हार : एक अप्रत्याशित हितैषी

मेरे एक प्रिय और आदरणीय मित्र अपने एक फ़ेसबुक पोस्ट में जिक्र करते हैं कि दुःख शक्ति देता है। जो वेदना में है वह द्रष्टा हो सकता है।

आजकल लोग जल्द आहत हो जाते हैं। वैचारिक असहमति हुई कि नहीं कि पहला शब्द यही निकलता है “बस बहुत हो गया”।

ऐसे में तर्क और संवाद पीछे छूटता जाता है… लाञ्छन और उपहास आपका आसरा बन जाता है। आप समानधर्मा लोगों का घेरा अपने आस पास बना लेते हैं जो आप जैसी बातें सोचते हैं, बोलते हैं…

…और आप भीड़ में तब्दील होने लगते हैं।

और आदरणीय मित्र प्रणय कुमार ने भी कभी लिखा था कि दुःख और चुनौतियाँ हमें माँजती हैं।

इन दोनो विचारों की चमकीली धूप में कुछ विचार अंकुरित हुए जो आपके सामने पेश है।

ये बात महाकवि भास ने अपने एक चरित्र से कहवायी है कि “चक्रारि पङ्क्तिरिव गच्छति भाग्यपङ्क्तिः” अर्थात् पहिये की धुरियों के समान भाग्य की गति होती है, कभी ऊपर तो कभी नीचे।

बस इतना तय है कि कुछ भी तय नहीं है, चाहे हार हो या जीत। पर मानव मन है जीत पर उत्साहित और हार पर निढाल हो ही जाता है, मतलब आहत और निराश।

जबकि आचार्य चाणक्य लिखते हैं कि हार के लाभ भी हैं, हार हमें नम्र बनाती है, शत्रु का आदर करना सिखाती है, सामर्थ्य का आंकलन और पुनर्निरीक्षण का अवसर देती है और अगर कोशिशें जारी रहें तो जीत को संयोग के बदले अवश्यंभावी बनाया जा सकता है।

पर मानव मन भीड़ होने को मचलता है, क्यों कि उसे पता नहीं होता भीड़ आसरा तो देती है पर हौसला छीन लेती है।

अगर याद करें तो कुरुक्षेत्र का संख्याबल कभी यह साबित नहीं कर पाता है कि धर्म या सत्य पाण्डवों की तरफ रहा या कौरवों की तरफ, पर कौरवों की हार तेरह सालों की सुख निद्रा से उपजे आलस्य का परिणाम था न कि “यत्र योगेश्वरः कृष्णः यत्र पार्थो धनुर्धरः…” वाली बात का निष्कर्ष।

पर ये बात माननी पड़ेगी कि जुए में हार, द्रौपदी के तिरस्कार और सत्य के अंधानुकरण से रक्षित अधर्म के उत्थान ने पाण्डवों को उद्वेलित किया, माँजा और एक महारथी के रूप में और अधिक दैदीप्यमान बनाया। परिस्थितियों से जन्मी हार की बगैर ना नुकुर स्वीकार्यता ने अधर्म द्वारा आरोपित हार को विजयश्री के हार में तब्दील होने को आसान बनाया तो विषम परिस्थितियों को सहने की शक्ति दी और अपरिमित धैर्य के साथ इससे जूझने का रास्ता भी दिखाया।

पाशुपतास्त्र के लिये ब्रह्मास्त्र ज्ञाता अर्जुन की तपस्या और भीम का हनुमान से साक्षात्कार और विभिन्न राज सत्ता को अपना मित्र बनाने के बदले राज्य-सत्ता हीन विवेकी कृष्ण की मित्रता के सहारे पाण्डवों के द्वारा की गई संघर्ष की तैयारी में उनके धैर्य की सहज अनुभूति की जा सकती है जबकि वन में तम्बू लगा कर कौरवों का पाण्डवों की दुर्दशा देखने की इच्छा, मदिरा पान और गंधर्व चित्रसेन के परिवार की स्त्रियों के साथ कुत्सित चेष्टा यह बताने को काफी है कि किसने एक समान काल चक्र में कब, क्या और कैसा व्यवहार किया।

कभी दो सदस्यों पर सिमटा एक विचार समूह अगर सत्ता के शिखर पर पूर्ण बहुमत से विराजमान हो पाया तो इसके पीछे धैर्यवान विचारकों का अथक परिश्रम ही था, वर्ना इन पाँच सालों में हम ने देखा है एक राज्य में संसदीय जीत के बाद विधायकीय पराजय पर शीर्ष ने राज्य के डीएनए पर ही प्रश्न चिह्न लगा दिया था और उन्हीं की देखा देखी उनके अनुयायियों ने हालिया तीन चार समतुल्य पराजयों के बाद अद्वितीय विचारशील आर्य जनमत को सब्सिडी-लोलुप दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

शायद अल्बर्ट आईन्स्टीन ने कहा है कि मैं अधिक बुद्धिमान नहीं हूँ पर आम लोगों की तुलना में समस्याओं के साथ ज्यादा समय गुज़ार सकता हूँ, इसलिये समाधान तक पहुँचने की मेरी क्षमता औरों से थोड़ी ज्यादा है।

बस यही बात हर हारे हुए इन्सान, राजनैतिक दल, भागे हुए उद्योगपतियों को ज़रूर ध्यान में रखना चाहिये। आप मुश्किलों के साथ अन्यों की तुलना में थोड़ी देर और टिक कर देखिये… परिवर्तन दिखेगा।

अपनी गलतियों के लिये दूसरों को दंड देना ही क्रोध है और आज कल राजनीतिक दल, संस्थाएँ, उद्योगपति, न्यायालय, शासक, शासित, उत्पीड़क , उत्पीड़ित, नेता, अनुयायी गण आदि सबके सब क्रुद्ध हैं।

इसके पीछे दरसल एक डर है पहचान के संकट के उभरने का, कि कहीं चर्चा-च्युत हुआ तो पहचाना भी जाऊँगा कि नहीं। संसद का घेराव, चर्चित स्थानों पर धरने, गो मांस भक्षण करते हुए सेल्फी, भारत के टुकड़े होने के नारे, सेक्यूलर दिखने का पाखंड आदि सबके सब इसी बीमारी के लक्षण रहे।

भारत का यह सौभाग्य रहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सत्ता के उन्नयन के साथ दक्षिणपंथी विचारक भी धैर्य से आर्यावर्त के राम सेतु निर्माण में अपना गिलहरी वाला योगदान सदैव देते रहे।

दूसरी ओर वामपंथ युवाओं को आकर्षित करता रहा अपने समतामूलक समाज की व्यापक अवधारणा की विचार के कारण, पर वह अवधारणा कार्नो के संकल्पनात्मक इंजन से ज्यादा कुछ न बन सकी। बस यह पंथ एक वैचारिक धौंस जमाते हुए सत्ता में सहभागिता बनाता रहा या दलितों, वंचितों, शोषितों, श्रमिकों, किसानों, मध्यवर्ग के असंतोष को भुना कर सामाजिक विद्वेष को पैदा करके सवर्णों, पूँजीपतियों और समृद्ध तबके का भय दोहन करके अपने अस्तित्व के लिये ऑक्सीजन पाता रहा।

सत्ता से दूर बैठा दक्षिणपंथ एक विचारकों का समूह बना रहा पर जैसे ही सत्ता मिली उसमें भी सत्तालोलुपता के जीवाणु विकसित हो गये। पराजित प्रतिनिधियों को निर्णयात्मक शक्ति दे दी गई। आयातित वैचारिक तस्कर समर्पित कार्यकर्ताओं की निष्ठा पर भारी पड़ने लगे। कुशासनजनित शून्य में एक सबल विकल्प बनने का संयोग नवागंतुक थिंक टैंकों को अपना हक़ लगने लगा।

आर्य जनमत की आशा की किरण बनने के बदले यह युवा नेतृत्व पड़ोसी की देहरी पर रखा दीपक बनने में गर्व अनुभव करने लगा। अपनी माँ को वृद्धावस्था पेन्शन के सहारे छोड़ कर पड़ोस की बूढ़ी काकी को शॉल देने में यह नेतृत्व खुद को गरिमामंडित मानने लगा था।

येन केन प्रकारेण शासन के आभा मंडल में प्रतिस्थापित रहना उसका शगल बन गया, फलतः विचारों की धार कुन्द होने लगी है और यहीं भूल हुई। हार का हलाहल, अनुभव का पेट ही पचा सकता है, नई पीढ़ी की जुबान पर तो पिज़्ज़ा, बर्गर के साथ कोक की स्केटिंग ही संभव है। अनुभव को दरकिनार कर जोश को तरज़ीह देना लगभग बन्दर को उस्तरा थमाने जैसा भी हो सकता है ये एक अनुभवी मस्तिष्क ही समझ सकता है। कभी कभी नतीज़ों के आँकड़ों से ज़्यादा तरीकों की पाकीज़ग़ी ज्यादा असरदार हो जाती है।

आसक्ति बुरी है, ज़र की हो, ज़मीन की या ** की… और सत्ता की तो क्या कहने!

गीता में कृष्ण कहते हैं कि –

संगात् संजायते कामः कामात् क्रोधोभि जायते
क्रोधात् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः
स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति॥

अर्थात् साहचर्य संलग्नता से कामना उत्पन्न होती है और कामना पूर्ति न होने पर यानी इच्छित परिणाम न आने पर क्रोध आता है। क्रुद्ध मनुष्य मोहग्रस्त हो जाता है और मोहग्रस्त होना स्मरण शक्ति का नाशक बन जाता है। स्मरण शक्ति का नाश बुद्धि को हर लेता है और बुद्धि के नाश होते हीं सर्वनाश निश्चित है।

अतः व्यक्ति हो, संस्था हो, राजा हो या शासन तन्त्र, आसक्ति रहित होकर अपने दायित्वों का निर्वहन ही आपका कर्तव्य है। त्याग और ईर्ष्यारहित व्यवहार और आचरण हार को भी प्रभावहीन और जीत को अपरिहार्य सिद्ध कर देता है। व्यक्ति के आलस्य और शीर्ष की सत्ताजन्य तन्द्रा के नाश की ज़रूरत सदैव रहती है। अच्छी शुरुआत के लिये देर कभी नहीं होती है।

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY