बंद करनी ही होगी किसानों की दादागिरी

गंगा महतो को तो आप लोग जानते ही हैं। खोपोली वाला गंगवा… गंगा किसान परिवार के हैं, वो जिसने सचमुच किसानी की है अपने हाथ से, ज़मीन से जुड़े व्यक्ति।

पिछले दिनों गंगा महतो ने लिखा… किसी एक राज्य सरकार ने अपने किसानों को चेतावनी दी थी कि खबरदार, बाँध में जमा पानी और नहर के भरोसे कोई धान की अतिरिक्त फसल लेने की कोशिश न करे… मानसून से पहले धान नहीं लगाना है। Dams में जो पानी जमा है वो पेय जल और इंडस्ट्री के हिस्से का है… किसान इसपर गिद्ध दृष्टि न गड़ाएं… ऐसा कुछ आदेश था सरकार का।

अब इसपर गंगा महतो जैसे समझदार, पढ़े लिखे, जागृत, प्रबुद्ध, ज़मीन से जुड़े व्यक्ति की ये टिप्पणी थी कि ‘वाह… हम तो समझते थे कि भारत कृषि प्रधान देश है।’

इसी तरह एक बार एक और धरती पुत्र, सीनियर जर्नलिस्ट मने गरिष्ठ पत्रकार, धरती पुत्र इसलिए क्योंकि बनारस राजघाट में उनकी छत पर 52 बीघा पुदीना लगा है… एक दिन मैं उनके घर गया तो एकदम अगिया बेताल हुए पड़े थे, मुझे देखते ही फट पड़े… ऐसे जैसे खालिस्तानी hand grenade हों…

मैंने पूछा, अबे का हुआ, काहे लाल हो रहे हो…, तो वे अखबार दिखा के बोले, ये देखो इस फेंकू की लफ्फाज़ी… कहता है गुजरात में 12% सालाना ग्रोथ है कृषि में… ये देखो… गुजरात को गेहूं हमसे, उत्तरप्रदेश से मंगाना पड़ रहा है… हम क्यों दें अपना गेहूं? खुद उगाओ अपना गेहूं…

हम कहे, एकदम्मे गदहे हो का बे??? कोदो दे के पढ़े हो का बे? काहे का जर्नलिज़्म करते हो बे? कृषि बोले तो Agriculture की कुछ ABC जानते भी हो???

हर इलाके की, हर मिट्टी, हर जलवायु की एक खास फसल होती है। अबे मरवाओगे क्या गुजरात में गेहूं की खेती करा के… बेटा जी, गुजरात सूखा प्रदेश है। पानी की भारी किल्लत है। न ज़मीन के ऊपर पानी है न नीचे…

पीने भर पानी मुश्किल से जुटा पाता है गुजरात। ऐसे इलाके में कम पानी की फसल उगाई जाती है। वो जो एकाध बारिश में भी हो जाए जैसे चना, मटर, जौ, बाजरा… गेहूं को 5 बार पानी देना होता है प्रभु… गेहूं वहां की फसल है जहां प्रचुर पानी हो सिंचाई के लिए। रेगिस्तान में धान गेहूं की खेती कराओगे?

आज पंजाब में हाहाकार मचा है। धान की खेती के कारण अंधाधुंध भूगर्भीय जल का दोहन हो रहा है और जल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। कई जगह तो जल स्तर 20 मीटर तक नीचे चला गया है।

अब पंजाब सरकार ने 10 जून से पहले धान की खेती पर प्रतिबंध लगा दिया है… बहुत जल्दी ये तारीख 20 जून तक बढ़ सकती है। पर अगर पंजाब ने बहुत जल्दी धान की खेती बंद नहीं की तो पंजाब को रेगिस्तान बनने से कोई नही रोक सकता…

यही हाल हरियाणा का है… कारण ये है कि पंजाब हरियाणा में इतनी वर्षा नहीं होती कि यहां धान की खेती हो सके। धान वर्षा आधारित कृषि है। इसलिए ये मूलतः बंगाल ओडीसा, बिहार, पूर्वी उत्तरप्रदेश, असम, नॉर्थ-ईस्ट और उन तटीय क्षेत्रों की कृषि है जहां खूब बारिश होती है…

बंगाल में तो धान की एक नहीं बल्कि 3 फसल तक ले ली जाती हैं… वहां धान को ट्यूबवेल से पानी नहीं देना होता, जबकि हरियाणा पंजाब में धान को 90% पानी ट्यूबवेल से दिया जाता है…

इसीलिए ये आत्मघाती कृषि है, पर किसान अपने लालच में किये जा रहा है, उसे अपने पर्यावरण को कोई चिंता फिक्र नहीं, वो नहीं सोचता कि उसकी आने वाली संततियां आगे क्या करेंगी, उनके लिए मैं ये ज़मीन रेगिस्तान बना के छोड़े जा रहा हूँ???

ऐसे ही किसान बाँध में जमा पानी के भरोसे धान की एक अतिरिक्त फसल लेने के चक्कर में थे जिसपर राज्य सरकार ने चेतावनी दी… उसने कहा कि खबरदार, बाँध का पानी पेय जल और उद्योगों के लिए है… ऐसे में गंगा ने कृषि प्रधान होने का तंज़ किया…

सवाल ये है कि सरकार इंडस्ट्री को चलने दे या नहीं… आज यूपी-बिहार का रोना क्या है? वो रोते हैं कि हाय, हमारे प्रदेश में इंडस्ट्री नही है, हाय हम पिछड़ गए, हाय हम गरीब रह गए…

सरकारें अपने राज्य में इंडस्ट्री लगाने के लिए क्या क्या नहीं करती, उद्योगपति, पूंजीपति, Entrepreneur को तरह तरह की सुविधा दे के बुलाती हैं। उद्योग लगाने के लिए ज़मीन चाहिए, वो आप देना नहीं चाहते, इंडस्ट्री के लिए बिजली चाहिए, कुछ पानी चाहिए… वो आप देना नहीं चाहते… फिर रोते भी हैं कि हमारे पास industry नहीं??? रोज़गार नहीं??? वृद्धि और विकास नहीं???

कृषि और उद्योग में तालमेल संतुलन बैठाना होगा… पर्यावरण के अनुकूल ही कृषि करनी होगी। सिंचाई की तकनीक बदलनी होगी। Flooding method से सिंचाई बंद करनी होगी… सिंचाई की नई तकनीक अपनानी ही होगी… बेमौसमी और पर्यावरण प्रतिकूल कृषि हर हाल में बंद करनी होगी।

आज महाराष्ट्र में जो पेयजल संकट है उसका मूल कारण गन्ने और केले की खेती है। ये ऐसी खेती है जिसमें साल भर पानी देना होता है। जिस प्रदेश में पीने भर पानी न हो, जहां हर दूसरे साल अकाल, सूखा पड़ जाता हो, जहां पीने का पानी टैंकर से लाना पड़े, वहां का किसान गन्ने की खेती करे और उस गन्ने की खेती के कारण Distillary चलाने की मजबूरी भी हो और तुम्हारे ये गन्ने की खेती और Distillary मिल के बाँध का सारा पानी चट कर जाएं तो फिर बाकी जनता प्यासी क्यों न मरेगी???

किसानों की दादागिरी बंद करनी होगी। इन्होंने भावनात्मक दोहन बहुत कर लिया। सच्चाई से बहुत दिन मुंह नहीं मोड़ सकते।

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