युद्ध से जीवित निकले, तो जो बचेगा वही देगा सारे इतिहास को सार्थकता


मेरठ में मेरी रेजिमेंट की मेस बहुत ही आलीशान थी। घुसते ही दरवाज़े पर एक शानदार बाघ… सचमुच के बाघ की खाल को अंदर से कुछ भर के सजाया गया था।

अंदर दीवालों पर बाघ, तेंदुए और हिरण के सर सजे हुए थे। न जाने कितने ही चाँदी की ट्रॉफियाँ और शील्ड सजे हुए थे, जिनमें से हरेक का अपना इतिहास था।

उसमें से अनेक तो डेढ़-दो सौ साल पुराने थे। आलीशान डाइनिंग टेबल ही पता नहीं कितनी पुरानी थी। सौ साल पुरानी तो विज़िटर्स बुक रही होगी। दर्जनों पुरानी बंदूकें और तलवार ढाल दीवारों पर टंगे थे।

पहले और दूसरे विश्वयुद्ध से जुड़े अनेक प्रतीक थे। जिस चीज़ पर हाथ रखो वह इतिहास का एक टुकड़ा था। खुद मेस की गेस्ट रूम 1857 में बहादुरशाह जफर की जेल रही थी।

पर जब रेजिमेंट लड़ाई की तैयारी के लिए मोबिलाइज़ हुई तो हम अपने साथ क्या ले गए? साथ गया टेंट, कैम्प कॉट, बिस्तरबंद, राशन, गाडियाँ और हथियार। मेस के बर्तन और चम्मच कांटे साथ गए थे।

पर जब लड़ाई के लिए निकलना था तो सख्त हिदायत थी कि साथ सिर्फ वही ले जाना है जो आपको ज़िंदा रखे… यानि हथियार, राशन और मेरी दवाइयाँ। और बेशक, रेजिमेंट का झंडा…

हमारी परम्पराएं बहुत कीमती हैं। हमारा इतिहास उससे जुड़ा है, हमारी पहचान जुड़ी है। पर हमें समझना है कि हम एक युद्ध में हैं। यह सभ्यता के सर्वाइवल का युद्ध है। इसमें हमारे साथ सबकुछ नहीं चल सकता।

बहुत कुछ है जो कीमती है, पर हमारे साथ वही चलेगा जो युद्धकाल में उपयोगी हो। आपका शानदार मेस साथ नहीं जाता। बाघ की खाल साथ नहीं जाती।

सीओ साहब भी टेंट में ही सोते हैं। लड़ाई की रात में वे भी टैंक पर ही होंगे। अगर नींद आएगी तो बड़े से बड़ा ऑफिसर भी उसी रेत पर सोएगा जिसपर जवान सोता है। उसी कुकहाउस की रोटी खायेगा जो जवान खाता है। गोले गिरेंगे तो उसपर भी गिरेंगे और गोली आएगी तो उसे भी लगेगी।

यह लड़ाई लड़नी है तो साथ मिल कर ही लड़नी है। और एक टीम बनकर ही लड़ना है। अपनी हर परंपरा, हर कर्मकांड साथ नहीं चल सकता। हाँ, हिंदुत्व का ध्वज साथ चलेगा, पूज्य भगवा साथ चलेगा… पर बहुत से प्रतीक पीछे छोड़ने होंगे… आपके हिस्टॉरिकल क्लेम कुछ भी हों। युद्ध से जीवित निकले तो जो बचेगा वही उस सारे इतिहास को सार्थकता देगा।

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