समाज से लेते रहे बस जीवनभर, समाज को दिया क्या?

आज एक मित्र से Raymond के मालिक विजयपत सिंघानिया की बदहाली के बारे में जानकारी मिली।

उन्होंने एक video भी पोस्ट किया है जिसमें विजयपत सिंघानिया और उनकी पत्नी गाना गा रहे हैं…

हमने तो जब कलियाँ माँगी काँटों का हार मिला
जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला

आगे कहते हैं…

इसको ही जीना कहते हैं तो यूँ ही जी लेंगे
उफ्फ न करेंगे, लब सी लेंगे, आंसू पी लेंगे…

सिंघानिया जी के बारे में बता दूं कि बड़े उद्योगपति हैं, Raymond group के मालिक हैं जिसकी कुल औकात 3000 करोड़ रूपए के आसपास है।

कहते हैं कि विजयपत सिंघानिया ने कंपनी चूँकि बेटे के नाम कर दी, सब कुछ उसे दे दिया, सो बेटे ने सब कब्ज़ा कर लिया… अब ये दोनों पति पत्नी दाने दाने को तो नहीं, पर करोड़ करोड़ को मोहताज हैं… बेटे से मुकदमेबाज़ी कर रहे हैं… duplex flat का कब्ज़ा मांग रहे हैं…

देखिए हमारी भारतीय सभ्यता संस्कृति में हमारे ऋषियों मुनियों ने जीवन की हर समस्या का आसान हल सुझाया है… हमारी प्राचीन भारतीय जीवन शैली एक आदर्श जीवन शैली थी…

आज से कुछ साल पहले मैं बाबा रामदेव के सानिध्य में रहा हूँ… कुछ महीने, पतंजलि में…

वो कहते थे कि ये बताओ… सृष्टि में करोड़ों करोड़ों योनियाँ हैं जीव जंतुओं की, उनमें से सर्वश्रेष्ठ है मनुष्य… उसमें तुम्हें जन्म दिया ईश्वर ने… ये ईश्वर का अनुपम उपहार है तुम्हें, वरदान है ये मनुष्य जन्म, ये 60-70 साल हम लोग एक पत्नी और इन दो बच्चों के लालन पालन पोषण में ही निकाल देते हैं।

उन्हीं के लिए कमाना, संचय करना… बस इन्हीं 2 या 3 लोगों के लिए हम सारी उम्र जीते मरते हैं? धरती पर 7 अरब लोग हैं पर हमारा जीवन… 70 वर्ष का इतना लंबा काल… सिर्फ इन्हीं 3 लोगों की चिंता में बीत जाता है?
जीवन भर हम सारी हेरा फेरी, झूठ फरेब, चोरी चकारी… किसके लिए करते हैं? सिर्फ इन्हीं 3 प्राणियों के लिए?

जबकि हमारी प्राचीन व्यवस्था क्या कहती है?

25 वर्ष ब्रह्मचर्य… पढ़ो लिखो, योग्य बनो, skilled बनो…

25 से 50 तक गृहस्थ आश्रम में माता पिता, परिवार, बीबी बच्चे कुटुंब के लिए… कमाओ खाओ, परिवार के प्रति जिम्मेवारियां पूरी करो…

50 से 75… वानप्रस्थ… परिवार के लिए बहुत किया। 25 साल कम ना होते। अब समाज की भी कुछ सोचो… आखिर इसी देश – समाज ने ही तो सब कुछ दिया है। उसे भी तो लौटाना है।

सो 50 से 75 की आयु में, धीरे धीरे घर परिवार से दूर होकर समाज के लिए समाज में जीना शुरू करो।

परिवार की मोह माया जल्दी नहीं छूटती… इसलिए धीरे धीरे छोड़ो… कुछ दिन को चले गए, घूम फिर आये… कुछ दिन रहे फिर चल दिए… इसी तरह धीरे धीरे घर से दूर और समाज के निकट होते गए… जब तक सिर्फ परिवार के लिए करते थे तो सिर्फ परिवार दिखता था, तो सिर्फ परिवार से मोह था… जब परिवार से ऊपर उठ समाज के लिए करने लगोगे तो समाज से मोह होने लगेगा…

75 के बाद अगर जीवित रहो तो संन्यास…

आप जानते हैं, विजयपत सिंघानिया की समस्या क्या है?

75 साल की आयु में भी उनका मोह नहीं छूट रहा… वो जो 3000 करोड़ कमाए हैं न उनका मोह…

उन्होंने दूसरी गलती ये की कि सारी संपत्ति… सब कुछ बेटे को दे दिया… समाज के लिए क्या दिया?

Bill Gates ने तो सिर्फ 10% अपनी औलाद को दिया, बाकी 90% समाज को…

विजयपत सिंघानिया सारी ज़िन्दगी मुम्बई में रहे। वहीं मरना भी चाहते हैं। अरे भैया, इसी देश में हरिद्वार भी है, काशी भी, पुरी भी, उत्तराखंड और हिमांचल के गांव हैं… हज़ारों नहीं लाखों मठ मंदिर गुरुद्वारे हैं, अनाथ आश्रम हैं, वृद्धाश्रम हैं, गौ शालाएं हैं, गुरुकुल हैं, Charitable अस्पताल हैं… क्यों उसी Duplex flat और उसी Duplex ज़िंदगी से चिपके रहना चाहते हो… अरे यार आओ तो… देखो तो हिंदुस्तान… कितना जीवंत राष्ट्र है… कुछ दिन भिक्षाटन करके जी के तो देखो… कुछ दिन तो समाज में, समाज के लिए जी कर देखो… समाज को कुछ दोगे तभी तो वापस मिलेगा।

हमारे ऋषि मुनि मूर्ख नहीं थे, हवा में तीर नहीं चलाते थे… उन्होंने सब कुछ सोच के व्यवस्था बनाई थी… एक सवाल आता है… जब तक शरीर चल रहा है तब तक तो ठीक है। जिस दिन बिस्तर पर पड़ गए उस दिन कौन सम्हालेगा…

इसकी तो इतनी उत्तम व्यवस्था दी है हमारे समाज ने जिसका जवाब नहीं…

संलेखना… संथारा कहते हैं जिसे…

इसके बारे में अगले भाग में…

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