फिर तो उनकी नज़र में वे मासूम ही रहेंगे, और हम दोषी!

कश्मीरी मुस्लिम युवाओं के बारे में कुछ महत्व की बात कर रहा हूँ।

सोशल मीडिया में उनकी बातों में केवल एक ही भावना दिख रही है। वह है कि भारत ने उनकी जमीन पर कब्जा जमा रखा है, हम एक occupying army हैं और उनपर जुल्म कर रहे हैं।

इसका एक और पहलू भी है और वह है कि उनको 1990 में पंडितों के साथ जो हुआ उसके बारे में कोई भावना या संवेदना नहीं हैं। अगर आप इसे इस्लामी माइंडसेट कहना चाहेंगे तो सावधान, आप गलत जा रहे हैं। यह खेल उससे भी खराब है।

बात यह है कि उन्हें उसके बारे में जानकारी भी नहीं है। अगर आप को यह बात अतिरंजित लग रही हो तो जरा सा धैर्य रखकर आगे पढ़ते जाइए।

टाइम लाइन देखते हैं। 1990 में पंडितों को कश्मीर से खदेड़ा गया। और ये कोई धीरे धीरे चलनेवाली प्रक्रिया न हो कर, बहुत कम समय में कश्मीर को पंडितों से खाली कराया गया। 1990 से 2018 तक 28 साल हुए हैं, जिसमें दो युवा पीढ़ियाँ खड़ी हुई हैं, तीसरी और सात साल में हो जाएगी।

इन तीनों पीढ़ियों ने वहाँ पंडित नहीं देखे जो उनके परिजनों से कभी अभिन्न मित्रता रखते थे। उन्होने भारत की सेना को वहाँ सिर्फ हिंसा का नियंत्रण करते देखा है, और अगर हिंसा को नियंत्रण में लाना है तो प्रतिहिंसा से ही संभव है, इसलिए इनकी नज़र में भारत की छवि एक आक्रांता सत्ता और भारतीय सेना की छवि एक occupying army बन गयी है। इनकी नफरत अब समझ में आती है।

लेकिन इसके साथ साथ समझ में आता है कि उनको अपने बाप दादा के पापों के बारे में बताया नहीं गया है। वे शायद जानते ही नहीं कि उनके बाप दादा अपने पीढ़ियों के दोस्त कश्मीरी पंडितों के कातिल हैं। शायद किसी पंडित के कब्ज़ाये घर में ये रहते हैं और उन्हें पता ही नहीं। शायद किसी पंडित के बागान को कब्ज़ा कर खा रहे हैं ये भी उन्हें पता नहीं होगा।

यह असंभव नहीं है। मुझे पता नहीं, आप जानते हैं या नहीं, लेकिन पाकिस्तान में कई वर्षों तक इतिहास में यह पढ़ाया जाता रहा था कि पाकिस्तान मुहम्मद बिन कासिम ने बनाया, पूरा इस्लामी मुल्क जिस पर अंग्रेजों ने आक्रमण कर के हिंदुस्तान बनवा दिया। इससे विपरीत किसी भी बात को पाकिस्तानी युवा चिल्ला चिल्लाकर प्रोपगंडा करार देते थे।

Isolation और insulation में indoctrination हो जाये तो ऐसे ही नतीजे आते हैं। कम्युनिस्ट रशिया के युवा भी इसी तरह से सब कुछ प्रोपगंडा मानते थे। अली सिना मुसलमानों के बारे में लिखते हैं और हम भी देख सकते हैं कि इस्लाम के स्याह पक्ष को जो उनके ही लोगों ने लिख रखा है, मुसलमान नकारते हैं।

कारण वही है कि उनको मालूम नहीं होता, वे मालूम करने की कोशिश करते नहीं और कोई बताता भी नहीं। अगर ऐसी बातों से सामना होता है तो वे उनको असत्य बताते हैं और शाब्दिक से शारीरिक हिंसा पर उतर आने में उनको समय नहीं लगता।

क्या कश्मीर सरकारों ने अपने युवाओं को यही पढ़ाया है? क्या उन्हें पूरा इतिहास पता है? क्या उन्हें अपने अपने बाप के पाप पता हैं या उनके लिए 1990 में कोई पंडितों का उच्चाटन हुआ ही नहीं था? क्या उनके लिए “कश्मीर में कोई पंडित थे ही नहीं और हिन्दू हिदुस्थान ने अपनी सेना द्वारा इस्लामिक कश्मीर पर कब्जा कर रखा है?” क्या अपने लोग ‘दुखाओ नहीं’ के चलते उन्हें बताते भी है कि उनके बाप, चाचा और दादा हिंदुओं के हत्यारे हैं, या नहीं?

सुनने में आया है कि वहाँ कॉलेजेस और यूनिवर्सिटीयों में 1990 के पहले के टॉपर्स के नाम मिटाये जा रहे हैं? इसकी सत्यता की पुष्टि आवश्यक है।

उम्मीद है मुद्दा रखने में सफल रहा हूँ, इसपर चर्चा आवश्यक है। कश्मीरी युवाओं को यह समझना आवश्यक है कि “तेरा बाप हिंदुओं का हत्यारा है और जहां तू रहता है वह घर भी किसी हिन्दू का कब्ज़ाया हो सकता है।” शाह फैजल जैसे IAS भी इसी पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं, टीना दाबी का शौहर भी।

वरना कोई अर्थ नहीं। कौन सा इतिहास पढ़ाया जाता आया है कश्मीरी युवाओं को पिछले 28 सालों में? क्या सिर्फ पुराने किताब ही पढ़ाये जाते है, बाकी गत 28 वर्षों की उथल पुथल के लिए कहा सुनी पर ही भरोसा किया जाता है? फिर तो उनकी नज़र में वे मासूम ही रहेंगे और हम दोषी।

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