भक्त महिमा : रहस्य भक्तों में नहीं, भक्त विरोधियों में हैं

modi bhakt ma jivan shaifaly making india

ये भक्त महिमा ही है कि आज इसे व्यंग्य के तौर पर इस्तमाल किया जाता है। अच्छी बात है। कुंठित हो चुकी मानसिकता को भी आसरा चाहिए होता है। इस शब्द का उपयोग करके भक्त विरोधी खुद को बड़ा सेकुलर समझता है। जैसे मुहर लग जाती है कि ये बुद्धिजीवी है।अक्लमंद है।

कितना प्रचुर आत्मसुख है ये उनके लिए जो भक्त का उच्चारण करते हैं। ऐसे महानुभाव भक्तों को समझाते हैं कि उनका दिमाग नहीं है। या उनका दिमाग घुटनो में होता है। कितनी चिंता है उन्हें भक्तों की। इतनी कि वे भूल जाते हैं कि खुद उनके घुटने छिलने लगे हैं टिक टिक, मुड़ मुड़ कर।

इतने क्यों झुका लेते हैं वे घुटने कि नतमस्तक जैसी स्थिति बन जाती है? इससे बेहतर भक्त ही है न …झुके हुए , समर्पित। तो या तो वे नहीं मानते कि भक्त झुके हुए होते हैं? या नहीं मानते कि भक्त समर्पित हैं? ऐसा है तो फिर वे चिढ़ाने का कौनसा उद्देश्य लिए चिल्लाते हैं और क्या वे ऐसा कहते हुए महानता को हासिल हो जाते हैं?

रहस्य भक्तों में नहीं, भक्त विरोधियों में हैं। जिनमें रहस्य है, जिनमें कुछ छिपा है वे छद्मी कहलाए जाते हैं। ठग होते हैं। इसी ठगी को पर्दे में ढंकने के लिए वे एक विशेष वर्ग को भक्त कहते हैं।

दूसरा, मानसिक विक्षिप्तता का ये एक उदाहरण है। खीझ है। आक्रोश है। गुस्सा है। क्रोध है। ऐसी तमाम स्थिति को शास्त्र अंधा हो जाना कहते हैं। अंधे लोग अपनी बातों को मनवाने के लिए किसी ऐसे शब्द का इस्तेमाल करते हैं जो चुभे।

भक्त शब्द काँटा नहीं है। जो भक्त हैं ही उन्हें इससे क्या मतलब कि कौन क्या कह रहा है?और कह भी रहा है तो सत्य ही है ये। यह स्थिति उन भक्त विरोधियों के लिए और ज्यादा कपड़े फाड़ने जैसी बन जाती है। उनकी अवस्था चिंताजनक है। वे नहीं जानते कि भक्त शब्द का वे इस्तमाल क्यों करते हैं? वे करते तो ये जतलाने के लिए कि मूर्ख हैं भक्त किन्तु खुद की मूर्खता पर ध्यान नहीं देते। वे इस शब्द का प्रयोग कर अपनी बौद्धिकता पर बाँध बना लेते हैं। या तो उनकी जानकारियां समाप्त हो चुकी होती है, या उनके पास बहस करने की क्षमता नहीं है।

कोई किसी का भक्त है ये कह कर चिढ़ाने में सुख ढूंढना अपने आपमें ही कितना निचले स्तर का सुख है जो कोई भी गधा यूं ही प्राप्त करता रहता है। इस लिहाज से भक्त विरोधी की मानसिकता का पैमाना ज्ञात किया जा सकता है। उसका आईक्यू कितना हो सकता है, आसानी से समझा जा सकता है।

ये भक्त की महिमा ही है कि आज विक्षिप्त मानसिकता के लोगों की नकाबें उघाड़ दी गई है। एकबारगी भक्त होना उचित है, भक्त को भक्त भक्त कह कर बाज़ार में नँगा करने की हिमाकत कर रहे लोग खुद अपनी चड्डी सम्भाल नहीं पाते और नँगे हो जाते हैं कि वो आखिर कौन हैं? इसमें भी मज़ा ये कि वे नँगे नाचते रहते हैं और उन्हें ज्ञात ही नहीं रहता कि वो किसी सर्कस के जोकर की तरह लगते हैं न कि अल्बर्ट आइंस्टीन की तरह कि लोग उन्हें गम्भीरता से ले सकें।

अमिताभ जगदीश

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY