ग्लिसरीन के आँसू और सेक्यूलर करुणा

नसीरुद्दीन शाह के डर से पहले आमिर खान और शाहरुख का डर भी सेक्यूलर इण्डिया को दहला चुका है और इस बार जब ’ए वेन्सडे’ के राष्ट्रवादी नायक के मन में यही डर उमड़ा तो हमारा साम्प्रदायिक मन परेशान हो गया कि आखिर हो क्या गया है हमारे भारत को।

पिटता तो हर जगह हिन्दू है पर डरने वाला हृदय बहुसंख्यक का क्यों नहीं? बॉडीगार्ड्स और बाउंसरों से घिरे ये नचनिये आखिर डर क्यों जाते हैं जबकि अगर सीन की माँग ना हो तो ये खाँसते भी नहीं?

शायद इन्हें भी नहीं मालूम होगा कि डाइरेक्टर के लाइट्स कैमरा और एक्शन की आवाज़ के बगैर स्वाभाविक रूप से कब डरे होंगे। मुझे समर-सेट-मॉम की एक रचना में एक युवा पुत्र अपनी अभिनेत्री माँ से कहता है कि पता नहीं चलता है कि तुमने मुझे सचमुच इतने लाड़ प्यार से पाला है या ऐसा करने की ज़बरदस्त एक्टिंग कर रही थी। यही बात मुझे बॉलीवुड के भयाक्रान्त बादशाहों को देख कर लग रहा है।

कश्मीरी पंडित दर ब दर हुए…. ये नहीं डरे।

मुम्बई में बम धमाके हुए… जानें गईं… ये अप्रभावित रहे… नहीं डरे।

बनारस विस्फोट से दहल गया पर…. ये नहीं डरे।

बॉलीवुड अण्डरवर्ल्ड के हाथों का खिलौना बना…. ये नहीं डरे।

गुलशन कुमार दिन दहाड़े गोलियों से छलनी हुआ… ये नहीं डरे।

ऑपरेशन ब्लू स्टार की सफलता के बाद इंदिरा गान्धी की हत्या और फिर सिखों की सामूहिक हत्या हुई…. ये नहीं डरे।

हाल के दिनों में मुंबई और गुजरात में बिहारी पिटे…. ये नहीं डरे।

२६/११ के तमाशे हुए…. ये नहीं डरे।

कैराना से हिन्दुओं का पलायन भी हुआ… ये नहीं डरे।

पर इन दो चार हफ़्तों में आखिर क्या हुआ कि नसीर साहेब डर गये? सारे नामचीन मुसलमान अभिनेताओं की शादियाँ लगभग हिन्दू घरानों में ही हुई हैं पर आप शायद गूगल भी कर लें तो ढ़ूँढ नहीं पाएँगे ऋतिक रौशन को छोड़ कर कोई हिन्दू अभिनेता जिसकी शादी किसी मुसलमान घराने में हुई हो और वह अभी भी हिन्दू बना हुआ हो।

फिर भी इनकी फ़िल्में देखने में आज भी हर भारतीय उत्सुक रहता है। मेरा मानना है भारतीय माने हिन्दू। शायद ही आपने कोई मुसलमान देखा हो जो भारतीय नागरिक हो पाकिस्तान के नाज़ायज़ हमलों पर भी उसकी बुराई करता हो पर आज भी लाखों हिन्दू मिल जायेंगे जो भारत के सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत माँग रहे हैं और इसे धर्मनिरपेक्ष भारत का एक कलंक मान रहे हैं।

नसीर साहेब के बारे में ज़िक्र करते हुए ये बताता चलूँ कि उनका बड़ा फ़ैन हूँ और नाना पाटेकर, ओम पुरी के अलावा इनकी एक भी फ़िल्म किसी भी हालत में छोड़ना नहीं चाहता पर आपको ये बात भी बता दूँ कि भारत ही दुनियाँ का एक अनोखा मुल्क है जहाँ वामपंथी और मुसलमान एक साथ पाये जाते हैं। न किसी मुस्लिम देश में वामपंथी हैं (और वहाँ लेफ़्ट का प्रयोग बस हाथ के लिये ही होता है) और न वामपंथी देश में आज़ाद मुसलमान।

