महाभारत के गुरु – 1

राजामौली की फिल्म के लिए बनाया गया द्रोणाचार्य बने रजनीकांत का स्केच, इन्टरनेट से साभार।

‘नरक की आग में जलना’ एक सामान्य सा जुमला है। थोड़ा प्रयास करें तो इसमें छुपा हुआ मैकॉले मॉडल का असर भी आपको दिख सकता है।

भारतीय सभ्यता-संस्कृति में अग्नि को स्वयं भी पवित्र माना जाता है और ये जिसे छुएगी उसे भी पवित्र कर देगी।

ऐसे में रौरव या कुम्भीपाक जैसे नरक काटे जाने या गर्म सलाखों से दागने वाली, कड़ाहे में तल देने वाली जगहें हो सकती हैं लेकिन सीधा आग पर नहीं डालते।

सीधा आग में जलने पर तो वो पवित्र हो जाएगा और उसे नरक से छोड़ना पड़ेगा! ये सेमेटिक मज़हबों के हेल-फायर से आया है, जिसे अनजाने ही आपने सच मान लिया है।

ये बिलकुल वैसा ही है जैसे खेलों में कोच को दिया जाने वाला सम्मान, द्रोणाचार्य के नाम पर दिया जाना। एक गुरु या आचार्य को कैसा नहीं होना चाहिए, उसका द्रोणाचार्य अच्छे उदाहरण थे। उल्टा उनके नाम पर यहाँ सम्मान दिया जाने लगा है।

महाभारत के हिसाब से द्रोण की कहानी वहां शुरू नहीं होती जहाँ उनके कौशल की खबर लिए लोग भीष्म के पास आते हैं। वो उस से बहुत पहले ही ऋषि भरद्वाज के आश्रम में द्रुपद के साथ शिक्षा ले रहे थे। शिक्षा के बाद जहाँ द्रुपद राजा हो गए, वहीँ द्रोण वापस गरीबी में जीवनयापन कर रहे थे।

अपनी गरीबी से परेशान द्रोण किसी पुराने वचन की याद दिलाकर द्रुपद से मदद लेने पहुँचते हैं। अब ये सामान्य सी नीति है कि दो लोगों की आज जो परिस्थिति है, कल अगर बदल जाए तो दोनों को एक दूसरे को अपने समकक्ष नहीं मानना चाहिए। कम से कम लोगों के सामने उनके आपसी बर्ताव में अंतर आएगा।

द्रोण ऐसा कुछ भी नहीं करते और शिक्षित होने के बाद भी लोकव्यवहार को ताक पर रख देते हैं। इससे पहले भी उन्होंने अपनी शिक्षा का कोई इस्तेमाल किया हो, ऐसे उदाहरण नहीं मिलते। वो थोड़े ही दिन पहले परशुराम के आश्रम से लौटे थे।

विद्याध्यन के बाद गरीबी में जीवनयापन कर रहे द्रोण को जब मालूम हुआ कि परशुराम अपनी सारी संपत्ति दान कर रहे हैं, तो वो भी उनके पास मांगने चले। जबतक द्रोण पहुँचते, परशुराम सबकुछ दान कर चुके थे। उन्होंने कहा अब मेरे पास केवल शस्त्रविद्या ही बची है। तुम चाहो तो वो ले सकते हो।

अतः द्रोण वहां से केवल हथियार चलाना सीखकर लौटे थे। हाँ इसका ये नतीजा ये जरूर हुआ कि परशुराम और उनके बाकी शिष्यों की तरह वो करीब करीब अजेय योद्धा हो गए। भीष्म, कर्ण या कृष्ण जैसे योद्धाओं की ही तरह जबतक द्रोण युद्ध में हथियार नहीं रखते, उन्हें मारना संभव नहीं था।

लोकव्यवहार को ताक पर रखने का जो नतीजा होना था, वही हुआ भी। शिष्टाचार का पालन न करने पर सम्मान कम हो जाता है तो द्रोण को भी द्रुपद के पास से खाली हाथ लौटना पड़ा।

