उद्योगों के अनुदान पर सवाल नहीं, कृषि ऋण पर हाय तौबा क्यों?

कृषि ऋण माफी पर हाय तौबा मचाने से पहले कुछ विचार जरूर किया जाये।
आज़ादी से अबतक किसान की परिभाषा तय नहीं हुई, क्यों?

किसान कौन?
डाक्टर राममनोहर लोहिया के समय से नारा चल रहा है।
खेती किसकी? जो जोते उसकी।
किसान वो जो खेतों में काम करता है। सिर्फ़ छोटे किसान खेतों में काम करते हैं। वे किसान नहीं हैं जो केंद्र और राज्य की राजधानियों में आलीशान कोठियों में रहते हैं। और कृषिक्षेत्र से होनेवाली आय के आयकर मुक्ति का लाभ लेते हैं।

जब सभी प्रकार की आय के संबंध में जानकारी मांगी जाती है, तो कृषिक्षेत्र से होनेवाली आय सवालों के दायरे से बाहर क्यों रहे? यदि किसी किसान के पास लागत निकाल कर होनेवाली आय आयकर के दायरे में आती है तो वह कर क्यों न दे?
क्या ऐसे किसान देश के सच्चे नागरिक नहीं हैं, या स्वयं भू महाप्रभु हैं जो टैक्स नहीं देंगे?

कृषि उपज से होने वाली आय आयकर से मुक्त होने के कारण आजादी के बाद अनैतिक रूप से धन संपन्न वर्ग के लोगों ने भी कृषि भूमि खरीदना शुरू कर दिया। इस वर्ग के लोगों ने चालाकी से छोटे छोटे खातों में कृषि भूमि खरीदी। तीन, चार एकड़ के अलग अलग खाते बनाए। पुत्र, पत्नी, भाई भतीजे आदि। इस तरह एक तरफ वे अपनी काली कमाई को कृषि आय दर्शा कर टैक्स बचाने म़े कामयाब रहते हैं। दूसरी तरफ छोटे किसानों को मिलने वाली सुविधाओं का भी लाभ ले लेते हैं।

कृषि ऋण पर हाय तौबा मचाने वाले अधिकतर वे लोग हैं, जो परेशान किसान की भूमि खरीदने की मंशा पाले होते हैं। क्योंकि ऋण माफ होने पर किसान भूमि नहीं बेचेगा।

कृषि क्षेत्र में सुधार हुआ तो किसान शहरों की ओर पलायन नहीं करेगा। उद्योगों को सस्ते मजदूर मिलना मुश्किल होगा। बड़े किसानों को भी सस्ते मजदूर नहीं मिलेंगे।

फर्जी किसान अपनी कृषि भूमि पट्टे पर दे देते हैं। वे खेत देखने भी नहीं जाते। कभी जाते भी हैं तो पिकनिक मनाने जाते हैं। कुछ ऐसे फर्जी किसान भी हैं जिनकी जमीन पर ठीक से घास भी नहीं होती। पर वे कागज़ों में बम्पर पैदावार दिखा कर काले धन को सफेद कर लेते हैं।

कृषिक्षेत्र को आयकर से मुक्त क्यों रखा गया? क्या कभी किसानों ने यह मांग की थी? बिना मांगे इतनी बड़ी कृपा क्यों की गई? आज़ादी के बाद से अबतक केंद्र और राज्य के सदनों के सदस्यों की हैसियत देखिये। शायद ही कोई अपवाद स्वरूप ऐसा हो, जिसके पास कृषि भूमि न हो।

सैकड़ों हज़ारों एकड़ कृषि भूमि पर काबिज इन नेताओं ने अपनी नैतिक अनैतिक आय को कर मुक्त बनाये रखने के लिए यह व्यवस्था बनाई थी। इससे वास्तविक किसान जो खेतों में काम करता है, को कोई विशेष लाभ नहीं होता है।

आज़ादी के दौर में भूमि सुधार, एवं किसान की परिभाषा तय करने की मुहिम जोरशोर से चलने लगी थी। जमींदारी उन्मूलन की बातें भी होने लगीं थी। उस दौर में नारा लगाया जाता था कि खेती किसकी? जो जोते उसकी।

अर्थात किसान का अर्थ यह कि जो खेतों में काम करे। न कि वे जो भू स्वामी बन केंद्र और राज्य की राजधानियों में आलीशान कोठियों में रहते हों।

ऐसे हालात में आजादी के बाद संविधान में ही ऐसी व्यवस्था कर दी गई कि कृषि संबंधी निर्णय राज्य के अधिकार में शामिल कर दिए गये। क्योंकि उस समय उत्तर भारत में छोटे किसानों की तादाद अधिक थी, किसान आन्दोलन का ज्यादा ज़ोर था। अतः दक्षिण भारत के जमींदारो़ ने स्वयं जमींदारी उन्मूलन अधिनियम से बचाव की व्यवस्था बना ली। आज भी उक्त अधिनियम कई राज्यों में विधिवत लागू नहीं है।

सिर्फ कृषि ऋण पर अफसोस क्यों?

कृषि क्षेत्र को बर्बाद कर कारपोरेट जगत के लिए सस्ते मजदूर मुहैया कराने की कुटिल नीति पर भी विचार करो? क्या कारण है कि कृषि क्षेत्र के लिए ईमानदारी से नीति नहीं बनाई जाती? स्वामी नाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू करने में आना कानी क्यों? बड़े बकायादार कारपोरेट घरानों के नाम सार्वजनिक क्यों नहीं किए जाते? उद्योगों के अनुदान पर सवाल नहीं पर कृषि ऋण पर हाय तौबा क्यों?

शत्रुघ्न सिंह

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