मैं नफ़रत फैलाता हूं…!!!

कल से कुछ लोगों की नसीहतें मिल रही हैं। आप हिन्दू-मुसलमान करते हैं। देश को बांट रहे हैं….इत्यादि..।

दरअसल मुझसे गुनाह यह हुआ कि मैंने ‘इंडियन आइडल’ के विजेता सलमान अली को दूसरा बड़े ग़ुलाम अली न कहा!

और विडंबना यह कि खुद बड़े गुली विभाजन के बाद पाकिस्तान की गायन संस्कृति को गरियाते हुए भारत लौट आए थे कि… वो भी कोई मुल्क है…! वहां तो गायकों के नाम पर सिर्फ कव्वाल होते हैं…!

और अब हम अपने धुरंधर शास्त्रीय और शानदार पार्श्वगायकों की परंपरा को दरकिनार कर पाकिस्तानी कव्वालों के कर्कश गाने गा कर खुश हो रहे। कितनी तारीफ की बात है… मैंने सिर्फ इतना ही कहा था कि कव्वाल की आवाज़ कभी पार्श्वगायन के माकूल नहीं हो सकती।

अपने ही देश के सुरीले गायकों को खारिज कर पाकिस्तानी गायकों को बुलाने वाला बॉलीवुड भला मुझे क्यों भाए..! इस सवाल को मैं उठाऊं तो मुझ पर नफरत फैलाने का तमगा लगे!!

इंडियन आइडल के वोटिंग पैटर्न के प्रति सचेत करते हुए लोकतंत्र के चुनाव में सोच समझ कर वोट करने की अपील करूं तो नफरत फैलाने का तमगा पाऊं..!!

और जो इस पूरे नाटक को तटस्थ होकर देखें… सलमान अली जैसे पाकिस्तानी नकलबाज़ों को भारतीय गायन का सितारा मान लें… वो महान…!

खैर… मेरी क्या बिसात है..! जब निर्मल वर्मा जैसे मनस्वी लेखक और विचारक को कश्मीर से हिन्दुओं को भगाए जाने का मुद्दा उठाने पर भाजपा का एजेंट करार दिया गया तो हम जैसे किस खेत की मूली!

यही बौद्धिक आतंक तो हमें डराता है। इसी ने हमें अपने ही मूलभूत प्रश्नों से विमुख कर दिया है। एक विभाजन का सदमा, त्रासदी झेलने और पूरे उपमहाद्वीप में हिन्दुओं की दयनीय स्थिति को देखने के बाद भी इन्हें खुशफहमी है कि संगम होने वाला है। कितने मासूम हो यार…!!

जिस नसीरुद्दीन शाह की पहचान इस देश से हैं। जिस शाह ने इस देश में सब कुछ देखा।.. कश्मीर घाटी… से लेकर बंगाल केरल में उनका आतंक देखा..। ओवैसी से लेकर दर्जनों मौलवी मुफ्तियों के प्रधानमंत्री के सिर कलम करने वाले बयान सुने। उन्हें गौ रक्षकों की छिटपुट घटनाओं से अचानक डर लगने लगा और हम उनके डर में शरीक हो गए… अरे मैं तो शर्म से मर ही गया… नसीरुद्दीन शाह डर गए भारत में! सिनेमा का नाटक समझ रखा है क्या?

मैं खुलकर कहना चाहता हूं कि नफरत तो उनसे भी नहीं कर सका जिन्होंने मेरे करियर में पग-पग पर कांटे बोए। जिन्होंने मेरा अहित किया… जो दोस्त बन कर ठगते रहे हैं। मैं भी प्रेम और सौहार्द्र चाहता हूं। किसी भी सेक्यूलर से कहीं अधिक। लेकिन मेरे चाहने से क्या होता है… इस देश के अल्पसंख्यकों में दो पैसे की ईमानदारी है…? कभी खुद से सवाल किया है? …सारी मौज लूट कर सारा ठीकरा हिन्दुओं के सिर फोड़ देते हैं।

आज मैं भक्त घोषित हो चुका हूं। इसकी सबसे बड़ी कीमत जो मैं चुका रहा वह ये कि मोदी भक्त होने के साथ मेरी बौद्धिक मृत्यु हो गई है। अब भला मुझे कहां किस मंच पर कवि लेखक की स्वीकार्यता मिलेगी?

हालत तो यह है कि जब से मोदी के समर्थन में वीडियो डालने शुरू किए हैं तब से सारे कवि, कवयित्री… चंपत हो गए हैं। अछूत होते हैं मोदी भक्त! मुझे क्या पड़ी थी यह सब करने की? मैं भी चुपचाप नौकरी करता… अध्ययन कर गंभीर साहित्य लेखन में घुसता पर उसे नष्ट कर रहा हूं जो सबसे प्रिय है।

देश को फिलहाल मुझे जैसी लाखों करोड़ों गिलहरियों की जरूरत है, जो सेतुबंधन में कंकर उठा सके वरना मेरी क्या हैसियत! मैं नफरत नहीं फैलाता। सपने में भी नहीं। हां… जहां मेरा मन प्रश्न पूछता है, वहां मैं सक्रिय हो जाता हूं। आंधी आने पर शुतुरमुर्ग की तरह सिर रेगिस्तान में नहीं गाड़ सकता…। अगर इसमें आपको मेरी नफ़रत दिखती है तो आप मुझसे दूर रहें…।

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