कितने सत्यनिष्ठ हैं मीडिया हाउस?

सबसे पहले यह कहूंगा कि मेरा स्पष्ट मानना है कि वर्तमान का मीडिया विशुद्ध व्यवसाय है।

इसे संभालने-चलाने वाले 99 फीसदी सेठ यानी व्यापारी हैं। इन्हें सिर्फ धंधे से मतलब है। तमाम नारों का इनके समक्ष कोई अर्थ नहीं। अगर आप इनसे बहुत ज्यादा उम्मीदें लगाए हैं, तो यह इनकी नहीं, आपकी ग़लती है।

आज के समय अगर कोई जर्नलिज़्म के स्व. गणेशशंकर विद्यार्थी के काल का मिशन होने की बात करता दिखे, तो तत्काल समझ लें कि यह मालिकों का पूर्णतः विश्वस्त दलाल है और उनकी दुकान में माल का इज़ाफ़ा करते हुए लगातार अपनी सात पीढ़ियों का जीवन भी सुधारने के अभियान में जुटा है।

मैं ऎसी टिप्पणियां जब भी करता हूं, कई मित्र आकर धिक्कारते हैं – यार, आप खुद मीडिया से हैं। ऎसी-ऎसी पोस्ट करते हैं, जो मीडिया के सारे वस्त्र उतार कर उसे नंगा कर देती हैं। ऐसा क्यों करते हैं? ऐसा करते हुए आप स्वयं भी तो नग्न होते हैं। यह तो सोचें।

मैं कहता हूं – मनुष्य का आचरण उसका सर्वश्रेष्ठ आईना होता है। मेरे जो मित्र मुझे देखते हैं, वे मेरा मूल्यांकन मेरे आचरण से करते हैं।

कुछ लोग निश्चय ही मुझ पर यदा-कदा आरोप जड़ते हैं, मैं उन्हें सीधी चुनौती देता हूं – ‘आओ, मेरी और आपकी समस्त चल-अचल संपत्ति की जांच एक साथ करा लें। दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।’

आज तक यह चुनौती किसी ने स्वीकार नहीं की। वे इसके बाद पलट कर फिर नहीं देखते।

कोई करना चाहे, तो आज फिर खुली चुनौती है। आइए, मैं हर समय हाज़िर हूं।

लेकिन आज मैं यह इसलिए लिख रहा हूं कि राजस्थान में नंबर वन होने के दावे लगातार करने वाले और इस होड़ में हांफते-कांपते वर्षों से दौड़ रहे दोनों अखबारों की असलियत से आपको अवगत कराऊं।

पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान के राजस्थान के समस्त अखबारों को उठाएं। इनका अध्ययन करें।

दो प्रमुख घटनाएं इस दौरान हुईं, जो सोशल मीडिया की सुर्खियां बनीं।

पहली – जयपुर के मेयर और सांगानेर विधानसभा क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी अशोक लाहौटी मानसरोवर के एक सेक्टर में चुनाव प्रचार कर रहे थे। इलाके की कुछ महिलाएं उनसे सफाई व्यवस्था को लेकर शिकायत करने लगीं। जैसा कि चमचों का स्वभाव होता है, कुछ कार्यकर्ता उन महिलाओं से भिड़ गए। इस आचरण से गुस्साई महिलाओं ने लाठियां उठाईं और उन्हें दौड़ा लिया। क्षेत्र से खदेड़ कर ही मानीं।

दूसरी – टिकट वितरण को लेकर कांग्रेस के खेमे में जबर्दस्त उठा-पठक कई दिनों तक चली। एक सम्मेलन में कार्यकर्ता मंच पर चढ़ गए और पदाधिकारियों को नीचे धकेल दिया। जम कर मारपीट हुई। कुर्सियां उछलीं। एक-दूजे की टोपियां भी उछाली गईं। सोशल मीडिया पर सम्मेलन के वीडियो खूब शेयर हुए।

लेकिन सभी प्रमुख अखबारों में इन खबरों की एक लाइन आपको नहीं मिलेगी। इसके बजाय पाठकों को ये नेताओं के ऊल-जुलूल बयान भर परोसते रहे। पहली खबर फोटो सहित सिर्फ ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ में छपी, शेष इसे पचा गए। अन्य तो दूसरी भी ऐसे पचा गए, जैसे दो हाजमोला एक साथ खा ली हो।

क्या ऐसा किसी सौदेबाज़ी के बिना संभव है?

ऐसा कैसे संभव है कि जनता में कांग्रेसी के तमग़े से सुशोभित अखबार बीजेपी कैंडिडेट के खिलाफ खबर नहीं छाप रहा और भाजपाई गढ़ कहलाता रहा मीडिया हाउस कांग्रेस का गला दबोचने का अवसर अनदेखा कर गया।

अब ज़रा सोचिए। इन अखबारों में छपने वाले ऐसे ढेरों लेखक/ संपादक/ रिपोर्टर इस फेसबुक पर सक्रिय हैं, जो स्वयं को राजा हरिश्चंद्र का अवतार घोषित करते नहीं अघाते।

इनसे एक सवाल तो बनता है – भाईजान, वह कौन सा चश्मा था, जिसने आपको ऎसी घटनाएं देखने से महरूम कर दिया। आपने इन घटनाओं पर क्यों नहीं लिखा? आपने लिखा और नहीं छपा, तो क्यों नहीं छपा? मीडिया की प्रतिबद्धता का क्या हुआ? उसका तथाकथित मिशन किस तरफ कूच कर गया?

अंत में, ज़रा सी भी शर्म बाक़ी हो, तो आसपास देखो। चुल्लू भर पानी अवश्य मिलेगा।

और हां, कभी मुझे ज्ञान देने का मन हो, तो उससे पहले दस बार सोच अवश्य लेना।

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