एक गिरगिट का बयान


मैं गिरगिट हूं। सोवियत लेखक अंतोन चेखव ने मेरी बहुत दुर्दशा अपनी एक व्यंग्य रचना में की है, लेकिन मैं सच कहता हूं कि मैं दरोगा ओचुमेलोव जैसा कतई नहीं हूं।

मैं तो शत्रुओं से अपनी जान बचाने के लिए गाहे-बगाहे रंग बदलता हूं। और आप मेरी तुलना उनसे करते हैं, जो दूसरों को धोखा देने, उनका शोषण करने तथा उन्हें भरमाने के लिए पल-प्रतिपल रंग बदलने को सन्नद्ध रहते हैं।

मैं सबसे ज्यादा उत्पीड़ित उस नाट्यमंडली से हूं, जो आम अवाम को, मेरा बाना धारण किए हुए भी राजा हरिश्चंद्र लगती है। ऐसे लोग यह बिलकुल नहीं सोच पाते कि यह रंगमंडली मेरा मूल स्वरूप होने का नाटक भर करती है। इसकी हक़ीक़त आप देखें, तो सही।

ज़रा ठहर कर सोचें। देश में एक रंगमंडली है, जिन्हें बुद्धिजीवी कहते हैं। भरत मुनि अपने नाट्य शास्त्र में जो कुछ लिखना भूल गए, वह सब आप इसकी हरकतों में देख सकते हैं। शर्त यह है कि सत्ता में भाजपा होनी चाहिए।

कुछ उदाहरण चाहिए? देता हूं।

कांग्रेस शासित कर्नाटक में एक लेखक एम एम कलबुर्गी की हत्या हुई। बिहार राज्य में चुनाव थे, तो लाज़िमी था कि कांग्रेस की कोई एड इकाई सक्रिय हो और मुझे आगे कर दिया गया। ‘अवार्ड वापसी’ के नाम पर एक गिरोह तत्काल सक्रिय हुआ। लेकिन ग़ज़ब यह कि इनमें से एक भी लेखक ने कर्नाटक की तत्कालीन सिद्धारमैया सरकार के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया। सच कहता हूं, मुझे लिखना आता, तो सबसे पहले सिद्धारमैया का इस्तीफ़ा मांगता।

बीफ पकाने के जुर्म में एक सज्जन अख़लाक़ हलाक हुए। घटना यूपी में हुई थी, जहां अपने अखिलेश यादव गद्दीनशीन थे, लेकिन इस्तीफा मांगा गया मोदी से। सोचें, क़ानून-व्यवस्था राज्य का मुद्दा और उसके लिए जिम्मेदार ठहराया गया केंद्र। क्या ये सब आपको अब भी मेरे जैसे लगते हैं?

ऎसी ही घटनाएं महाराष्ट्र में हुईं। कलबुर्गी की हत्या से तक़रीबन दो साल पहले पुणे में एक और तर्कवादी डॉक्टर नरेंद्र दाभोलकर की हत्या हुई। उसी साल फ़रवरी में मराठी के प्रसिद्ध लेखक गोविंद पंसारे की भी सुबह-सबेरे गोली मार कर हत्या कर दी गई।

यह मगज़ में घुसा लें कि इन हत्याओं के समय प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। किसान आत्महत्या कर रहे थे। उन्हें पानी नहीं मिल रहा था। समय पर खाद और बीज नहीं मिल रहे थे। पानी मांगने पर उसके मंत्री बयान दे रहे थे – बांध में पानी नहीं है, तो मैं क्या करूं? पेशाब कर बांध को भर दूं?

इस रंगमंडली के कान पर इस दौरान एक जूं नहीं रेंगी। भाजपा की फड़नवीस सरकार ने जैसे ही दो आरोपियों को पकड़ा, ये सब पिल पड़े। मोर्चाबंदी हुई। कैंडलमार्च निकले। भगवा ब्रिगेड की ऎसी की तैसी की गई। ज़रा सोचें, इतने रंग मैं कब बदलता हूं?

यह सब याद दिलाते हुए मैं आपसे गुज़ारिश करता हूं कि कृपया मुझे बख्शें और किसी कांग्रेसी, ख़ास कर बुद्धिजीवी से मेरी तुलना नहीं करें। मैं अकिंचन जीव हूं। इस आलाकमानी मूत्रपेयी जमात का मुकाबला हरगिज़ नहीं कर सकता।

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