एड़ियां उठाये पंजों पर खड़े हैं, बौने समझते हैं कि वो सबसे बड़े हैं

2008 की बात है। जम्मू में जिस अखबार में कार्यरत था उसने रहने के लिए एक फ्लैट दे रखा था। ऑफिस से उस फ्लैट की दूरी लगभग डेढ़ किलोमीटर थी। लेकिन वह स्थान पहाड़ीनुमा एक ऊंचे स्थान पर था।

ऑफिस से फ्लैट तक जाने का पूरा मार्ग चढ़ाई के साथ आगे बढ़ता जाता था। फ्लैट से लगभग 200 मीटर पहले मार्ग की ऊंचाई और तीखी हो जाती थी।

मेरे साथ मेरे दो सहयोगी रात को जब कभी पैदल वापस आते थे। तो जम्मू की उस गुनगुनी ठंड में भी जब फ्लैट पहुंचते थे तो पसीना बह रहा होता था और सांस फूल रही होती थी। शिमला निवासी मेरे एक सहयोगी इंदर बाबू पर उस पैदल यात्रा से कोई फर्क नहीं पड़ता था।

उपरोक्त सन्दर्भ अब प्रारम्भ हो रही पोस्ट के मर्म को समझने में आप मित्रों के लिए सहायक होगा।

केदारनाथ मंदिर से पहले एक स्थान है गरुण चट्टी। केदारनाथ मंदिर से इसकी दूरी सम्भवतः 2 या 2.5 किमी है। 2013 की त्रासदी के बाद हुए नवनिर्माण के पश्चात अब यह मार्ग काफी सुविधजनक हो गया है और सम्भवतः दूरी भी कुछ कम हो गयी हो।

लेकिन आज से 35-40 साल पहले गरुण चट्टी से केदारनाथ मंदिर तक का पैदल मार्ग बहुत कठिन हुआ करता था। तीर्थयात्रियों को वह दूरी को तय करने में काफी कष्ट उठाने पड़ते थे।

इसी दीपावली को जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी केदारनाथ धाम पहुंचे तो लगभग सभी न्यूज़ चैनलों की टीम वहां मौजूद थी। उन्हीं में से एक टीम (शायद ABP की) ने वहां उपस्थित एक ऐसे पुजारी को खोज लिया था जो पिछले कई दशकों से मूलतः गरुण चट्टी में ही रह रहे हैं।

न्यूज़ चैनल की उस टीम से अपनी बातचीत में उन पुजारी ने बताया कि 1980 के पहले से 1990 तक नरेन्द्र मोदी प्रतिवर्ष केदारनाथ आते थे और गरुण चट्टी स्थित एक धार्मिक संस्था के भवन में कमरा लेकर लगभग डेढ़ माह तक रहते थे।

संयोग से वो जिस कमरे में रहते थे वो कमरा मेरे कमरे के बगल में ही था। उन्हीं पुजारी ने बताया था कि उन डेढ़ महीने की अवधि के दौरान मोदी की दिनचर्या यह होती थी कि वह रोजाना भगवान केदारनाथ जी के दर्शन पूजन करने मन्दिर आते थे। और मन्दिर से वापस आने के पश्चात हम लोगों के साथ उनकी बातचीत/चर्चा का केंद्र केवल धर्म एवं अध्यात्म ही होता था।

उन 10-12 वर्षों की अवधि में गरुण चट्टी में रहते हुए उनको कभी राजनीति पर बात करते हुए मैंने या किसी ने कभी नहीं देखा सुना था। सच तो यह है कि यह है कि उस दौरान हमने स्वप्न में भी यह नहीं सोचा था कि वो कभी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनेंगे।

उन पुजारी की बात सुनकर मैं सोच रहा था कि केदारनाथ धाम जाने वाले तीर्थयात्रियों को जिस सीधी ऊंची चढ़ाई वाले रास्ते पर केवल एक बार चलने में हुई कठिनाई बरसों तक याद रहती थी। उस रास्ते पर डेढ़ महीने तक प्रतिदिन चलकर भगवान केदारनाथ के दर्शन पूजन करने जाने वाले व्यक्ति की धार्मिक आस्था, श्रध्दा, हिंदुत्व के प्रति उसकी प्रतिबद्धता पर आजकल कैसे कैसे लोग उंगली उठा रहे हैं? मोदी के हिन्दू विरोधी होने का सर्टिफिकेट जारी कर रहे हैं।

हिन्दू धर्म के इन न्यूज़ चैनली और फेसबुकिया ठेकेदारों की उन उठी हुई उंगलियों को देखकर, उनकी बातों को सुनकर मुझे एक कविता की यह पंक्तियां याद आ जाती है…

एड़ियां उठाये पंजों पर खड़े हैं,
बौने समझते हैं कि वो सबसे बड़े हैं।

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