ईसा मसीह का भारत से संबंध

बाइबल में ईसा मसीह के जन्म की कथा के बाद सीधे यूहन्ना से नदी में बपतिस्मा की कथा मिलती है। बीच के वर्षों में ईसा कहाँ रहे बाइबल में वर्णन नहीं मिलता। कई शोधकर्ताओं का दावा है कि ईसा उक्त अवधि में भारत में रहे।

ईसा मसीह के सूली के बाद पुनः जीवित होने के बाद फिर से भारत आने की बात भी कही जाती है। ओशो ने इसी संदर्भ में प्रवचन किया था, जिसके बाद ईसाई नाराज हो गये। अमेरिका में ओशो का उत्पीड़न किया गया। अमेरिका से बाहर निकाल दिया। तथा किसी भी देश ने ओशो को शरण नहीं दी थी।

बाइबल के दो भाग हैं 1-ओल्ड टेस्टामेंट, 2-न्यू टेस्टामेंट।

न्यू टेस्टामेंट में ही ईसा मसीह की कथा है तथा ईसा मसीह की शिक्षा न्यू टेस्टामेंट है। दोनों भागों में दी गई विषय वस्तु में भारी अंतर है। ओल्ड टेस्टामेंट में बदले की बात है। आँख के बदले आँख की बात है। जबकि यीशु एक गाल पर थप्पड़ के बदले दूसरा गाल भी बताने की बात कहते हैं। ओल्ड टेस्टामेंट में क्षमा और प्रेम की बात नहीं है, बल्कि न्याय की बात है। यीशु क्षमा प्रेम की बात कहते हैं।

यीशु तो कहते हैं कि किसी पर दोष मत लगाओ, ताकि परमेश्वर तुम्हें दोषी न ठहराये। यीशु की सारी शिक्षा भारतीय सोच से साम्य रखती है। बाइबल की कई बातें तो ऐसी हैं, जैसे गीता के वचन ही पुनः सुनाये जा रहे हों।

जब भी कोई ईसाई गीता पढ़ लेता है, स्वाभाविक रूप से भारतीय आध्यात्म की ओर आकर्षित होने लगता है क्योंकि न्यू टेस्टामेंट की बातों का आधार केवल भारतीय आध्यात्म में मिलता है। पश्चिमी सेमेटिक मतों में यीशु के वचनों का आधार नहीं मिलता।

इसीलिए पश्चिमी देशों के ईसाई इस्कॉन से प्रभावित हो कर सनातन मत स्वीकार कर रहे हैं। इस्कॉन का प्रभाव भारत से अधिक पश्चिमी देशों में देखने को मिल रहा है।

वेटिकन से संचालित ईसाई मिशनरियां आदिवासी, गरीब लोगों के बीच आर्थिक प्रलोभन देकर धर्मांतरण करवाती हैं। इस्कॉन इंटरनेशनल संपन्न शिक्षित ईसाइयों को पश्चिमी देशों में गीता पढ़वा कर दान लेकर धर्मांतरण करवाती है। प्रेम, समर्पण, आदि कृष्ण भक्ति का आधार है।

सेमेटिक मतों यहूदी, ईसाई, इस्लाम में पुनर्जन्म की मान्यता नहीं है। पुनर्जन्म की मान्यता भारतीय मतों में स्वीकार है। गीता और बाइबिल के कुछ वचनों में इतनी समानता है कि ऐसे लगता है कि ईसा येरूशलेम में गीता वाँच रहे हों..।

निश्चित ही ईसा भारत आयें होंगे। तभी वे ऐसे वचन बोल सके। अन्यथा ऐसी सोच के लिए येरूशलेम में तो कोई आधार ही नहीं था। बाइबिल के यह वचन देखिए जिसमें ईसा मसीह प्रामाणिक रूप से पुनर्जन्म को मान्यता दे रहे हैं।

तुम्हारा पिता इब्राहिम मेरा दिन देखने की इच्छा में बहुत मग्न था, और उसने देखा और आनंद किया।
–(यूहन्ना 8/56)
यहूदियों ने उससे कहा कि अबतक तू पचास वर्ष का नहीं, फिर भी तूने इब्राहीम को देखा ????
–(यूहन्ना 8/57)
यीशु ने उनसे कहा-मैं तुमसे सच सच कहता हूँ कि पहले इसके कि इब्राहीम उत्पन्न हुआ, मैं हूँ।
–(यूहन्ना8/58)
और हे पिता तू अपने साथ मेरी महिमा उस महिमा से कर जो कि होने से पहले मेरी तेरे साथ थी।
–(यूहन्ना 17/5)

