आती नहीं, तो छुट्टी पर भेज दिए।

आप देखिए अपने आस पास, ज्यों ही कोई हिन्दू विरोधी कोई एक तर्क देता है, पब्लिक स्वतः उनपर व्यंग्यबाणों की बौछार कर रही है। उनके ट्विटर, इत्यादि पर क्षण मात्र में उन्हें उनकी औकात दिखाई जा रही है।

जिन मानविकी विषयों के वे एकछत्र शासक थे और मनमानी व्याख्या परोसते थे, उन गलियों में भी उनकी चूलें हिलाने वाले लोगों की एंट्री हो चुकी है। स्थापित फिल्मकारों की फिल्में पिटने लगी हैं।

कुलमिलाकर इस कोलाहल में भी देखा जाए तो इतना पोज़िटिव हो रहा है कि उसका आभास उन्हें भी है जिनकी ‘फसल खराब हो रही है’। उनके अंतर्द्वंद्व को मैं स्पष्ट पहचान रहा हूँ। पांच पैसे की औकात ही थी, तिकड़म से सेलिब्रिटी बन गई। अब जब चारों ओर से इज्ज़त उतारी जा रही है तो डर रही है।
ये डर वाकई अच्छा लग रहा है।

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