हम एकबार भी एक सुर में बोल दें तो लौट आएगा 16 मई, 2014 का वो दिन

कभी-कभी मैं सोचता हूं कि हम भक्त नहीं होते तो ये फेसबुक कितनी मुर्दा जगह होती।

सारे वामी-कामी-जिहादी-इतालवी माफिया एक सुर में इस बात पर बहस करते कि धूप का रंग भगवा या पीला जैसा क्यों है, तिलक और जनेऊ ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का द्योतक है, ये महिलाओं और अल्पसंख्यकों को आतंकित करते हैं।

तत्सम हिंदी बोलना फासिस्ट ताकतों की साज़िश है। इसके पीछे उद्देश्य हिंदू पुनरुत्थान का है। गे और लेस्बियन जैसे अपने लोगों की वाह-वाह होती। देखो… हाऊ माडर्न, सो प्रोग्रेसिव।

और कहीं मंदिर का पुजारी काट दिया गया तो भी प्रतिक्रिया ऐसी ही होगी- ओह पूअर फेलो… रिग्रेसिव ही वॉज़ बट व्हाई समवन शुड किल हिम…

कभी-कभी तो लगता है जैसे मुशायरे में होता है कि बंदा मंच पर खखार रहा है और नीचे से वाह-वाह चालू हो गया। एक परम प्रतिष्ठित हिंदी अखबार के सेवानिवृत्त संपादक और एक परम सेकूलर एंकर के सारे विद्वान प्रशंसक ऐसे ही हैं। वो खांस रहे होते हैं तो भी सेकूलर चाटुकारों को लगता है कि कोई शास्त्रीय गायक आलाप ले रहा है। वाह सर – वाह सर… गज़ब।

एकेश्वरवादियों का यही संसार है। वो चाहे मार्क्स के हों या मुहम्मद के। जिसने सुर नहीं मिलाया वो काफिर और वाजिब-उल-कत्ल हुआ।

अब हमारे भक्तों का रंगबिरंगा संसार देख लीजिए। भांति-भांति के जीव-जंतु मिलेंगे। परम भक्त मिलेंगे, नोटासुर मिलेंगे, फूफा हैं, दद्दा हैं, लकड़बग्घे हैं। पूरा भोले बाबा की बारात है।

कोई रोज़ उपलब्धियां गिनाता है कि देखो हमने वो कर दिखाया जो 70 साल में नहीं हुआ। तत्काल कोई अविश्वास प्रस्ताव लेकर हाज़िर हो जाता है। मोदी ने ये नहीं किया, वो नहीं किया, फिर क्यों वोट दें। असंतुष्टों की सूची लंबी है। आम असंतुष्टों की शिकायत है कि मंदिर नहीं बना, धारा 370 नहीं हटी।

पढ़े लिखे लोगों में स्थिति और विकट है। किसी को लगता है कि आर्थिक मोर्चे पर तो सरकार की नीतियां काँग्रेसियों से भी ज्यादा समाजवादी हैं जबकि आरोप उद्योगपति दोस्तों को फायदा पहुंचाने के हैं।

किसी को लगता है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मोर्चे पर कुछ किया ही नहीं। अतीत पर गर्व करने वालों की शिकायत है कि इतिहास के पुनर्लेखन की दिशा में तो कुछ हुआ ही नहीं।

पर सब मानते हैं कि टुकड़े-टुकड़े गैंग तो इनमें से कुछ भी नहीं करेगी। इसलिए विधानसभा चुनावों के नतीजे भी अच्छे हैं। कुछ फूफा और नोटासुर प्रायश्चित की मुद्रा में हैं। घर वापसी से किसने रोका है। अब एकजुट होने और एक सुर में हर हर महादेव के जयघोष का समय है।

हम एक बार भी एक सुर में बोल दें तो 16 मई, 2014 का वो दिन फिर लौट आएगा। मध्य प्रदेश में वोट हमें कांग्रेस से ज्यादा मिला है, राजस्थान में आधा फीसद का फर्क है। लौट के बुद्धू घर आ जाएं, ये देश हमारा है। आखिर में हमारे और आप जैसे लोगों के कारण ही यह देश अभी भी सनातनी है।

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