ढकोसले वाला समाज और उसकी मीडिया

विवेक उमराव, सिडनी, ऑस्ट्रेलिया

कोई मंत्री स्कूटर से कार्यालय गया तो बड़ी बात हो गई।

कोई राजनेता अपनी कार खुद चलाकर अपने क्षेत्र के लोगों से मिलने पहुंच गया तो बड़ी बात हो गई।

कोई कमिश्नर साइकिल चलाकर मतदान करने पहुंच गया तो बड़ी बात हो गई।

कोई जिलाधिकारी अपनी पुत्री के इलाज के लिए सरकारी अस्पताल में लाइन में खड़ा हो गया तो बड़ी बात हो गई।

कोई सवर्ण जिसने विदेश से उच्च शिक्षा प्राप्त की है, उसने दलित से हाथ मिला लिया, दलित को अपनी खाट पर बैठा लिया तो महान क्रांतिकारी हो गया।

इसी तरह की वाहियात बातों को हमारा मीडिया बड़ी खबरों के रूप में प्रकाशित करता है, बहुत बार तो मुख्य पृष्ठों की हेडलाइन्स बनाता है। मानो समाज में सबकुछ बिलकुल ठीक चल रहा है, इसलिए कुछ ऐसा है ही नहीं जिस पर चर्चा करने की ज़रूरत हो, इसलिए इन वाहियात बातों पर ही चर्चा कर ली जाए।

यदि स्कूटर चलाना बड़ी बात है तो देश के करोड़ों लोग स्कूटर चलाते हुए अपना जीवन गुजार देते हैं, उनके बारे में भी छापिए। यदि अपनी कार चलाना बड़ी बात है तो देश के करोड़ों लोग अपनी कार खुद चलाते हैं उनके बारे में भी खबर और प्राइमटाइम करिये। यदि साइकिल चलाना बड़ी बात है तो देश के करोड़ों लोग जो अपने पूरे जीवन में साइकिल के अलावा कोई अन्य वाहन चलाए ही नहीं हैं, उनके बारे में भी ब्रेकिंग खबर चलाइये। यदि दलित से हाथ मिलाना महानता है तो उन करोड़ों दलितों के बारे में भी लिखिए जो दलितों से हाथ मिलाते हैं, उनके साथ रहते खाते पीते सोते हैं, जीवन गुजारते हैं।

यह सब करना बड़ी बातें नहीं हैं क्योंकि करोड़ों लोग प्रतिदिन करते हैं, जीवन भर करते हैं। ये बातें बड़ी केवल और केवल तभी बड़ी हैं, यदि हम सामंतवादी बीमार मानसिकता से ग्रस्त हैं।

यह बीमार मानसिकता समाज व देश के लोगों की समझ, जागरूकता व चेतनशीलता को पीछे बहुत पीछे धकेल देती है, सामाजिक परिवर्तन की संभावनाओं की भ्रूण बनने के पहले ही हत्या कर देती है। ढकोसला/ ढोंग जनित अहंकार बेहद धूर्तता भरा व खतरनाक होता है।

भारतीय व्यवस्था तंत्र में ईमानदारी की स्थिति तो यह है कि नेक्सस इतने सूक्ष्म व मजबूत हैं कि जब तक कोई आउट ऑफ़ द वे जाकर बड़े घोटाले न करे तब तक साबित किया ही नहीं जा सकता है। इसलिए तंत्र के बहुत लोग जिन्होंने जमकर मलाई खाई होती है वे भी भरपूर ढकोसले व अभिनय/ शब्दों का छद्म व मकड़जाल बनाते हुए नेक्सस के बाहर के लोगों के सामने पूरी बेशर्मी व धूर्तता के साथ खुद को ईमानदार प्रस्तुत करते रहते हैं।

तंत्र में ऐसे भी लोग होते हैं जिनको मलाई के साथ-साथ, महानता का भी भोग करना होता है। नाम पहचान का भी भोग करना होता है। ऐसे लोग मलाई भी बहुत सफाई से खाते हैं। बहुत बातें महत्वाकांक्षाओं के चरित्र व प्रकार पर निर्भर करती हैं।

इन सब बातों को मापने के पैमाने नहीं होते, न ही गणना करने के फार्मूले होते हैं। इसके लिए केवल दृष्टि व तंत्रों के संदर्भ में समझ चाहिए होती है, ऐसा होना सबके बस का है भी नहीं।

अब ज़रूरत है कि ऐसे उदाहरणों की ही बात की जाए, जैसे कि किसी IAS ने बंगला, गाड़ी, नौकर-चाकरों की सुविधाएं लेने से मना कर दिया। जिलाधिकारी/ कमिश्नर/ सचिव व उसकी पत्नी व बच्चे जहां पदस्थापना होती है वहां किराए का मकान लेकर रहते हैं। बिजली का बिल भरने खुद जाते हैं, पानी का बिल भरने खुद जाते हैं। ऑफिस जाने के पहले अपने बच्चों को सरकारी स्कूल अपने स्कूटर या साइकिल या कार (यदि अपने वेतन से खरीद पाए हों) से छोड़ने व लेने जाते हों। उनकी पत्नी/ पति मिलने आने वालों के लिए खुद चाय/ नाश्ता बनाते हों। खाना बनाते हों, बर्तन धोते हों, कपड़े धोते हों या अपने वेतन में से खर्च करके घर में नौकर रखते हों। ऑफिस का कोई भी सामान घर में प्रयोग करने के लिए न लाते हों।

