विभक्त करनेवाले खुद हो गए ख़ाक, सनातनता का मस्तक आज भी है खड़ा


उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम- हरेक दिशा में सनातनता एक है, यह अपनी जड़ों से कटे और अपनी ही मां पर शर्मिंदा होनेवाले वामी-कौमी कभी नहीं जान पाएंगे।

मैं उस विरासत की बात कर रहा हूं, जो हमारा धर्म है, जो सत्य है, सनातन है, शिव है और सुंदर है। यह धर्म वह अनुशासन है, जो अंतरात्मा को स्पर्श करता है, बुराई से संघर्ष करने में हमारी सहायता करता है तथा काम, क्रोध और लोभ से हमारी रक्षा करता है।

और, यह आज के अफीमची मार्क्सवादी लबाड़ कभी नहीं जान पाएंगे। यदि इन्होंने चार्वाक और नागार्जुन से भेंट भी कर ली होती, तो कराल मराकेश इनको उनके पैर की धूल की धूल का धूल ही लगेगा। उत्तर और दक्षिण का यह भेद चाहे जितना भी बना लें, लेकिन सारतः वह एक ही है, इसलिए केरल में मंदिरों में जाने का जितना कड़ा विधान आपको दिखेगा, उतनी ही आसानी से वहां मदिरा का पान भी किया जाता है। बेंगलुरू में शिव और विष्णु एक साथ विद्यमान मिलेंगे, तो चन्नई में गणेश मिल जाएंगे। समन्वय और समानता की यह परंपरा विदेशी चाटुकारों के चरण-चुंबन करनेवाले बौद्धिक दोगले क्या जानेंगे?

ध्यान दीजिएगा, धर्म का सार उन धर्म सिद्धांतों और धार्मिक मतों में, विधियों में, संस्कारों में नहीं है, जिनसे हममें से अनेक को विरक्ति होती है, बल्कि युगों की गंभीरतम बुद्धिमत्ता में, अनवरत तत्वज्ञान में, आधिभौतिकता के सतत अभ्यास और भौतिकता के सतत् अनभ्यास में है। वर्तमान समय में विचारों की किंकर्तव्यविमूढ़ अस्तव्यस्तता में यही हमारा धर्म ही एकमात्र पथप्रदर्शक है। व्यक्ति समाज में निहित है और सामाजिकता को समरस बनाना ही हमारा धर्म है।

यह इसी धर्म की विशेषता है कि कण-कण में परम सत्ता को देखता है और पल-पल हमारा आदर्श निर्धारित करता है। इसी धर्म की विशेषता है कि सदारचरण और विवेक से तथाकथित निम्न कुलोत्पन्न भी उच्चतम पद तक पहुंच सकता है। इस विरासत का लक्ष्य है- प्रेम, श्रद्धा और विश्वास। इसकी भावना है, भ्रातृत्व की और मैत्री की, विद्वेष की नहीं। यह धर्म सांस्कृतिक और आध्यात्मिक बंधन में कहीं अधिक चिरस्थायी है।

यही भावना दक्षिण से लेकर उत्तर और पूरब से पश्चिम तक भारत को एक बनाता है। हमें विभक्त करनेवाले खुद खाक हो गए, पर सनातनता का गर्वोन्नत मस्तक आज भी खड़ा है।

दर्पण को बरसों धूल में रख छोड़ने पर उस पर गंदगी पड़ जाती है। आप अगर खुद गंदे हैं, तो आपका प्रतिबिंब भी वही दिखता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि दर्पण गंदा है।

हमारी विरासत वह है, जहां वेंकट हो या व्यालोक, भरत हो या भारत, सब एक है, सब नेक है। यही विरासत है, जिस पर मुझे गर्व है और जिस पर मैं किसी के भी सामने गर्वोन्नत वक्ष के साथ कह सकता हूं- हां, मैं सनातनी हूं और मुझे इस पर गर्व है।

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