यह भी सनद रहे कि तीनों खानों…. सैफ़, शाहिद और फ़रहान अख्तर को भी जोड़ लें (और नसीर बाबू तो हैं ही ) इन सारे चिर युवा और आधुनिकाओं के हार्टथ्रोब छिछोरे नचनियों को किसी पाकीज़ा ने आज तक अपने दिल के संदूक में जगह नहीं दी है। ये तो सेक्युलर हिन्दू बापों की बिगड़ी दुख्तरान का दिल न जाने कैसे फ़िदा हो गया इन पर वर्ना हमारे सेक्यूलर हृदयसम्राट अर्द्ध या छद्म-सनातनी मोस्ट एलिजिबल बैचलर की लिस्ट में अकेले नहीं होते।

ये तो शुक्रिया अदा कीजिये एक मिस वर्ल्ड का जिसने एक हिट-एण्ड-रन अभियुक्त सह हिरण-हत्याभियोगी का साथ छोड़कर एक कवि-पौत्र से गठबन्धन कर लिया वर्ना आज उन का साथ देने के लिये “तारक मेहता का उल्टा चश्मा” धारावाहिक वाला पोपट लाल ही रह जाता।

और आपने सोचा है कि अगर यही घटना किसी सनातनी युवा और एक पाकीज़ा की प्रेमकथा में होती तो अबतक फ़तवे जारी हो चुके होते और बेमौसम बकरीद का माहौल हो चुका होता या वह युवा शान्ति धर्म का समर्थक बन गया होता।

जिन्हें सेक्युलरिज़्म की बीमारी के कारण ग़ज़नीत्वप्राप्त हो गया हो वे देवानन्द और सुरैया उपाख्यान का पुनः पारायण कर सकते हैं।

अब फिर इनके डर पर विचार करें तो ये बताना ज़रूरी होगा कि आज से १४०० साल पहले इस्लाम को कोई खतरा नहीं था क्योंकि इस्लाम पैदा भी नहीं हुआ था और २१०० साल पहले ईसाइयों को भी क्रुसेड की ज़रूरत नहीं थी। चार पाँच सौ साल और जोड़ लें तो पारसी और यहूदी धर्म के भ्रूण की कल्पना कोई नहीं कर सकता था फिर इन सबका डर कैसा।

कश्मीर के हज़रत बाल दरगाह में रखे गये मुहम्मद साहेब के पाक बाल, गोवा के चर्च में आज तक सँजो कर रखे गये सेंट फ़्रान्सिस का शव और राजस्थान के पुष्कर में यहूदियों का पवित्र सिनेगाग ये बताने के लिये काफ़ी है कि आर्यावर्त में किसी के मन में किसी को डराने की इच्छा कदापि नहीं रही।

एक और बात मुझे आश्चर्यचकित करती है कि हमने मान लिया कि हज़रत का हिज़रत कराने में शायद सनातनियों की भूमिका रही हो पर अगर ये सनातनी इतने ताकतवर थे कि उस परवरदिगार के इकलौते वारिस को दर ब दर करने की हैसियत रखते थे तो आज उस सरज़मीन पर सनातन धर्म का एक भी तर्पणकर्ता क्यों उपलब्ध नहीं है?

खैर इतिहास चाहे वामपंथियों की कलम से लिखा जाये पर छः सात सौ साल पहले अरब देशों में इस्लाम के अस्तित्व नहीं दिखा सकते। और आज अगर वह सारी ज़मीन इस्लामिक राष्ट्र घोषित हो चुका है तो डरे कौन होंगे, मुसलमान या हिन्दू।

गज़ब बात है ना कि डरने वाले की तादाद करोड़ों में पहुँच जाये और डराने वाली ताकतवर कौम का कोई नाम लेवा पानी देवा भी उस सरज़मीन पर बाकी ना बँचे… ऐसे डर को ताड़नेवाली आँखें वामपंथियों की ही हो सकती हैं।

बदरीनाथ, शंकराचार्य, अमरनाथ और वैष्णो देवी के पुजारियों को छोड़ कर एक भी कश्मीरी ब्राह्मण अपनी जन्मभूमि पर जीवित क्यों नहीं है? आप कभी भी पुजारियों के जान माल की सलामती के लिये इस्लाम में दया के तत्व न ढूँढ़ें… कारण यह विशुद्ध व्यावसायिक मामला है।

ये पुजारी मरे कि तीर्थ यात्रा उद्योग का विनाश तय और साथ साथ कश्मीरियों के रोजगार का भी। घोड़े – खच्चरों की सवारी से लेकर मुसाफ़िर खानों की देख भाल तक शान्ति प्रेमियों के हाथों में ही है। इन तीर्थों से अगर ब्राह्मण मरे तो श्रद्धालुओं का आना समाप्त…. रोजगार खत्म।

जनाब, मंदिरों पर कब्ज़ा तो किया जा सकता है पर उसका पुजारी नहीं बना जा सकता।
पाकिस्तान का भी हाल ज़ुदा नहीं । वहाँ के हिन्दू या तो अब मुसलमान हैं या फिर नहीं हैं।

नसीर साहब कभी सोचकर ये बतलाते तो बेहतर होता कि मुसलमानों को डराने-धमकाने वाला हिन्दू आज पाकिस्तान का सिर्फ़ दो प्रतिशत क्यों रह गया है और बाँग्ला देश में २२% से घट कर १०%। अजीब नहीं लगता कि डरने वाला आबादी में बढ़ रहा है और तथाकथित डरानेवाला खुद व खुद अपनी वज़ूद खोता जा रहा है।

ये सेक्यूलर आँसू बहानेवाले कलयुगी रक्तबीज हैं। अब एक माँ काली के अवतरण की आवश्यकता मुझे अवश्यंभावी जान जान पड़ती है जो इन आँसुओं कि ज़मीन पर गिरने न दे। अगर ये आँसू ज़मीन पर गिरते रहे तो सनातन धर्म में निहित “वसुधैव कुटुम्बकम् और शरणागत की रक्षा” के छिद्र से अधर्म धर्मनिरपेक्षता के रूप में अपनी संख्या बढ़ा कर कब आपके धर्म और धर्मावलंबियों को डंस जाये पता नहीं।

आततायी का समर्थक अपने रथ का पहिया कीचड़ से न निकाल पाये ये बताने के लिये स्वयं सर्वशक्तिमान धर्मरथ पर बैठा था, यही कारण था कि संख्याबल कम होने पर भी धर्म के समर्थक अधर्म के आकांक्षियों पर विजयी रहे जब कि ऐसी ही उचित परामर्श के अभाव में अधर्म ने धर्म की आड़ लेकर राज सभा में कुलवधू का चीरहरण भी संभव कर दिया था। अधर्म के तर्क के सामने धर्म ठगा सा रह गया था। जुए की चालों को धर्मयुक्त दिखा कर मानवीय मूल्यों को अधर्म घोषित कर दिया गया। विदुर की नीति, भीष्म का शौर्य और कुरुश्रेष्ठ का न्याय भौंचक्का सा अधर्म को जीता हुआ देखता रह गया।

पीडितों पर दया आर्य धर्म है पर पीड़ा के अभिनय पर व्यथित होना मानसिक दुर्बलता और वैचारिक तंद्रा। मानदेय प्राप्त कर अश्रुपात करने वाले के अभिनय का आनंद लें न कि उस अभिनेता को ये मौका दें कि वह आपका वैचारिक हाइजैक कर ले।

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