मुझे गुस्सा भी आता है, खीझ भी होती है…

मुझे गुस्सा आता है, जब जिहादी मुल्ला इमरान खान अपने एक बिरादर की बात का सहारा लेकर भारत के पीएम को यह सीख देने की हिमाकत करता है कि अल्पसंख्यकों को कैसे रखा जाए?

प्लेब्वॉय-क्रिकेटर इमरान खान यह भूल गया है कि 1947 में जब जिहादियों ने भारत मां का आंचल तकसीम कर पाकिस्तान नामक आतंकी मुल्क बनाया, तब से लेकर अब तक वहां कितने फीसदी अल्पसंख्यक बचे हैं…

या भारत ने तब अपनी छाती पर करोड़ों हिंदुओं की लाशों का बोझ ढोकर भी जिहादी मुसलमानों को न केवल पनाह दी, बल्कि उनकी आबादी भी दिन-दूनी, रात चौगुनी होती गयी…।

मुझे गुस्सा तब भी आता है, जब कथित लिबरल-सेकुलर केंचुए तुरंत मुंह चिहार कर यह तो पूछते हैं ‘तो क्या, हम भी पाकिस्तान बन जाएं’? लेकिन, यह भूल जाते हैं कि पाकिस्तान से तुलना किसने शुरु की है?

मुझे गुस्सा तब भी आता है, जब मैं खानदानी चोर को त्योरियां चढ़ाते हुए निजता की बात करते हुए देखता हूं। उसे पढ़ानेवाले यह भी बताना भूल जाते हैं कि सर्विलांस के आदेश 2013 में दिए गए थे और तब मोदी सरकार थी भी नहीं।

मुझे खीझ होती है, जब ज़मानत पर चल रहे इस बदतमीज़ और उद्दंड बालाधेड़ के खिलाफ हाईकोर्ट का फैसला आता है, लेकिन उस पर कहीं सुगबुगाहट नहीं होती। मुझे गुस्सा आता है, जब सफेद झूठ बोलता यह मंदबुद्धि हमारे समाज के तथाकथित बौद्धिकों की अंतिम उम्मीद बन जाता है।

मुझे गुस्सा आता है, जब कांग्रेसी भ्रष्टाचार से त्रस्त आम जन के गुस्से का प्रतीक बना केजरीवाल उस मंदबुद्धि बालाधेड़ के साथ गलबहियां करता है, स्टालिन और कनिमोई के साथ मिलकर मोर्चा बनाने की सोचता या कहता भी है।

मुझे गुस्सा आता है, जब बनारस में विश्वनाथ कॉरीडोर के बहाने पूरे शहर को अतिक्रमण मुक्त करने की कोशिश होती है औऱ अफीमची-चरसी वामपंथी अचानक से भोलेनाथ के भक्त बन जाते हैं।

एक पौराणिक शहर को साफ-सुथरा और आकर्षक बनाने की पूरी कोशिशों पर पलीता लगाया जाता है, फर्जी संत खड़े किए जाते हैं, शिवलिंगों को कूड़े में दिखाने की नकली तस्वीरें शाया की जाती हैं…

लेकिन, और यह एक बड़ा लेकिन है, लेकिन कोई भी बुद्धि-पिशाच यह नहीं बताता कि मंदिरों पर कब्जा तो बनारस के स्वार्थी, पिशाचतुल्य, स्वार्थी मनुष्यों ने कर रखा था। यहां तक कि शिवलिंग को ढांपकर टॉयलेट बना रखा था।

मुझे खीझ होती है, जब कांग्रेसी छीछड़ों पर पल रहे वामपंथी बनारस की बदलती तस्वीरें नहीं दिखाते, चमचमाती सड़कें और साफ-सुथरे घाट नहीं दिखाते।

मुझे गुस्सा आता है, जब बिजली के तारों में कंटिया फंसानेवाले, ईस्टर्न पेरीफेरस से सोलर लाइट तोड़नेवाले, तेजस एक्सप्रेस से टैबलेट लूटनेवाले, महामना एक्सप्रेस से टोंटी और नलके चुरानेवाले, ट्रेन-18 पर पथराव करनेवाले हम लोग इस देश की सरकार से किसी भी तरह का हिसाब मांगते हैं… मुझे खीझ होती है, जब हमें अधिकारों की याद तो आती है, कर्तव्य भूले से भी याद नहीं रहते….।

मुझे खीझ होती है, जब सिख-नरसंहार का दोषी म.प्र. का मुख्यमंत्री बनता है, बनने के साथ ही तमाम नौकरशाहों की अपनी विचारधारा से नियुक्ति या तबादला करता है, बाकी पर रोक लगाता है, लेकिन तब कांग्रेसीकरण का आरोप कोई भी मक्कार धवलकेशी नहीं लगाता।

मुझे गुस्सा आता है, जब कांग्रेसी-वामपंथी युति से होनेवाली नियुक्तियां निष्पक्ष करार दी जाती हैं, इनके कार्यकर्ताओं को टी.वी. वाले पत्रकार, विचारक या एक्टिविस्ट बताते हैं।

मुझे खीझ होती है, जब वामपंथी हिंसा को हिंसा नहीं कहा जाता, मुसलमानी दंगों को दंगा नहीं, वामपंथी बलात्कार को बलात्कार नहीं और इन सब को शब्दों के खोल में छुपा लिया जाता है।

और, अंत में…

मुझे निराशा होती है इस 56 इंची सरकार से। कड़ी निंदा सिंह से, जो पूरे दो साल बाद भी जेएनयू के उन सड़कछाप लौंडो पर चार्जशीट तक नहीं फाइल कर सके, उनको मुफ्त में हीरो बनाया सो अलग (ख़बरों पर न जाइए, जब तक उन लौंडों पर चार्जशीट हो नहीं जाती, मानिए मत)…

मुझे निराशा होती है, जब पूरे पांच साल ये केवल रक्षात्मक बैटिंग करते रहे, शिक्षा और एकेडमिक्स का भगवाकरण न कर सके और सफाई ही देते रहे।

मुझे निराशा होती है, जब ये भाजपाई वामपंथी-कांग्रेसी धूर्तों का जवाब देते हैं। भई, हमारी एक विचारधारा है (अगर है तो) औऱ सत्ता में आने पर हम उसके हिसाब से चलेंगे ही…। इसमें जवाब क्या देना…?

मुझे निराशा होती है… प्रचंड बहुमत को इस तरह से पानी में जाता देख…

मुझे निराशा होती है… एक स्वर्णिम अवसर को चूकता देख, भारत का दुर्भाग्य देख, वामपंथियों-कांग्रेसियों की हंसी देख…

मुझे निराशा होती है…

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