मुझे बहुत गुस्सा आता है, जनाब…

गुस्सा तो मुझे बहुत आता है, जब नसीरुद्दीन शाह जैसा सितारा अजमेर साहित्य समारोह में शिरकत करने से तो मना कर देता है, क्योंकि कुछ लोगों ने उसके बेहद दुखदायी बयान का विरोध कर दिया, हो सकता है कुछ ने अभद्र भाषा का भी इस्तेमाल किया हो।

पर वही नसीर भूल जाते हैं कि राजस्थान के जयपुर में ही साहित्य-महोत्सव में सलमान रश्दी को आने तक की इजाजत नहीं दी गयी थी। विरोधस्वरूप जिन चार लेखकों-कलाकारों ने सैटेनिक वर्सेज़ की पंक्तियां पढ़ीं, उनको भी बोरिया-बिस्तर लाद कर भागना पड़ा था…

गुस्सा मुझे तब बहुत आता है, जब तसलीमा को बाल से पकड़ कर हैदराबाद में कुछ मोमिन पीटते हैं और तथाकथित लिबरल-सेकुलर-थिंकर केंचुए कुछ नहीं बोलते, तथाकथित प्रगतिशील बौनों के मुंह में मेंढक घुस जाता है।

गुस्सा तो मुझे तब भी बहुत आया था, जब हुसैन अपनी मां और फातिमा को तो पूर्णरूपेण ढंका चित्रित करता था, लेकिन लाखों हिंदुओं की मां सरस्वती और दुर्गा को नंगा दिखाता था।

गुस्सा मुझे तब भी आया था, जब रीढ़विहीन प्रगतिशीलों की नाबदानी जमात बिल्कुल चुप्पी मार गयी थी और वही हुसैन जब मोमिन होने के नाते कतर में रहने गया था (शुक्र है खुदा का कि उस वक्त मोदी सरकार नहीं थी) तो लिबरलों की लीचड़ भीड़ ने हा हुसैन का सोग बुलंद किया था।

गुस्सा मुझे तब भी आता है, जब एक अनपढ़, मंदबुद्धि, जाहिल औऱ झूठे को इस देश के संभावित पीएम के तौर पर थोपने की चहुं ओर कोशिश होती है। जब खुद ज़मानत पर चल रहा खानदानी चोर इस देश के पीएम पर तोहमत लगाता है, ऊंगली उठाता है, कोर्ट-सेना-सभी से ऊपर उठकर वह अपनी एक समानांतर चिंचियाहट जारी रखता है।

वह संसद के सामने खड़ा होकर यह झूठ बोलता है कि इस सरकार ने आज तक किसानों का ऋण माफ नहीं किया, तो आपकी नाबदानी जमात से उठ कर कोई भी यह नहीं बताता कि योगी सरकार ने तो सबसे पहले यह काम किया था। तब मुझे सचमुच बहुत गुस्सा आया था।

गुस्सा मुझे तब भी आता है जनाब, जब इस देश की यूनिवर्सिटी में देश के टुकड़े होने के नारे लगते हैं, जवानों की शहादत का जश्न मनता है और लड़की छेड़ने के जुर्म में सज़ा पा चुके उस लौंडे को आपकी जमात अपना नायक बनाती है, हीरो बनाती है। आपके मशहूर साथी शबाना-जावेद तो उसे अपना बेटा ही बना लेते हैं।

गुस्सा मुझे बेतरह आता है, जनाब नसीर! तब आता है, जब एक व्यक्ति और पार्टी के विरोध में आप और आप जैसे लोग यही भूल जाते हैं कि वह कब देश का ही विरोध करने लगे।

गुस्सा तब भी आता है, जब लगातार झूठ परोस कर आप इस देश पर कीचड़ उछालते हैं, इसे लांछित करते हैं और आप जैसों को दंडित करने का कोई प्रावधान हमारे देश में नहीं है।

गुस्सा मुझे आता है, बेतरह आता है… काश कि आप स्टालिन, माओ, कास्त्रो या कम से कम ज़िया उल हक के देश में ही होते। आपको पता तो चलता कि असहिष्णुता होती क्या है…

मुझे गुस्सा आता है कि देश के पीएम को दिन-रात गालियां सुनाने के बावजूद आप और आपकी जमात के लोग इनटॉलरेंस का रोना रोते हैं…

गुस्सा मुझे आता है, मोदी पर… कि वह सचमुच का तानाशाह क्यों न हुआ…

गुस्सा मुझे आता है, हिंदुओं पर… कि वे सचमुच के असहिष्णु क्यों न हुए, कि 1947 में न सही, 2017 में भी वे इस गंगा-ज़मनी तहज़ीब के फरेब को फाड़कर फेंक क्यों नहीं देते…

गुस्सा मुझे आता है, इस दोगले निज़ाम पर… जो आप जैसों को सिर चढ़ाता है, आपको प्यार देता है, सम्मान देता है और बदले में आप…

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