ज़ोरोस्ट्रियन और हिन्दू : वर्तमान का निर्णय भविष्य का अंत

दिसम्बर 2018 को आये चुनावी परिणाम ने जहां तीन राज्यों में कांग्रेस को सत्ता दी है वहीं पर सत्ता से निष्काषित भाजपा के समर्थकों को मंथन भी दिया है।

जैसे और लोग मंथन कर रहे है वैसे ही मैं भी मंथन कर रहा हूँ। मैंने इस मंथन ने जो सबसे पहले आत्मस्वीकृत किया है वह यह कि मुझे इस हार से ज्यादा, भगवा में लिपटे अपनों के ही हंता बने लोगों ने ज्यादा कष्ट दिया है।

ऐसा नहीं है कि यह पहले ऐसे लोग है बल्कि भारत व उसके हिन्दुओं के इतिहास में ऐसे लोग समय समय पर आते रहे हैं। हाँ, यह अलग बात है कि हम उन्ही को याद रखते हैं जिनके स्वार्थ व द्रोह ने उन घटनाओं को जन्म दिया, जो आगे जाकर भारत व हिन्दुओं के पराभव व दासता के कारण बने थे।

मैंने अब तक परिणाम आने के बाद जो भी थोड़ा बहुत लिखा है, वह इसी संदर्भ में ही लिखा है। मैंने उसमें एक बात ज़ोर दे कर लिखी थी कि यदि 2019 में यदि जनता अपने नेतृत्व का चुनाव अपने स्वार्थ, अपनी जाति व मुफ्त की घोषणाओं के आधार पर फिर करेगी तो मैं पारसियों का अनुसरण करते हुये, अपने जीते जी, अपने धर्म को अगली पीढ़ी के लिए सुरक्षित रखने के लिए मातृभूमि को छोड़ सदूर मय परिवार बस जाऊंगा।

इस पर लोगो ने कमेंट किये है, जिन्हें मैंने कोई जवाब नहीं दिया है। कुछ लोगों ने इनबॉक्स में बात की है लेकिन ज्यादातर हिन्दुओं की तरह वे न मेरी बात समझ सके हैं और न ही भविष्य को समझना चाहते हैं। लोगों को इतिहास से मतलब नहीं रहता है इसलिये मैं क्या, खुद उन्हें इतिहास भी कुछ भी नहीं सिखा पाता है।

लेकिन मुझे इतिहास से मतलब रहता है। मैं यह दृढ़तापूर्वक मानता हूँ कि इतिहास, भविष्य के लिए रास्ता चुनने में हमारा सहायक होता है क्योंकि इतिहास, भूगोल के बंधन तोड़, अपने को दोहराता है।

काल और भूगोल बदलते रहते हैं लेकिन मानवीय स्वभाव, चरित्र व महत्वकांक्षाएं समान ही रहती हैं। मैं आज के भारत व उसके हिन्दुओं को इतिहास के उस मोड़ पर खड़ा पाता हूँ जहां आज से करीब 1550 वर्ष पूर्व पर्शियन साम्राज्य और उसके जोरास्ट्रियन (प्रोफेट ज़ोरोअस्त द्वारा चलाये गये धर्म ज़ोरोअस्ट्रानिज़्म को मानने वाले) नागरिकों को काल ने खड़ा देखा है। यही जोरास्ट्रियन आज से लगभग 1350 वर्ष पहले (सन 659 में) भारत की धरती पर शरणार्थी बन कर आये थे और उन्हें हम आज ‘पारसी’ के नाम से जानते हैं।

आज तक हम, कम से कम मैं, इसी पढ़ाये गये को सत्य मानता था कि अरब से उठे मुहम्मद के इस्लाम ने सिर्फ 25 वर्षो में ज़ोरोअस्ट्रानिज़्म धर्म को मनाने वाले पर्शिया(ईरान व इराक पर्शियन साम्राज्य में समाहित थे) का इस्लामीकरण कर दिया था।

लेकिन यह झूठ है, क्योंकि किसी समाज, धर्म और राष्ट्र के इस्लामीकरण या धर्मांतरण के बीज खुद वही समाज, धर्म और राष्ट्र बहुत पहले खाद और पानी के साथ बो देता है। पहले स्वाभाविक वातावरण अनुसार एक फसल पैदा करते थे और आज! वातावरण को ही दूषित कर वातावरण विरुद्ध फसल पैदा करते हैं। फिर प्रकृति के विरुद्ध यह आशा क्यों है कि भारत और उसके हिन्दू को समय मिलेगा?

उस काल में जब घटनाएं और उसके परिणाम बड़ी धीमी गति से अपनी परिणति पर पहुंचते थे तब इन जोरास्ट्रियन को पारसी बनने में 200 वर्ष लगे थे। आज 21वीं शताब्दी में जो इंटरनेट का काल है, जहां घटनाएं अपने परिणाम को कुछ ही वर्षो में सामने ले आती हैं, वहां भारत और उसके हिन्दू ने जो पिछले 40 वर्षों में खुद को ही खोया है, उसके परिणाम 21वीं शताब्दी के समाप्त होने से बहुत पहले सामने आयेंगे।

यह मैं इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि पूर्व में समाज व धर्म में बदलाव शताब्दियों में आता था, फिर आते आते 20वीं शताब्दी में उसे दशकों में परिवर्तित होते देखा है और आज तो हर 5 वर्ष में दुनिया को बदलते देख रहा हूँ।

मेरा स्पष्ट मानना है कि ऐसी तीव्र गति से हो रहे परिवर्तन को देखते हुए यह समझना मूर्खता ही है कि हमारे द्वारा आज लिया कोई भी सही या गलत निर्णय, किसी भी तरह से भारत और उसके हिन्दू को यथास्थिति रखेगा! मैं नहीं समझता हूँ कि भारत और उसके हिन्दू के पास कोई ऐसा समय बचा है जहां, गलत कदम उठाने के बाद, वह उसका परिमार्जन कर सके।

आज भारत व उसके हिन्दुओं के अप्रासंगिक भविष्य पर ही लिखना था लेकिन पर्शिया साम्राज्य व उसके ज़ोरोअस्ट्रानिज़्म के अप्रासंगिक होने पर इतना लिख दिया कि लेख लंबा हो गया है।

कोई प्रेरणा मिली तो अगला लेख इसी को आगे बढ़ाते होगा और प्रयास करूंगा कि लोग यह समझ पाये कि क्यों 2018-19 में भगवा के अस्तित्व का शत्रु, भगवा पहने भगवाहन्ता ही होगा।

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