पत्रकारिता और युगधर्म…

आज सुबह दो नामचीन लोगों के साक्षात्कार देखे। एक लोकप्रिय, कथित महान शायर जावेद अख्तर का, दूसरा आईटी इंडस्ट्री के महापुरुष, नारायणमूर्ति का।

जावेद साहब ने कहा कि जब वे चार साल के थे तब घर में स्टालिन की तस्वीर टंगी देखते थे और उन्हें लगता था कि यही उनके दादा हैं… कितने ऊंचे विचार हैं! स्टालिन तो साक्षात महात्मा थे! बस डेढ़ करोड़ लोगों को मरवाया था!

नारायणमूर्ति ने कहा कि इस समय जो देश में विकल्प मौजूद हैं उनमें से मोदी ही एकमात्र ऐसे नेता हैं जिनके पास देश के सर्वांगीण विकास की दृष्टि है। लेकिन सिर्फ मोदी के चाहने से नहीं होगा, अरबों लोगों के देश में जनता को भी साथ देना होगा…

अब मैं सोचता हूं नारायणमूर्ति के पास पत्रकारों जैसी प्रज्ञा क्यों नहीं है..! पत्रकारों से महान और बुद्धिमान तो कोई होता नहीं! यह सवाल इसलिए दिमाग में आ रहा कि इन दिनों पत्रकारों के बड़े आक्षेप झेल रहा हूं। आया क्यों इस क्षेत्र में… पतित हो… पेड राइटर हो… फलाना ढिमकाना हो.. अख्तर साहब स्टालिन को सिर पर सजा कर महान शायर हुए और मैं मोदी को माथे पर रख कर पतित पत्रकार हुआ!

मैंने करीब बीस साल सिर खपाया है यहां। कई संस्थानों में रहा। 2004 में जब वाजपेयी चुनाव हार गए तो हताश हो गया। मुझे यह अनुभव हुआ कि देश को ईमानदार व्यक्ति की ज़रूरत नहीं है। त्यागमयी मैया आईं और दस साल में भारत माता का भट्ठा बिठा दिया।

इन तमाम वर्षों में दिन रात यही सोचता रहा कि भारत का उद्धार कैसे होगा… फिर 2013 में नरेन्द्र मोदी दृश्य में आए और मेरा मन संभावनाओं से भर उठा। मैंने खुलकर मोदी का समर्थन शुरू किया। रिपोर्ट लिखते हुए नहीं अपितु बहस मुबाहिसों में।

भक्त का तमगा लगा। मैंने परवाह नहीं की। दिलचस्प तो यह कि भक्त उन्होंने कहा, जिनका अपना जीवन काँग्रेस और भ्रष्ट समाजवादियों की चाटुकारिता में बीत गया।

मैंने अपने जीवन में पहली बार किसी ऐसे नेता को देखा जो सिर्फ और सिर्फ इस धरती के उत्थान की बात सोचता है। एक स्पार्क है मोदी में, एक चिन्गारी… जिसे देखने के लिए आंखें तरस गईं थी। मेरी पत्रकारिता का धर्म अंतत: तो इस देश की प्रगति ही है। और जो व्यक्ति देश को प्रगति के पथ पर ले जाए, जिसमें इसकी प्रतिबद्धता हो, वही मेरा आदर्श। नरेन्द्र मोदी में यह बात है तो मैंने उन्हें सिर पर बिठाया।

महाकवि ने लिखा है…

वह उस शाखा का वन विहंग,
उड़ गया मुक्त नभ निस्तरंग
छोड़ता रंग.. रंग पर जीवन।

मेरे मन का विहंग भी उड़ गया..। एक कचोट, एक वेदना, एक अभीप्सा जो खाती रही, लगा जैसे पूरी होने वाली है। मोदी भारत का उद्धार करेंगे। और निश्चय ही भारत के उद्धार के लिए काम कर रहे हैं। कोई मना कर दे तो उसकी इच्छा।

साढ़े चार साल बीत गए हैं और इन वर्षों में देश को वेंटिलेटर से उतार कर बिस्तर पर रख दिया गया है। वह खुद सांस ले रहा है। संरचनात्मक स्तर पर मोदी ने विलक्षण काम किया है। खास कर अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में।

अब आधुनिक भारतीय इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है। 2019 का चुनाव सामने है। सारी विरोधी ताकतें एक साथ आ रही हैं। जीवन मरण का प्रश्न है। राजनीतिक विरासत खत्म हो सकती है।

इतना तय है कि नरेन्द्र मोदी अगर बहुमत के साथ लौटे तो बहुतों का बोरिया बिस्तर समेट दिया जाएगा। इसलिए वे दुगनी ताकत से वार कर रहे हैं। देश को जैसे भी मुमकिन हो तोड़ डालो… बांटो… भड़काओ… सवर्ण… अगड़ा पिछड़ा… दलित, अल्पसंख्यक… बहुसंख्यक… जैसे संभव हो वोट बैंक तोड़ डालो और परास्त करो।

ऐसे हालात में मेरा एक ही धर्म है। और वह है उस व्यक्ति का बचाव जो भारत में युगांतकारी परिवर्तन ला सकता है। जिसकी जिजीविषा… प्यास… कर्तव्यनिष्ठा संदेह से परे है। जो निरंतर इस देश को आगे ले जाने के लिए प्रतिबद्ध है। जो खुल कर त्रिपुंड लगाता है, जिसे देश के महान हिन्दू सपूतों का नाम लेने में गर्व का अनुभव होता है, जो स्वामी विवेकानंद के पथ पर चलने की बात करता है। जिसे गौरव है हिन्दू होने का।

मेरा मन उद्वेग से भरा हुआ है। बहुत विचलित हूं कि क्या होगा। परंतु आशा है कि मोदी जीतेंगे। वे न सिर्फ महान नेता हैं बल्कि अपराजेय योद्धा भी हैं, छोटी मोटी हार से उठ कर द्विरथ युद्ध में अपने शौर्य से विजय को साधेंगे। इसलिए बार बार आह्वान करता हूं कि आप सभी लोग उठें… सारे मतभेद भुलाकर हिन्दू होकर वोट करें। उस महान व्यक्तित्व का चुनाव करें जो आपके सामने साक्षात खड़ा है। आप उसे ठुकरा कर अपना अनर्थ खुद चुनेंगे। राजनीतिक विवशताओं को समझे और उनके समर्थन में आगे आएं। यही मेरा, आपका… सबका युगधर्म है।

मेरी पत्रकारिता अगर इसमें तिरोहित होती है, तो हो जाय… मुझे रत्ती भर अफसोस नहीं।

महाकवि के ही शब्दों में…

हो इसी कर्म पर वज्रपात
यदि धर्म रहे नत सदा माथ…

अगर धर्म को माथा झुका कर ही चलना पड़े तो इस कर्म पर ही बिजली गिरे…

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