हे पूर्व ब्यूरोक्रेट्स, फूल मोहम्मद याद है?

वर्ष 2011… राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले का मानटाउन थाना क्षेत्र।

इस वर्ष के फरवरी माह में एक महिला दाखा देवी की निर्मम हत्या कर दी गई। अधिकांश राजस्थानी देहाती महिलाएं पैरों में चांदी के भारी कड़े पहनती हैं। ऐसे ही भारी कड़े पहने दाखा देवी अपने घर के बाहर दालान में सो रही थीं। बदमाशों ने इन कड़ों के लिए उन्हें निर्दयता से मार डाला और दोनों पांव काट कर कड़े निकाल ले गए।

इस समय भी राज्य के मुख्यमंत्री कांग्रेस के वही दिग्गज नेता अशोक गहलोत थे, जो वर्तमान में भी सीएम हैं।

तब गृह विभाग सहित 11 विभाग सीएम ने अपने पास ही रखे हुए थे।

गहलोत जी छत्तीस क़ौम को साथ लेकर चलने का दावा करते हैं। अब यह अलग बात है कि ये छत्तीस क़ौम क्या हैं और कौन सी हैं, मैं आज तक समझ नहीं सका।

एक माह तक तमाम प्रदर्शन और ज्ञापन आदि देने के बावजूद अपराधियों के खिलाफ कोई कार्यवाई होते नहीं दिखी, तो जनता में गुस्सा फूट पड़ना स्वाभाविक था।

मार्च माह की 17 तारीख को एक बड़ा प्रदर्शन हुआ। राजस्थान ग्रामीण युवा शक्ति मोर्चा के तीस वर्षीय राज्य समन्यवक राजेश बडोलास अपने साथी बनवारी लाल मीणा के साथ केरोसिन लेकर पानी की टंकी पर चढ़ गए।

काफी समय तक नारेबाजी के बावजूद जब कहीं से कोई आश्वासन मिलता नहीं दिखा, तो राजेश ने स्वयं पर केरोसिन छिड़क कर आग लगा ली और उसके बाद टंकी से छलांग लगा दी। इससे उनकी घटनास्थल पर ही तत्काल मृत्यु हो गई। इस होनहार युवक की इस दुखद मृत्यु से लोगों का गुस्सा फूट पड़ा।

भीड़ ने मौजूद पुलिस बल पर पथराव शुरू कर दिया। पुलिस ने कुछ और अकड़ दिखाई, लाठियां भांजी, तो भीड़ बेक़ाबू हो गई। पुलिस की दो जीपों में आग लगा दी गई। एक जीप में बैठे एसएचओ फूल मोहम्मद की जीप में ही जल कर मौत हो गई। बाद में पुलिस ने गोलियां भी चलाईं, जिसमें एक युवक सिराज घायल हो गया। उसे इलाज़ के लिए जयपुर भेजा गया।

मुख्यमंत्री गहलोत उस समय दिल्ली यात्रा पर थे। तत्काल लौटे। अधिकारियों की उच्चस्तरीय बैठक में स्थिति की समीक्षा की। थानाधिकारी फूल मोहम्मद को शहीद का दर्जा देते हुए मृतक के परिजन को पच्चीस लाख रुपए, एक एमआईजी मकान, शहीद के नाम एक स्कूल का नामकरण, आश्रित को सरकारी नौकरी, बच्चों को मुफ्त शिक्षा और शहीद का अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान से कराने का फैसला किया।

पुलिस की गोली से घायल सिराज को भी एक लाख रुपए नकद सहायता देने और उसका उपचार मुफ्त में करवाने का फैसला भी लिया गया।

ध्यान दें, दाखा देवी और आत्मदाह करने वाले राजेश के पीड़ित परिवारों की कोई सुध-बुध नहीं ली गई।

अब ज़रा सोचिए – उत्तर प्रदेश में एक पुलिस वाले की हत्या को अभूतपूर्व घोषित करते हुए 83 पूर्व ब्यूरोक्रेट्स और आईपीएस सामने आए हैं। उन्होंने पुलिसकर्मी की हत्या को अक्षम्य घोषित करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से इस्तीफा मांगा है। इस खुले पत्र में बहुत सारी बातें हैं, जिनके बिंदुवार जवाब देने लगूं, तो ये तमाम सेवानिवृत चमचे खड़े-खड़े अपनी पेंट गीली कर लें, लेकिन अभी सिर्फ कुछ सवाल।

जब कांग्रेसी शासन के दौरान एक थानाधिकारी फूल मोहम्मद को जला कर मार डाला गया था, तब आप सब आंखों पर कौन सी पट्टी बांधे थे?

क्या तब इसे लिंचिंग नहीं कहा जाना चाहिए था और इसके लिए तत्कालीन सीएम का इस्तीफा नहीं मांगना चाहिए था?

आज एक हिंदू पुलिसकर्मी मारा गया, तो आपको यह मुस्लिमों को समाज से अलग-थलग करने की साज़िश नज़र आ रही है, जब एक मुस्लिम थानाधिकारी जिंदा जला दिया गया, तब वह क्या था? किसके खिलाफ, कैसी साज़िश थी?

जब मुस्लिम थानाधिकारी को जलाया गया, तब आप 83 में से अधिकांश अपने सरकारी पदों पर होंगे। तब इस्तीफा देकर सड़कों पर क्यों नहीं आए?

एक एक्टर को आज डर लग रहा है – या खुदा! एक पुलिसवाला मारा गया। अब मेरे बच्चों का क्या होगा? वे तो इस मुल्क में असुरक्षित हैं।

जनाबे-आला, वह फूल मोहम्मद था। आपकी उम्मा का एक हिस्सा। तब आपका यह डर कहां था?

थोड़ी तो शर्म करो यार ! माना कि जनता भुलक्कड़ है, लेकिन उसे याद दिलाने वाले हम जैसे बहुत सारे अभी ज़िंदा हैं,यह भी याद रखो।

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY