कहां है वो नेतृत्व, जो हिंदुओं की दिग्भ्रमित भीड़ को एक सेना में बदल सके

फौज में लड़ने वालों के अलावा बहुत से सपोर्टिंग सर्विसेज वाले होते हैं। राशन रसद पहुँचाने के लिए सर्विसेज़ कोर, हथियार इक्विपमेंट के लिए ऑर्डिनेंस, घायलों के लिए मेडिकल कोर… यहाँ तक कि एजुकेशन कोर और लीगल कोर भी होती है।

यह तो हुआ सपोर्ट। हमारी थल सेना में लड़ने वालों में है इन्फेंट्री, आर्टिलरी और आर्मर्ड… उसके अलावा इंजीनियर्स जो पुल और रास्ते बनाते हैं और सिग्नल कॉर्प्स भी फाइटिंग आर्म्स में ही गिने जाते हैं।

किसी भी लड़ाई के ये आवश्यक अंग हैं।

और हमारे शत्रुओं ने इसे ठीक ठीक पहचाना है। उनकी फौज में सिर्फ बंदूक लेकर लड़ने वाले आतंकी ही नहीं हैं। उनके लिए सड़कों पर भीड़ जुटा कर लड़ने वाले पत्थरबाज़ भी हैं। और ऐसी ही भीड़ वे देश में जगह जगह अलग अलग बहानों और अलग अलग नामों से जुटाने की क्षमता रखते हैं। अंदर में उनका कोर एक ही होता है क्योंकि उनके पास एक भीड़ बनकर जुटने वाली कौम है जो किसी भी बहाने से जुटने और दंगे करने को तैयार है।

यह भीड़ उनकी इन्फैंट्री है।

पर उसकी सपोर्टिंग सर्विसेज़ को देखिये। उन्हें मीडिया, ज्यूडिशरी और दुनिया भर के इंटेलेक्चुअल का क्या सपोर्ट मिलता है वह देखने लायक है। यह धमक भी है कि वर्ल्ड कम्युनिटी, यूएनओ और 52 देश वगैरह वगैरह उनके साथ हैं, उनकी एयरफोर्स हैं।

हमारे ही संसाधनों से चलने वाली हमारी यूनिवर्सिटीज़, हमारे स्कूल उनके रिक्रूटमेंट ऑफिस हैं। और उनके आपस के कम्युनिकेशन का कहना ही क्या? किस तरह किसी एक बात को लेकर एक साथ हंगामा करते हैं… सारे चैनल पर, दुनिया भर के अखबारों तक एक साथ ब्रेकिंग न्यूज़ करते हैं वह तो कमाल ही है।

और हमारा क्या हाल है? संख्या तो है, पर एक फौज की तरह साथ आने की ट्रेनिंग नहीं है। साथ आ भी नहीं सकते, क्योंकि एक कॉमन पहचान, एक यूनिफार्म तक नहीं है। साथ आना किस लिए है इसका एक कॉमन पर्पज़ नहीं पता। बल्कि हम एक लड़ाई में हैं इसकी समझ तक नहीं है।

और यह सब नहीं होने की पहली वजह है… हमारा एक कमांड पोस्ट नहीं है। और हमने ले देकर एक को अपना कमांडर चुन दिया तो उसे यह पता ही नहीं है कि इस लड़ाई में उसकी फौज में कौन है। क्या पता, उसे पता हो… पर अपनी फौज से कोई कम्युनिकेशन तक नहीं है। हमारी सिग्नल रेजिमेंट है ही नहीं। ऐसा कोई प्लेटफार्म नहीं है जहाँ हम आपस में कम्यूनिकेट कर सकें, संपर्क बना सकें।

सोशल मीडिया के नाम से एक प्लेटफॉर्म बना था… लगा था कि एक समाज की तरह हमने कम्यूनिकेट करना सीख लिया… समझ में आता है कि हममें आपस में संवाद करने की बेसिक समझ नहीं है। एक दूसरे से लड़ते झगड़ते लोग… एक दूसरे पर कीचड़ उछलते, एक दूसरे की गलतियाँ गिनाते लोग…

विश्वास ही नहीं होता कि दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यता, जिसने दुनिया की पहली भाषा बनाई, सबसे पहला साहित्य रचा, जहाँ 220 से अधिक भाषाएँ बोली जाती हैं… संवाद की धरती पर इतनी दरिद्र है?

हमारी सबसे पहली ज़रूरत है संवाद की इस दरिद्रता को दूर करना। हमारी आपात्कालिक आवश्यकता है हिन्दू काँग्रेगेशन का निर्माण… एक कमांड पोस्ट तैयार करना और सिग्नल कॉर्प्स बनाना जिससे संवाद स्थापित हो… जो हिंदुओं की इस दिग्भ्रमित भीड़ को एक सेना, एक शक्ति में बदल सके।

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