हमें सौ में से सौ बार सफल रहना है, ‘उन्हें’ सौ में से सिर्फ एक बार

आतंकी घटनाओं के लिए अगर आतंकवादी सौ प्रयास करते हैं, तो उन्हें रोकने के लिए सुरक्षा एजेंसियों को सौ बार सफल होना होता है, जबकि आतंकवादी को सिर्फ एक बार।

वो सौ में से एक बार भी सफल हो जाए तो पाकिस्तान में पूजे जाएंगे, उनके नाम की मस्ज़िद मजारें मिल जाएगी, और फौत होने पर फ़ातिहा और हर सालगिरह पर नमाज़ पढ़ी जाएगी।

अगर सुरक्षा एजेंसियाँ एक बार भी असफल होती हैं, इस असफलता की परिणीति सैकड़ों हजारों की मौत में होती है। लापरवाही या चूक के लिए कइयों की नौकरी जाती हैं, और सबसे बड़ी बात – जनता में भय व्याप्त होता है, जो आतंकियों का ultimate objective था।

राजस्थान की हार कई मायनों में प्रत्याशित थी। ज़मीनी कार्यकर्ता भी मन ही मन हार मान चुके थे। डेढ़ साल पहले लगा, मैडम को हटा देंगे तो फिर भी जीत जाएंगे, नहीं तो अत्यंत मुश्किल है। वो तो आख़िरी पलों में संघ की लगाई गई कोशिश चाहे आधे मन से ही सही, मोदी की हुई रैलियों और मेवाड़ संभाग ने थोड़ी इज़्ज़त रख ली इसलिए मामला थोड़ा टक्कर का हो पाया। नहीं तो सट्टा बाजार ने नीचे में 40 और ऊपर में 60 का सर्किट दे रखा था।

आश्चर्य मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ का ज़रूर हुआ। 15 साल में दिग्विजय से मिले खण्ड खण्ड हुए राज्य को मामा शिवराज ने जबरदस्त बदल कर रख दिया। MP के शहर भारत के सबसे सुंदर शहरों में अग्रणी माने जाने लगे, यहाँ की सिंचित भूमि भारत में सबसे ज्यादा थी, अकेला प्रदेश जिसकी एग्रीकल्चर ग्रोथ रेट 10% से ज्यादा थी।

उस राज्य में किसान लोन माफी और नौजवान बेरोजगारी भत्ते के चक्कर में ठगे गए। ठगे गए कैसे जबकि अभी तक कांग्रेस ने शपथ तक नहीं ली। चुनावों में जिनसे ‘90% वोटों’ की अपेक्षा थी, उन्होंने 99% तक दिया।

याद रखिये, जब मामा को ये प्रदेश दिग्विजय से मिला था तब मध्यप्रदेश SIMI का सबसे बड़ा गढ़ था। असंख्य भटके हुए युवा यहां के छोटे शहरों के मदरसों से निकले हैं। मुख्यमंत्री बनने के 2 साल के अंदर ही पूरे का पूरा मॉड्यूल राज्य से ख़त्म कर दिया, जो बचे वो उत्तरप्रदेश या कर्नाटक की ओर भागे, जहां ‘सेक्युलर’ सरकारें थी। इससे पहले दिग्विजय थे जिन्होंने 26/11 मुम्बई का जिम्मा RSS पर थोपने वाली किताब का विमोचन किया था।

छत्तीसगढ़ में जहां हर शहर में नक्सलवाद था, वहां पिछले कुछ सालों में सुकमा जैसे शहर में रात 9 या 10 बजे तक दुकानें खुली रहना किसी भी उपलब्धि से कम नहीं। बाकी लाखों आदिवासियों को ‘यीशु महाप्रभु’ की शरण में जाने में राजमाता के लिए रमनसिंह नाम की सबसे बड़ी बाधा थी, वो अब दूर हो गई।

राजमाता भी सोच रही होगी कि बस धान के दाम दोगुणा और ऋण की माफी ही करनी थी। 15 साल ऐसे ही वनवास झेला, उस समय कर देते तो आज तक काबिज़ रहते। ख़ैर, कोई बात नहीं। देर आये, दुरुस्त आये। अब चार गुना मेहनत की जाए लोगों को यीशु के द्वार पहुँचाने में।

रही बात राजस्थान की, बॉर्डर स्टेट है। जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर। गर्मियों में 48° जाता है और सर्दियों में 0° भी टच करता है। पूरी मुस्तैदी के बाद भी घने कोहरे में अगर कोई वहां से बिना बुलाए आ भी जाये तो कोई आश्चर्य नहीं।

एक और बॉर्डर स्टेट पंजाब में तो वापस उठापटक हो ही गई जहां मंत्री किसके ‘बुलावे’ या ‘आदेश’ पर पाकिस्तान जाते रहते हैं, इसका निर्धारण नहीं कर पा रहे। बाकी आप ‘tunnel from Pakistan to India’ गूगलेंगे, तो आपको जम्मू में मिली सुरंगों का पता चलेगा, जो थोड़ी ज्यादा मेहनत से राजस्थान की रेत में भी बन सकती हैं।

आनंदपाल की मौत पर जय राजपूताना लिखकर अलग देश लेने वाले, और उपरलिखित ज़िलों में मजा चखाने के शौकीनों ने तो अभी से सर पकड़ने शुरू कर दिए हैं। जाट, राजपूत सब हार गए, और भारत माता की जय रुकवाकर सोनिया गांधी और अहमद पटेल ज़िंदाबाद बुलवाने वाले जीत गए हैं।

देश की सुरक्षा की दृष्टि से तीन अति महत्त्वपूर्ण राज्य गलत हाथों में चले गए हैं। पुलिस भी कितना संभाले। जो पुलिस अगर ‘सही राजनैतिक मार्गदर्शन’ और ‘free hand’ मिलने पर भोपाल जेल से ‘भागे’ SIMI के 8 आतंकियों को रातोंरात एनकाउंटर में मार सकती हैं, उसे आप अगर खाकी हटाकर सफेद पहना कर बिना हेलमेट वालों के चालान में लगवा दो तो भी उसे तो अपनी ड्यूटी बजानी ही हैं।

डरा तो नहीं रहा, पर strike rate का अंतर याद रखियेगा। किसी को सौ में से सौ बार सफल रहना है, किसी को सौ में से सिर्फ एक बार।

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