यह वचन सेमेटिक मतों की मूल अवधारणा के एकदम विपरीत हैं। ऐसी बातों के कारण यहूदी ईसा से वैर रखते हैं। इन वचनों से मिलते जुलते वचन, ईसा से तीन हजार वर्ष पहले श्री कृष्ण ने गीता में कहे हैं।

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमण्यपम।
विवस्वान्मनवे प्राप्त मनुरिक्ष्वाक पैsब्रवीति।।
–(गीता-4/1)
भगवान बोले- मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था। सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत से कहा, मनु ने अपने पुत्र इच्छवाकु से कहा।

एवं परम्परा प्राप्तमिमं राजर्योविदुः।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ।।
–(,गीता 4/2)
हे परन्तप इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना, किन्तु उसके बाद बहुत काल में यह योग पृथ्वी से लुप्त प्राय हो गया।

अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तावानिति।।
—(गीता 4/4)

अर्जुन बोले कि आपका जन्म तो अर्वाचीन -अभी हाल का है, और सूर्य का जन्म बहुत पुराना है। अर्थात कल्प के आदि में हो चुका है। तब मैं कैसे समझूँ कि आपने ही कल्प के आदि में सूर्य से यह योग कहा था?

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप।।
(गीता4/5)
श्री भगवान बोले- हे परंतप अर्जुन!!मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। उन सबको तू नहीं जानता पर मैं जानता हूँ।

सृष्टि के संबंध में भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं-

भया ततमिदं सर्व जगत व्यक्त मूर्तिना।
भाव स्थानि सर्व भूतानि न चाहं तैप्तवस्थितः।।
-(गीता 4/2)

अर्थात मुझ निराकार परमात्मा से यह सब जगत जल में बर्फ के सदृश्य परिपूर्ण है। और सब भूत मेरे अंतःकरण के अंतर्गत संकल्प के आधार स्थित है। किन्तु मैं वास्तव में उनमें स्थित नहीं हूँ।

ठीक ऐसी ही बात यीशु बाइबिल में कहते हैं।

सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ, और जो कुछ उत्पन्न हुआ, उसमें से कोई भी वस्तु उसके बिना उत्पन्न नहीं हुई।
(,,यूहन्ना रचित सुसमाचार1/3)

गीता में श्री कृष्ण जी कहते हैं-
यच्चापि सर्व भूतानां बीजं तहमर्जुन।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम।।
-(गीता,10/39)

हे अर्जुन!सब भूतों की उत्पत्ति का कारण में हूँ, क्योंकि ऐसा कोई भी चर अचर भूत नहीं जो मुझसे रहित हो।

बाइबिल में यीशु कह रहे हैं-
कि वे परमेश्वर को ढूँढें, कदाचित उसे टटोलकर पा जायें, तो भी वह हम में से किसी से दूर नहीं है।
-(प्रेरितों के काम 17/27)

भगवान श्री कृष्ण गीता में आश्वासन दे रहे हैं।

–अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाःपर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेम वहाम्यहम।।
-(गीता9/22)

जो अनन्य प्रेमी भक्त जन मुझ परमेश्वर को निरन्तर चिन्तन करते हुए, निष्काम भाव से भजते हैं। उन नित्य निरन्तर चिन्तन करनेवालों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।

बाइबिल में यीशु के वचन हैं —
इसीलिए मैं तुमसे कहता हूँ कि अपने प्राणों के लिए चिन्ता मत करना कि हम क्या खायेंगे??क्या पीयेंगे?? न शरीर के लिए कि क्या पहनेंगे?? क्या प्राण भोजन से और शरीर वस्त्र से बढ़ कर नहीं है ???
-(मत्ती6/25)

आकाश के पक्षियों को देखो, वे न बोते हैं, न काटते हैं, न खत्तों में बटोरते हैं। तो भी तुम्हारा स्वर्गीय पिता उनको खिलाता है। क्या तुम उनसे अधिक मूल्य नहीं रखते।????
-(मत्ती 6/26)

इसलिए तुम उसके राज्य की और धर्म की खोज करो, तो वे सब वस्तुएं तुम्हें मिल जायेंगी।
-(मत्ती 10/9-10)

सो कल की चिंता न करो, क्योंकि कल की चिंता कल का दिन स्वयं कर लेगा। आज के लिए आज का ही दुख बहुत है।
-(मत्ती 6/34)

दैवीय और आसुरी संपदा

भगवान श्री कृष्ण गीता में दैवीय और आसुरी संपदा की व्याख्या करते हुए कहते हैं।-
तेजः क्षमाः धृतिः शौचम् द्रोहो नातिमानिता ।
भवन्ति सम्पदं दैवीमाभिजातस्य भारत।।
-(गीता16/2)
धैर्य क्षमा तेज बाहर की शुद्धि, किसी में भी शत्रु भाव का न होना, अपने में प्रतिष्ठा के अभिमान का अभाव, ये सब हे अर्जुन! दैवी संपदा वाले व्यक्ति के लक्षण हैं। इसके विपरीत आचरण वाले आसुरी संपदा वाले व्यक्ति के लक्षण होते हैं।

दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।
मा शुचः सम्पदं दैवीमाभिजातो$सि पाण्डव।।
-(गीता16/5)
दैवी संपदा मुक्ति के लिए और आसुरी संपदा बांधने के लिए मानी गई है। इसलिए हे अर्जुन! शोक मत कर। तू दैवी संपदा लेकर उत्पन्न हुआ है।

बाइबिल में यीशू के वचन हैं —
जो कोई परमेश्वर से जन्मा है वह पाप नहीं करता, क्योंकि उसमें उसका बीज बना रहता है। और वह पाप कर ही नहीं सकता।
-(यूहन्ना की पहली पत्री 3/11)
इसी से परमेश्वर की संतान और शैतान की संतान जाने जाते हैं। जो धर्म के काम नहीं करता, वह परमेश्वर से नहीं है। और वह जो अपने भाई से प्रेम नहीं रखता।

संसार में स्वयं के आने के आने का कारण बताते हुये भगवान श्री कृष्ण गीता में कह रहे हैं-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मनं सृजाम्यहम।।
-(गीता4/7)
परित्राणाय साधूनाम विनाशाय च दुष्कृताम।
धर्म संस्थापनार्थाय सम्भावमि युगे युगे।।
-(गीता4/8)
जब जब धर्म की हानि होती हैं और अधर्म की वृद्धि होती है। तब तब मैं अपने रूप को रच कर लोगों के सम्मुख प्रगट होता हूँ। (गीता4/7)
साधु पुरुषों की रक्षा के लिए एवं दुष्टों के विनाश के लिए, धर्म की स्थापना हेतु युग युग में प्रगट होता हूँ।
-(गीता4/8)

बाइबिल में कुछ ऐसी ही बात प्रभु यीशु भी कह रहे हैं-
जो पाप करता है वह शैतान की ओर से है क्योंकि शैतान आरंभ से ही पाप कराता आया है। परमेश्वर का पुत्र इसीलिए प्रगट हुआ है कि शैतान के कार्यों का नाश करे।
–(यूहन्ना की पहली पत्री 3/8)

कोई मुझसे पूछे की पश्चिम में कृष्ण भक्ति का पहला प्रचारक कौन? तो मैं बेधड़क ईसा मसीह का नाम लूँगा, जिन्होंने हज़ारों वर्ष पूर्व पश्चिम में कृष्ण भक्ति के बीज बोये। हज़ार वर्ष बाद श्री प्रभुपाद जी की कृपा से अब वही पुष्पित पल्लवित हो रहे हैं।

यीशु स्थानीय सोच के अनुसार ओल्ड टेस्टामेंट के सहारे अपनी बात कह रहे थे। फिर भी यहूदियों ने उनसे बैर रखा। हालांकि यीशु की यह शैली कारगर रही, बहुत से लोगों ने उन्हें अपना उद्धारक माना। यदि यीशु सीधे स्वयं को सनातनी या वैदिक घोषित करते तो लोग उन्हें उस समय कतई स्वीकार नहीं करते।

जब भी कोई पश्चिम का व्यक्ति गीता पढ़ लेता है तो स्वाभाविक रूप से उसकी भारतीय सनातन में रुचि हो जाती है और वह आनंद मगन हो –
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।।
गा उठता है।
जय श्री कृष्ण जी
इति सिद्धम।

शत्रुघ्न सिंह

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