अभिनन्दनीय भी है, अविश्वसनीय भी है मां गंगा का यह नवजीवन नवरूप

दिसम्बर के तीसरे सप्ताह में इसरो और IIT कानपुर तथा पर्यावरण मंत्रालय के वरिष्ठ वैज्ञानिकों की टीम ने कानपुर क्षेत्र में गंगा के प्रवेशद्वार से लेकर कानपुर से बाहर निकल रही गंगा के निकास द्वार तक फैली कई किमी लम्बी गंगा की धारा के 20 से अधिक स्थानों से नमूने एकत्र कर उनका परीक्षण किया तो परिणाम अत्यन्त सुखद और चौंकाने वाले मिले।

कानपुर के गंगाजल में BOD (biochemical oxygen demand) का स्तर 2.5 था जो 3 से कम होना चाहिए लेकिन पिछले 40-50 साल से यह 4-5 से कम कभी नहीं हुआ था।

इसी तरह कानपुर के गंगाजल में हाइड्रोजन (pH) का स्तर जो 9.5 होना चाहिए वह कानपुर में पिछले 40-50 सालों में कभी 5-6 के ऊपर नहीं जा सका था। दिसम्बर के तीसरे सप्ताह में हुई जांच में कानपुर के गंगाजल में उस हाइड्रोजन का स्तर 8.5 से अधिक निकला है।

नहाने योग्य गंगाजल में DO (घुलनशील ऑक्सिजन) का स्तर कम से कम 6 तथा पीने योग्य गंगाजल का स्तर कम से कम 9.5 होना चाहिए। कानपुर में पिछले 30-40 वर्षों में यह हमेशा 6 के नीचे ही रहा था किंतु दिसम्बर के तीसरे सप्ताह में हुई जांच में कानपुर के गंगाजल में DO का स्तर 11-12 के मध्य निकला है।

पिछले 2 सालों से चल रहे प्रोजेक्ट के तहत गंगा सफाई में जुटी एजेंसियों को यह सफलता चरणबद्ध तरीके से मिली है।

उल्लेख आवश्यक है कि 2525 किमी लम्बी गंगा में कानपुर क्षेत्र के इस हिस्से का गंगाजल पिछले 40-50 सालों के दौरान सर्वाधिक प्रदूषित और जहरीला रहा है।

अतः गंगाजल में घुले ज़हर के साथ जंग के सबसे कठिन पड़ाव कानपुर में मिली इस अभूतपूर्व विजय यह संदेश दे रही है कि निर्धारित तिथि मार्च 2019 में जब गंगाजल की स्थिति की औपचारिक घोषणा होगी तो 100 करोड़ हिन्दुओं की आस्था और श्रद्धा की मुख्य केन्द्र मां गंगा को उसके वास्तविक पवित्र स्वच्छ स्वस्थ रूप में देखकर हमारा, आपका, हर हिन्दू धर्मावलंबी का सिर गर्व से तन जाएगा और सीना 56″ का हो जाएगा।

बस यह ध्यान रखिएगा कि मां गंगा को उसका यह नवजीवन नवरूप उसके उसी बेटे के प्रयासों से प्राप्त हो रहा है जिसे हिंदुत्व के कुछ न्यूज़ चैनली और फेसबुकिया ठेकेदार लगातार हिन्दू विरोधी/ द्रोही घोषित करने में जुटे हुए हैं।

विशेष उल्लेख : 1985 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने गंगाजल को साफ स्वच्छ करने के लिए गंगा एक्शन प्लान बनाया था। तबसे लेकर 2014 तक इसपर खर्च हुए रुपयों का यदि 2014 के अनुसार मूल्यांकन हो तो उन 29 वर्षों में गंगा सफाई के नाम पर लगभग 40 हज़ार करोड़ रूपये खर्च हो चुके थे और 2014 की गंगाजल से सम्बंधित अनेक सरकारी और गैर सरकारी रिपोर्टें यह बता रहीं थीं कि 2014 में गंगाजल इतना प्रदूषित और जहरीला हो चुका था कि पीना तो छोड़िए नहाने योग्य तक नहीं रह गया था। आखिर वो 40 हज़ार करोड़ रूपये कहां और किस कार्य मे खर्च हो गए थे?

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