लोकतंत्र में उपजिलाधिकारी, जिलाधिकारी, कमिश्नर इत्यादि जैसे पद व इनसे निकलने वाले ढांचे होने ही नहीं चाहिए। भारत का प्रशासनिक ढांचा ही अपने आप में लोकतंत्र की हत्या करने वाला है, सामंती व हिंसक चरित्र का है।

फिर भी जब तक इन ढांचों को पूरी तरह से उखाड़ कर परिवर्तित नहीं किया जाता तब तक कुछ परिवर्तन तो देश की सबसे बड़ी व पहली प्राथमिकता के साथ तुरंत लागू कर ही देना चाहिए।

हर जगह तीन कमिश्नर, तीन जिलाधिकारी, तीन उपजिलाधिकारी, तीन तहसीलदार, मतलब यह कि जिन-जिन पदों के बारे में यह मिथक है कि उनकी ड्यूटी 24 घंटे की है, उन सभी पदों को 8-8 घंटों में विभाजित करके तीन-तीन लोगों को काम सौंप दिया जाए।

कमिश्नर, जिलाधिकारी, उपजिलाधिकारी, तहसीलदार, ब्लाक-विकास अधिकारी इत्यादि की ड्यूटी 8-8 घंटे की शिफ्टवार होनी चाहिए। 24 घंटे जैसी ड्यूटी एक मिथक है। इस मिथक के चक्कर में इन लोगों को दिए जाने वाले आवासों में कैंप-ऑफिस बनाने जैसे राजसी/ सामंती व्यवस्था की कोई ज़रूरत नहीं।

हर स्तर पर पुलिस विभाग पूरी तरह से स्वतंत्र विभाग होना चाहिए। पुलिस निरंकुश न हो सके इसलिए अधिकार-संपन्न समानांतर नागरिक-पुलिस होनी चाहिए। नागरिक-पुलिस स्थानीय लोगों द्वारा चुनी गई हो व स्थानीय लोगों के प्रति पूरी तरह से जवाबदेह हो।

हर स्तर पर शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि व व्यापार पूरी तरह से स्वतंत्र विभाग होने चाहिए।

भारत की नौकरशाही व जाति-व्यवस्था तंत्रों का चरित्र समान है। जैसे भारत में लोग जाति के बिना अपने सामाजिक व व्यक्तिगत अस्तित्व की कल्पना ही कर पाते हैं। लोग बिना जाति के अस्तित्व की कल्पना ही नहीं कर पाते हैं। जाति की कंडीशनिंग डीएनए तक में घुसी हुई है। कितना भी जाति-जाति चिल्ला लिया जाए, कितना भी जाति-व्यवस्था के विरोध का ढकोसला/ ढोंग/ हंगामा कर लिया जाए, जाति के बिना अस्तित्व की कल्पना लोग नहीं कर पाते हैं।

लोगों को लगता है कि जाति व्यवस्था के बिना आसमान गिर पड़ेगा, धरती फट जाएगी, प्रलय आ जाएगी। फिर से मनु को एक बड़ी सी नाव में हर जीव का नर-मादा का जोड़ा लेकर अपनी पत्नी के साथ बैठना पड़ेगा, ताकि प्रलय के बाद जीवन फिर से शुरू किया जा सके। फिर से मनु-संहिता लिखनी पड़ेगी, फिर से पौराणिक गाथाएं गढ़नी पड़ेंगीं।

बिलकुल इसी तरह लोग भारत के वर्तमान सामंती-नौकरशाही के बिना अस्तित्व की कल्पना नहीं कर पाते। उनको लगता है कि कैसे क्या होगा, सबकुछ ठहर जाएगा, अफरातफरी फैल जाएगी, अराजकता फैल जाएगी, भ्रष्टाचार होगा, सबकुछ तहस-नहस हो जाएगा। आसमान गिर पड़ेगा, धरती फट जाएगी, देश फिर से गुलाम हो जाएगा, देश सौ साल पहले की स्थिति में पहुंच जाएगा।

लोग यह नहीं समझ पा रहे हैं कि भारत में जो भी दुर्दशा है उसका सबसे मूल कारण नौकरशाही का सामंती चरित्र ही है। सामंती-नौकरशाही के कारण ही अराजकता है, भ्रष्टाचार है, अफरातफरी है, दुर्गंध है, सड़ांध है, अघोषित गुलामी है।

लोकतंत्र को संविधान के कागज़ में उकेरे गए चंद शब्दों तक कुंठित रखने से कुछ कदम आगे भी बढ़ना चाहिए ताकि कागज़ी लोकतंत्र से लोकतंत्र की ओर कुछ कदम तो बढ़ा जा सके।

मैं तो नरेंद्र मोदी जैसे दृढ़ निश्चयी राजनेता से अनुरोध करूंगा कि देश को नोटबंदी की नहीं, सरकारी तंत्र के लोगों की सुविधा-बंदी की सबसे मूल रूप में ज़रूरत है। लेकिन ऐसा करने के लिए असली वाली समझ व असली वाली आंतरिक ताकत व असली वाला दृढ़ निश्चय चाहिए, बिना इनके बिलकुल भी काम नहीं चलने वाला।

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