द्वेष या दुर्भावना न पालना भी ब्राह्मणों का एक गुण माना जाता है। द्रोण ने उसका भी पालन नहीं किया और मदद न करने के कारण आजीवन द्रुपद से शत्रुता रखी। पांडवों और कौरवों को शिक्षा देने के बाद उन्होंने गुरुदक्षिणा में द्रुपद को बाँध लाने की मांग की थी।

जिस एकलव्य की घटना के कारण द्रोण का अपमान किया जाता है, वो और भी रोचक है। एकलव्य के पीछे की तरफ देखें तो उसके पिता जरासंध की सेना में थे। अंगूठा देने की घटना के बाद एकलव्य द्रौपदी के स्वयंवर में नजर आता है, जहाँ वो जरासंध के पुत्र का अंगरक्षक था।

निस्संदेह हस्तिनापुर और मगध मित्र राष्ट्र नहीं थे, इसी वजह से बाद में कृष्ण, भीम और अर्जुन को साथ लेकर जरासंध को मारने जाते हैं। किसी दूसरे देश का गुप्तचर अगर पकड़ा जाए तो आज भी मृत्युदंड मिलता है और उस दौर में भी अंग-भंग और मृत्युदंड जैसा विधान ही था।

चोरी से जो ये सीख रहा हो कि कुरु राजकुमारों को क्या सिखाया जा रहा है उसे पकड़ा जाता तो अंग भंग और मृत्युदंड जैसी कोई सज़ा ही मिलती। द्रोण यहाँ भी उसे अपना शिष्य होने के कारण बचाते दिख जाते है। उन्होंने अंग भंग की सजा भी दी और ऐसे दी कि उसका कोई असर ही न हो! तीर चलाने में दाहिने हाथ का अंगूठा इस्तेमाल नहीं होता, इसलिए उन्होंने गुरुदक्षिणा कहकर उसका दाहिने हाथ का अंगूठा माँगा और उसे निर्वासित कर दिया।

सिर्फ एक शिष्य के साथ नहीं, बिलकुल यही पक्षपात वो अर्जुन और अपने पुत्र अश्वत्थामा में भी कर रहे होते हैं। अर्जुन के चक्रव्यूह की रचना और तोड़ने की विधि सीखने के किस्से में ये दिखता है। सभी शिष्यों को छेद वाले घड़े से वो पानी लाने भेज देते थे। ऐसे घड़े से पानी भरने में बाकी शिष्यों को जो समय लगता, उसमें वो अश्वत्थामा को सिखा रहे होते थे। अर्जुन ने चतुराई दिखाई और वरुण सिद्धि के इस्तेमाल से पानी जल्दी भरना शुरू किया। वो काम जल्दी समाप्त करके सीखने बैठ जाते और अश्वत्थामा के साथ ही चक्रव्यूह सीख गए।

इन कर्मों का दंड उन्हें न भुगतना पड़ा हो, ऐसा बिलकुल भी नहीं। एक राजा की तरह सेना इत्यादि के साथ महाभारत के युद्ध में सम्मिलित हुए द्रोण की मृत्यु किसी योद्धा की तरह बिलकुल नहीं हुई थी। अजेय योद्धा का सर, निराश-हताश अवस्था में, हथियार डालकर बैठे हुए में, एक अपेक्षाकृत साधारण योद्धा द्वारा काट लिया गया था।

आज भी लोकव्यवहार में उन्हें अच्छे उदाहरण के तौर पर पेश नहीं किया जाता। हाँ मैकॉले मॉडल के उपनिवेशवादी मानसिकता से ग्रस्त लोग उनके नाम से पुरस्कार जरूर बांटते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि ऐसे पुरस्कार पाने वाली बिरादरी के लोग ‘मी टू’ अभियानों में प्रसिद्धि पाते हैं।

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