हिन्दू राजशाही कैसे गयी?

सोलहवीं सदी की बात है, बादशाह शाहजहाँ अपने दरबार में तीस करोड़ के जवाहरातों से बने ‘तख्तेताउस’ पर बैठा हुआ था। दायीं ओर वज़ीर दिलदार खां की गद्दी तो बायीं ओर सिपहसालार सलावत खां की गद्दी थी।

तभी राठौर राजा अमर सिंह दरबार में आये और बादशाह को सलाम किया, लेकिन न तो वज़ीर और न ही सेनापति सिपहसालार को। वज़ीर सूफी आदमी था, किसने सलाम किया और किसने नहीं, यह दिल से न लगाता था। परन्तु सेनापति की भृकुटी चढ़ गई, उसने बात को अपनी आबरू पर ले लिया।

सेनापति- राजा साहब। आप आठ दिन की छुट्टी पर गए थे, और आज सोलहवें दिन तशरीफ़ ला रहे हैं।

अमर सिंह- मैं राजा हूँ। जी में आया तो आया, नहीं आया तो नहीं आया।

सेनापति- आप राजा थे, तब थे। अब आप मेरे मातहत ‘राजपूत लश्कर’ के सेनापति हैं। मैं आपका अधिकारी होने के नाते जवाब चाहता हूँ।

अमर- जवाब? काम लग गया था।

सेनापति- काम लग गया था तो जहाँपनाह के पास रुखसती दरख्वास्त भेजना था न? लेकिन आपको तो बादशाही-इस्लामी से इनकार है। इसीलिए गुस्ताखी करते हैं, क्यों वज़ीर साहब?

वज़ीर- हुआ क्या? जाने भी दो यार। राजा अमरसिंह साहब, आप ठीक कहते हैं। आप आज़ाद हैं। नौकरी तो बस दिलचस्पी के लिए है, न कि बवाले जान। लानत है ऐसी नौकरी पर।

सेनापति- माफ़ी हरगिज नहीं दी जायेगी। राजा साहब, आप पर सात दिन के लिए सात लाख रुपये का जुर्माना किया जाता है। शाम तक रुपये खज़ाने में जमा कीजिये, तब तक आप दरबार के नज़रबन्द हैं। खबर भेजिए घर।

अमर- बादशाह सलामत। सेनापति क्या फरमा रहे हैं?

वज़ीर- वही तो मैं भी कह रहा हूँ, सलावत मियां को न मालूम कौन सा बुखार चढ़ आया है।

अमर- जहाँपनाह। इन्साफ कीजिये।

वज़ीर- इन्साफ तो साफ़ है…
“आईना। मुंह पर ही कहता है साफ़ साफ,
सच यह है, जो साफ़ होता है, सफा कहता है।।”

अमरसिंह- क्यों सेनापति। किसने जुर्माना किया और नज़रबंदी का क्या मतलब है?

वज़ीर- वही तो। नज़रबंदी का तमाशा हो रहा है-
“संभल कर बैठना, जलवा मुहब्बत देखनेवाले,
तमाशा खुद न बन जाना तमाशा देखने वाले।।”

सेनापति- मैंने किया जुर्माना। मैं आपका अफसर होता हूँ, सभी सेनापतियों का प्रधान सेनापति।

वज़ीर- ये बात भी सही। जुर्माना तो होना ही चाहिए, सात लाख न सही सात रुपये ही सही। क्यों राजा साहब, आपकी क्या राय है?
“खुदा ने हुस्न नादानों को, बख्सा जर रजीलों को,
अक्लमंदों को रोटी खुश्क, औ हलुवा वखीलों को ।।”

अमर- अगर मैं जुर्माना न दूँ?

वज़ीर- मत दो, एक पैसा मत दो। मैंने माफ़ किया।

सेनापति- आप माफ़ करने वाले कौन? यह मेरे महकमे की बात है।

अमर- नज़रबंदी के क्या मायने सेनापति?

वज़ीर- नज़र से सर कलम कर दे, उसे शमशीर कहते हैं,
निशाने में जो लग जाए, उसी को तीर कहते हैं।।

सेनापति- जब तक आप जुर्माना अदा नहीं करवाते, यहाँ से जा नहीं सकते।

अमरसिंह- और रात में?

वज़ीर- रात में इसी ‘तख्तेताउस’ पर सोना। तीस करोड़ के पलंग पर सो लो अमरसिंह। इतनी बेशकीमती चारपाई, सोने के लिए बेचारे बादशाह को भी नसीब नहीं। आज तुम सो लो प्यारे।

सेनापति- रात को जेल में सोना होगा।

अमरसिंह- मुझे नज़रबन्द किया किसने?

सेनापति- दरबार और बादशाह ने।

वज़ीर- दरबार की तरफ से मुझे इनकार है, और बादशाह! खुदा इन्हें हरा रखे, ये बेचारे तो एक शब्द बोले भी नहीं। एक शायर ने तो कलम ही तोड़ दी है इसी बात पर-
“इबादत की इबादत है, मुहब्बत की मुहब्बत है,
मेरे माशूक की सूरत खुदा से मिलती जुलती है।।”

अमरसिंह- बादशाह कुछ बोलते क्यों नहीं?

वज़ीर- नहीं बोलते। मर्ज़ी है प्यारे। बोलने में तकलीफ है, तुम आगे सुनो-
“शेख जी से मैंने पूछी, मंज़िल जब यार की,
बुतकदे की ओर चुपके से इशारा कर दिया।।”

अमरसिंह- सात दिन तक मैं अपने गुरूजी के पास कजरीवन में रहा, वहाँ से ख़त कैसे भेजता? आज आया हूँ, तो बताने का मौका ही नहीं दिया गया। इसलिए अब गैरहाज़िरी नहीं रही।

वज़ीर- शाबाश। देर आइद दुरुस्त आइद। सच है लड़के, शेर बब्बर के बच्चे। किसी फ़क़ीर की खिदमत तो इनाम का काम हुआ, जुर्माने का नहीं। लो, मैं तुम्हें सात लाख देता हूँ, यही सलावत को दे दो। खर्च की कमी होगी, इसीलिए तो सात लाख की भीख बेईमानी से माँग रहा है। ऐसे तो यह जुर्माना तुम पर न होकर फ़क़ीर पर हुआ, कि उसने तुमसे काम लिया। और फ़क़ीर पर जुर्माना? सलावत भाई, तौबा करो तौबा। लानत है। इधर सुनो-
“तमन्ना दर्ददिल में हो, तो कर खिदमत फकीरों की,
नहीं वह ‘लाल’ मिलता है, अमीरों के ख़जाने में ।।”

सेनापति- मैं कोई उज्र न सुनूंगा, शाम तक सात लाख लाइए।

वज़ीर- लाइए? केवल ‘ला’ पढ़ा है, ‘द’ नहीं। एक शायर का हाथ चूम लेने का दिल करता है, सुनो-
“बहुत मुश्किल निभाना है मुहब्बत अपने दिलबर से,
उधर मूरत अमीराना इधर हालत फकीराना।।”

अमरसिंह- न मैं जुर्माना दूँगा, न मैं नज़रबन्द हूँ। राजा हूँ मैं।

वज़ीर- आज़ादी है। जाओ बेटे, मौज करो। नया गौना करा लाये हो, मौज करो। सिर्फ महीने में पहली को सलाम कर जाना। यहाँ कोई हमलावर तो चढ़ नहीं आया है कि सारे सेनापति यहाँ जमा रहें। जब ऐसा होगा, तब बुला लिया जाएगा। मैं तो कहता हूँ सारे ही चले जाओ, सबकी छुट्टी। बेकार की चीं-चीं से यही अच्छा है।

सेनापति- यही बात बादशाह फरमा दें। क्या हुक्म है जहाँपनाह?

वज़ीर- बादशाह और वज़ीर में बस इतना ही फर्क है कि वह सोलह आने तो मैं चौदह आने। और जहाँपनाह यहाँ हैं ही कहाँ? यहाँ तो सिर्फ उनका ‘बदन’ लुढका पड़ा है, दिल तो ताजमहल में है ‘हाय बेगम’ करता हुआ।
“चाँद बदली में छिपा है, मुझे मालूम न था,
सकल इंसान में खुदा है, मुझे मालूम न था।।”

बादशाह- क्या कहते हो सेनापति?

सेनापति- आपकी लापरवाही से ये काफिर लोग हमारी बराबरी करने लगे हैं।

‘काफिर’ सुनते ही अमर सिंह ने तलवार म्यान से निकाला और सलावत खां का सिर धड़ से अलग कर दिया। उसके कटे शरीर से खून फव्वारे की भांति भरे दरबार में छूटने लगा।

यह हाल देख ‘दरबार रक्षक सेना’ आगे बढ़ी और उधर अमर सिंह बादशाह की ओर झपटा। वज़ीर ने बादशाह का हाथ पकड़ा और खिड़की की राह से महल में घुस गया। भीतर से खिड़की बंद कर ली और दोनों वहीँ बैठ गए।

बादशाह- यह क्या हुआ वज़ीर?

वज़ीर- आप कहाँ थे हुज़ूर?

बादशाह- मैं? मैं तो ताजमहल में। आप कहाँ थे?

वज़ीर- शायरी में।

बादशाह- अमर सिंह ने सलावत खां को मार डाला, मगर मेरी ओर क्यों झपटा?

वज़ीर- कदमबोशी करने हुज़ूर। नया गौना करा लाया है। इस ‘पाक हिन्दू कौम’ एक यह कायदा है कि जब ब्याह-गौना होता है, तब दुलहा लोग माँ-बाप-गुरु और राजा के चरण छूते हैं, कदमबोशी करते हैं।

बादशाह- लाहौलविला कुव्वत। मैंने तो समझा कि अब ये मुझे मारने झपट रहा है।

वज़ीर- हुज़ूर, हिन्दू बिला वजह किसी को नहीं मारते हैं। यह तो हमारी कौम है जिसको इंसानियत से ही बैर है। अल्लाह की बनाई इस खूबसूरत दुनिया से ही इस कदर बैर है कि इसको बदसूरत करने में ही ज़िंदगी गुज़ार देते हैं। और उस समय मैंने आपको डरते देखा था, इसीलिए आपको यहाँ उठा लाया..
“रहमान के फिराश्ते’ गो हैं बहुत मुक़द्दस?
शैतान ही की जानिब, लेकिन मिजोरटी है ।।”

बादशाह- वज़ीर, दरबार में अभी भी लड़ाई हो रही है?

वज़ीर- दरबार के तीन सौ सिपाही जबतक साफ़ न हो जायेंगे, लड़ाई तब तक चलेगी। किसी ने क्या खूब कहा है,
“बुतपरस्ती मेरे हक़ में हकपरस्ती हो गयी,
दे दिया तेरा पता कुछ यार की तस्बीर ने ।।”

बादशाह- वह सबको काट डालेगा? बड़ा बहादुर है क्या?

वज़ीर- बेशक। एक शेर का बच्चा एक हजार भेड़ियों के लिए काफी है और यहाँ तो सिर्फ तीन सौ हैं। लेकिन जहाँपनाह, मेरे दिमाग में अक्सर यह सवाल आता है कि जब ऐसे बहादुर हिन्दू मौजूद हैं, तब हिन्दू शाही क्यों ख़त्म हुई?

बादशाह- सलावत जैसे ही हिन्दू की मुहब्बत को इस्लाम से दूर किये हुए है। हिन्दू शाही क्यों गयी, यह आगे मालूम होगा।

वज़ीर- एक शायर ने कहा है…
“मुहब्बत करो और निभा लो तब पूछना,
कि दुश्वारियाँ हैं कि आसानियाँ हैं ।।”

बादशाह- सलावत ने काफ़िर कहा था उसको। काफ़िर का मतलब क्या है?

वज़ीर- “वह काफिर है जो सिजदा न करे बुतखाना समझकर।”

बादशाह- हिन्दू काबिले-दोस्ती हैं। वे इस्लाम की मुहब्बत की आज़माइश लेना चाहते हैं।

वज़ीर- लेना चाहते हैं, तब देना चाहिए न।

बादशाह- हिन्दू हमारी मुहब्बत चाहता है। हिन्दू को काफिर नहीं कह सकते।

वज़ीर- बिलकुल जनाब, इस्लाम कहता है खुदा निराकार है। हिन्दू कहता है निराकार और साकार दोनों है। मगर ‘है’ तो कहता है, ‘नहीं है’ तो नहीं कहता हैं न?

बादशाह- दरबार में अब बिलकुल सन्नाटा है, क्या उसने सभी को मार डाला?

वज़ीर- सन्नाटा? कब्रिस्तान कहिये हुज़ूर। वो सभी को काट कर चला गया।

बादशाह- मैं अब भी अमर सिंह को माफ़ करता हूँ। अमर सिंह को बुलवाओ।

खिड़की खुल गयी, दोनों फिर से अपने अपने सिंहासन पर आरूढ़ हुए।

वज़ीर- क्या कोई ऐसा बचा है दरबार में, जो ‘खातिर’ के साथ, सम्मान के साथ अमर सिंह को लिवा लाये?

अर्जुन सिंह- मैं हूँ। मैं उनका साला हूँ।

वज़ीर- जाओ, जाकर उसको लिवा लाओ। कहना- ‘बादशाह ने बुलाया है’। अर्जुन, तुमको एक लाख रुपया इनाम दिया जाएगा।

अर्जुन सिंह गया। अपनी बहन को अपने पक्ष में करके अमर सिंह को भरोसा दिलाकर लिवा लाया। चूँकि किले का फाटक बंद था, तो खिड़की से घुसना हुआ। पहले अर्जुन भीतर आया और फिर जैसे ही अमर सिंह ने खिड़की में अपना सिर डाला, नंगी तलवार निकाले अर्जुन ने अमर सिंह का सिर काट लिया। कटा हुआ सिर बादशाह के क़दमों रखकर अर्जुन खड़ा हो गया।

बादशाह- यह किसका सिर है, और इसको किसने मारा है?

अर्जुन- बादशाह के दुश्मन और इस्लाम के दुश्मन, अमर सिंह का सिर है गरीबपरवर, और इसको मैंने मारा है यह सोचकर कि आप बहुत खुश होंगे।

बादशाह- खुश? मैं तो बहुत नाखुश हुआ नालायक।

वज़ीर- नाखुशी की बात ही है। क्यों मारा जब बोला गया था कि इज्ज़त के साथ लिवा लाओ? तुमने कैसे जान लिया कि इसको सज़ा दी जाती? इसको तो इनाम दिया जाता। इसको तो प्रधान सेनापति बनाया जाता। तूने अपनी बहन को अपने हाथ से बेवा किया नामुराद।

बादशाह- मेरी आँख में आँसू आ गए हैं। जिस दिन बेगम मरी थी उस दिन के बाद आज आँसू छलके हैं।

वज़ीर तलवार निकाल कर अर्जुन को मार डालने झपटा, लेकिन बादशाह ने रोक लिया, “एक सियार पर अपनी तलवार चलाओगे? शेर तो चला गया।”

वज़ीर- नहीं चलाऊंगा हुज़ूर अब। यह सियार ही है, यही काफिर है। इसको गधे पर बिठाकर पहले जुलूस निकाला जायेगा अब।

बादशाह- वज़ीर, आपने पूछा था कि हिन्दू राज शाही कैसे गयी? देख लो, ऐसे गयी। अब समझ गए?

वज़ीर- जी हुज़ूर। अब सब समझ गया। हम जैसों के बस की बात ही नहीं थी कि हिन्दोस्तान पर राज कर पाते, गर अर्जुन सिंह जैसे गद्दार, देशद्रोही, स्वार्थी, नीच और कायर यहाँ न होते।

अभी तीन राज्यों के चुनाव में यही हुआ। 2019 में भी यही हो सकता है…

“संभल कर बैठना, जलवा मुहब्बत देखने वाले,
तमाशा खुद न बन जाना तमाशा देखने वाले।।”

(कहानी का स्रोत- गीताप्रेस)

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