भाजपा की गलती : गाय को तो पहली रोटी दे दी, पर कुत्ते को भूल गए

भूमिका : हमारी संस्कृति में पहली रोटी गाय के लिए होती हैं, और आखिरी रोटी कुत्ते के लिए। होने को तो आप इसे भेदभाव समझ सकते हैं, पर मेरा मानना है कि ऐसा नियमन कम से कम कुत्ते के लिए भी खाना सुनिश्चित करता हैं।

गाय को तो माँ का दर्जा दिया गया है, और कुत्ते को तो दरकिनार भी किया जा सकता था, पर वसुधैव कुटुम्बकम की भावना में कोई भी भूखा ना रहे, इसलिए शायद ये नियम बनाया गया।

अब मुद्दे की बात…

कल प्रधानमंत्री मोदी ने किसी सभा में कहा कि सरकार पूरी कोशिश कर रही है कि सभी luxury या sin वस्तुएं (महंगी कारें जैसी चीजें) GST के 28% वाले स्लैब में रहे, बाकी चीजें 18% ‘या उससे कम वाले slabs’ में ले जाई जाएगी।

वैसे ये विचार वित्तमंत्री अरुण जेटली GST के लागू किये जाने के कुछ महीने बाद ही बोल चुके थे कि धीरे धीरे high rate में आर्टिकल्स कम किये जायेंगे, और नीचे के स्लैब्स में डाले जाएंगे।

कांग्रेस की मांग है कि सिर्फ एक स्लैब – 18% वाला रखा जाए, ताकि ‘एक टैक्स’ रहे। ये मांग पूर्णतया कुतर्क है, क्योंकि आप नमक, पूजा की अगरबत्ती और फेरारी कार, एक ही 18% के स्लैब में नहीं डाल सकते।

और रही ‘एक टैक्स’ की बात, टैक्स अब भी एक ही है – GST, बस स्लैब्स अलग है। जैसे इनकम टैक्स में 2 लाख, 5 लाख, 10 लाख तक और फिर उसके ऊपर की इनकम पर अलग अलग टैक्स रेट हैं।

कोई ये नहीं कह सकता कि 4 तरह का इनकम टैक्स लगा दिया। पर चूंकि इस देश में **** (यहाँ वहीं शब्द पढ़ें, जो मैं लिखना और आप पढ़ना चाहते थे) की भरमार है, तो ‘गब्बर सिंह टैक्स’ जैसे बेसिरपैर के डायलॉग भी अच्छा खासा ट्रैक्शन पा जाते हैं।

ख़ैर, मुद्दा ये है कि प्रधानमंत्री के इस 28% स्लैब के scope को कम करने की घोषणा को कांग्रेस ने अपनी विजय माना है। जबकि बहुत सीधा सा दिख रहा है कि सारे स्लैब बरकरार हैं, ना कि कांग्रेस की एक स्लैब की मांग की तरह। यहाँ काबिल-ए-ग़ौर बात है मीडिया का सब कुछ जानते समझते कांग्रेस को श्रेय देने की पूरी कोशिश करना।

आज एक अखबार में संपादकीय में ‘जीएसटी की उलटबांसी’ नाम से आर्टिकल छपा है, जिसमें सबसे ऊपर ही एडिटर साहब ने लिख दिया है कि मज़बूत विपक्ष क्या कुछ नहीं करवा सकता, मतलब सरकार भले ही ये बात डेढ़ साल पहले बोल चुकी हो, पर श्रेय हमारे नए आका राहुल गांधी को जाता है।

दनादन तबादले हो रहे हैं अधिकारियों के। तीन दिन में पूरे महकमे बदल गए हैं। जिन जिनकी वसुंधरा के साथ शायद कोई फ़ोटो भी हो तो उसे इधर उधर कर दिया गया है। मोदी द्वारा कुछ राज्यों के गवर्नर बदलने पर लंबे लेख लिखने वाला ये अखबार फिलहाल ऐसे किसी मूड में नहीं हैं।

किसानों की कर्ज़माफी पर उत्तरप्रदेश और महाराष्ट्र की सरकारों को कठघरे में खड़ा करने वाला ये अखबार राजस्थान में बिना कैबिनेट बने और उसकी अप्रूवल लिए किए गए एक फैसले (जो कि null and void है, कैबिनेट बनने के बाद ये ही निर्णय टेक्निकली सही होगा) को अखबार अपने पहले पेज पर ‘रजत रेखा’ यानि silver lining नाम से छाप रहा हैं। इस लोनमाफी में पारदर्शिता रहेगी या नहीं, या उन ‘किसानों’ का ही लोन माफ होगा जिनके घरों के आगे बोलेरो खड़ी है, इस बारे में भी कोई सवाल नहीं।

लिखने को तो इनकी ‘गलतियां’ नहीं बल्कि ‘अपराधों’ पर और भी बहुत कुछ हैं, पर किसी ने सुअर बन के कीचड़ में लोटने की कसम खा ली है, तो कोई क्या कीजे।

भाजपा की एक दिक्कत रही है – उन्होंने गाय का तो ध्यान रखा (या कम से कम कोशिश की) पर आखिरी रोटी उनके हक़दारों तक नहीं पहुंचाई। इससे उलट इन मामले में कांग्रेस के अनुशासन को मानना पड़ेगा। सड़कों पर भले ही गाय काटी हो पर इन्होंने कुत्ते इतने बढ़िया पाले हैं कि इशारा पाते ही दूसरों को काटने दौड़ते हैं।

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