Merry Business!

मेरी क्रिसमस का भारत में असल सच यही है। जब तक इसे समझेंगे नहीं, फेसबुक और व्हाट्सएप के सभी पोस्ट और मेसेज का परिणाम ही आनेवाला है।

यह चाहे तो स्टैम्प पेपर पर लिखकर दूंगा।

सब से पहले यह बात समझ लीजिये कि हम एक उत्सव प्रिय समाज है जिसे नाचने गाने का बस निमित्त चाहिए।

आप माने या न माने लेकिन सहज नृत्य जिसमें कोई फॉर्मल ट्रेनिंग वगैरह नहीं लगती, वामियों का भी प्रिय शगल है। उनके प्रोटेस्ट में भी डफ होता है और लड़कियां आगे-पीछे झूमकर नाचती हैं और जैसे स्कूली बच्चों के पिकनिक पर गाने होते हैं वैसे ताल पर नारे लगाती हैं।

मुद्दा यह है कि हमें नाचना गाना और ऑफ कोर्स पीना और खाना पसंद है।

क्रिसमस हमारे लिए विदेशी नहीं बल्कि हम से एज्यूकेटेड एडवांस्ड लोगों का उत्सव है, मतलब वे भी यह उत्सव मनाते हैं इसलिए हमारे लिए यह प्रगत समाज का अनुकरण है।

वैसे हम अनुकरणप्रिय भी हैं, बिना कोई आवश्यकता के अङ्ग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग करते हैं जैसे कुछ खरीदते नहीं बल्कि buy करते हैं, पैसे चुकाते नहीं बल्कि pay करते हैं। अपनी मूल पहचान बताते समय हम अब ये नहीं कहते कि हम फलां स्थान से हैं बल्कि हम फलां स्थान को belong करते हैं।

अस्तु, तो आप समझ गए होंगे कि क्रिसमस मनाना, sorry, celebrate करना हमें भी एज्यूकेटेड होने का अहसास कराता है क्योंकि उस समय हम अङ्ग्रेज़ी पीते हैं।

क्रिसमस भारत में उस समय आता है जब मस्त ठंड पड़ती है, छुट्टी मनाने, नाचने गाने का वैसे भी दिल करता है और अंग्रेजों ने इसे दो सौ से अधिक साल से रिवाज भी बना दिया है। अब ये रिवाज भारतीय लोगों की आदत बन गयी है और भारत के कई बिज़नस के लिए बड़ी कमाई का अवसर।

आप क्रिसमस से लड़ने जाएँगे तो क्रिसमस आप से नहीं लड़ेगा, चर्च भी आप से नहीं लड़ेगा और न कोई ईसाई लड़ेंगे। क्योंकि आप उनके क्रिसमस मनाने पर कुछ नहीं कह रहे, आप ये मान रहे होते हैं कि उनको उनके धार्मिक उत्सव और त्योहार मनाने का हक़ है।

लेकिन आप से लड़ेंगे आप के अपने ही, जिनकी मौज मस्ती करने को आप मनाही कर रहे हैं वो भी साल के सब से सही मौसम में। आप से वे भी लड़ेंगे जिनकी इस मौज मस्ती से होनेवाली कमाई खतरे में आ जाएंगी।

और ये सब आप के अपने कोर वोटर होने का दम भरते हैं और पहले ही पीड़ित होने का रोना रोते हैं। आप की असली लड़ाई तो इनसे ही है, ईसाइयों या चर्च से आप की लड़ाई है ही नहीं। सोच कर देखिये इन शब्दों पर।

क्रिसमस को त्योहार समझिए, महज एक उत्सव समझिए जिसे आप को रिप्लेस करना है। क्योंकि आप के ही लोग एक उत्सव मनाने के मानसिक व्यसन के अधीन हो चुके हैं, आप को उनका detox वैसे ही करना होगा जैसे एक ड्रग एडिक्ट का detox किया जाता है।

वे उत्सव और मौज मस्ती को नहीं छोड़नेवाले और उससे कमाई करनेवाले अपनी कमाई नहीं छोड़नेवाले। आप को अपनों से ही लड़ना है और इस लड़ाई में आप की ही हार पहले से सुनिश्चित है अगर आप क्रिसमस को बंद करवाने की कोशिश करेंगे।

लेबल बदलिये, स्वरूप बदलिये, उत्सव को न हटाये। व्यसनमुक्ति के कार्यक्रमों को समझिए, यह धीरे धीरे ही जाएगा। वैसे पंजाब में भी धूम धाम से मनाया जाता है जब कि गुरु जी के बच्चों के बलिदान के कारण उन्हें कतई नहीं मनाना चाहिए। लेकिन ये बलिदान का दुख फेसबुकिया हिन्दू ही मनाता दिखता है।

अगले साल की प्लानिंग कीजिये, यह साल तो बिज़नस अपना प्लानिंग बनाकर बुकिंग फुल भी कर चुका। और हाँ, हमारी संवेदनशीलता की एक बानगी भी सुन लीजिये।

निर्भया के कारण उस साल का न्यू ईयर कई सरकारी आस्थापनों ने कैन्सल किया था। बस में एक लड़के को दूसरे से मोबाइल पर इसपर दुख जताते सुना कि इस @%^& को भी अभी ही मरना था। न रहकर मैंने उसे दो शब्द कहे तो उसने दो टूक सुनाया – अंकल, माइंड योअर ओन बिज़नस। और बस के सभी यात्री चुप रहे।

इसलिए क्रिसमस से लड़िए नहीं, उसका लेबल बदलिये, वो लड़ाई लड़िए जिसे आप जीत सकते हैं।

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY