इतिहास के पन्नों से : ऑपरेशन ब्लू स्टार -9


नौकरी की पहली कॉल दिल्ली सरकार से आयी कस्टम पुलिस और तमाम जगह के नतीजे आने बाकी थे।

“पेट वाले को छोड़, गोदी के को संभाल” वाली कहावत पर अमल करते हुए नौकरी जॉइन कर ली। पहली पोस्टिंग मिली नई दिल्ली के जाम नगर हाउस में वहाँ एकनवयुवक राकेश रैना जो मेरे सम्पर्क में आया, अपना राशन कार्ड बनवाने के सिलसिले में जिसमें कुछ तकनीकी समस्या आ रही थी। वो मेरा हमउम्र कश्मीरी पंडित था और मय परिवार अब दिल्ली के पुष्प विहार में बने हुए CPWD के दो कमरे वालो फ्लैटों में किराये पर रहता था।

निहायत ही शरीफ लगता था शक्ल और बातों से, वो उसकी पत्नी, बड़ा भाई भाभी उनके दो छोटे बच्चे, एक छोटी बहन और बूढ़े मां बाप कुल जमा नौ लोग उस दो कमरे के CPWD के फ्लैट में रहते थे, पढ़े लिखे सारे ही थे तो बूढे मां बाप को छोड़कर जोकि घर में रहकर दोनो छोटे बच्चों को संभालते थे सभी प्राइवेट नौकरी करते थे और ये नवयुवक राकेश रैना इंजीनियरिंग किये हुए था और नेहरू प्लेस स्थित किसी छोटी मोटी फर्म में कार्यरत था।

एक दिन बातों बैटन में जब मेरी मदद से उसके पूरे परिवार का नाम दर्ज हो राशनकार्ड उसके हाथों में थमाया तो उसकी आँखों के कोर को गीला होते मैंने देख लिया था।

वह अहसानमंद हो धीरे से मुझ से पूछ रहा था साहेब आपकी सेवा पानी??
मैं उसका तातपर्य भली प्रकार समझ रहा था पर जान बूझ कर अनजान बनते हुए बोला चलो रैना साहेब एक कप चाय पिला दो, वो अजीब सी नजरो से मुझे देखता हुआ मेरे साथ हमारी विभागीय कैंटीन मैं दाखिल हो गया एक कोने वाली खाली टेबल पर बैठते हुए चाय की चुस्कियों के साथ उसने अपनी जो आप बीती सुनाई वो इस प्रकार थी..

19 जनवरी 1990 का दिन कश्मीरी पंडितों के वर्तमान इतिहास-खंड में काले अक्षरों में लिखा जायेगा। यह वह दिन है जब पाक समर्थित जिहादियों द्वारा कश्यप-भूमि की संतानों (कश्मीरी पंडितों) को अपनी धरती से बड़ी बेरहमी से बेदखल कर दिया गया था और धरती के स्वर्ग में रहने वाला यह शांतिप्रिय समुदाय दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबूर हुआ था। यह वही काली तारीख है जब लाखों कश्मीरी पंडितों को अपनी जन्मभूमि, कर्मभूमि, अपने घर आदि हमेशा के लिए छोड़ कर अपने ही देश में शरणार्थी बनना पड़ा था।

पंडितों के विस्थापन का यह सिलसिला कब से और कैसे प्रारंभ हुआ? इस पर तनिक एक नजर डालने की ज़रूरत है. खूब मिलजुलकर रहने वाली दोनों कौमों यानी हिन्दुओं(पंडितों) और मुसलमानों के बीच नफरत के बीज किसने और क्यों बोये? इसका उत्तर सीधा-सा है : विश्व में बढ़ते इस्लामीकरण की फैलती आग का मुस्लिम-बहुल कश्मीर पहुँच जाना और इस खूबसूरत वादी का इसकी चपेट में आ जाना. कौन नहीं जानता कि कश्मीर से पंडितों के पलायन के पीछे पृथकतावादी (जिहादी संगठन) हिजबुल मुजाहिदीन की कुत्सित और भड़काऊ नीति ज़िम्मेदार रही है।

कहा जाता है कि 4 जनवरी 1990 को इस संगठन ने एक प्रेस नोट जारी किया जिसे कश्मीर के उर्दू समाचारपत्रों ‘आफताब’ और ‘अल सफा’ ने प्रमुखता के साथ छापा. प्रेस नोट में हिंदुओं को कश्मीर छोड़ कर घाटी से चले जाने का आदेश दिया गया था.. कश्मीरी पंडितों की चुन-चुन कर खुले आम हत्याएँ की गयीं।

कश्मीर दूरदर्शन के निदेशक लसा कौल, राजनीतिक कार्यकर्त्ता टीकालाल टप्लू, नर्स सरला भट्ट, जज नीलकंठ गुर्टू, साहित्यकार सर्वानन्द प्रेमी, केन्द्रीय कर्मचारी बाल कृष्ण गंजू आदि दर्जनों बेकसूर कश्मीरी पंडितों को मौत के घाट उतारा गया। कश्मीर की प्रमुख मस्जिदों के लाउडस्पीकर जिनसे अब तक केवल अल्लाह-ओ-अकबर की आवाजें आती थीं, अब भारत की ही धरती पर हिंदुओं से चीख-चीख कर कहने लगे कि कश्मीर छोड़ कर चले जाओ और अपनी बहू-बेटियाँ हमारे लिए छोड़ जाओ।

कश्मीर में रहना है तो अल्लाह-अकबर कहना है, “असि गछि पाकिस्तान, बटव रोअस त बटनेव सान” (हमें पाकिस्तान चाहिए. पंडितों के बगैर किन्तु पंडित-महिलाओं समेत.) और तो और जगह-जगह दीवारों पर पोस्टर चिपकाये गये कि सभी लोग कश्मीर में इस्लामी वेश-भूषा पहनें, कश्मीरी पंडित-महिलाएं बिंदी का प्रयोग न करें, सिनेमाघरों पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया, कश्मीरी हिंदुओं की दुकानें, मकान और व्यापारिक प्रतिष्ठान चिन्हित कर दिए गए ताकि इन्हें बाद में लूटा जा सके या इनपर कब्जा किया जा सके आदि-आदि।

यहाँ तक कि घड़ियों का समय भी भारतीय समय से बदल कर पाकिस्तानी समय के अनुरूप करने का फतवा जारी किया गया. 24 घंटे में कश्मीर छोड़ दो या फिर मरने के लिए तैयार हो जाओ, काफिरों को क़त्ल करो आदि नारे और सन्देश कश्मीर की फिजाओं में गूँजने लगे. इस्लामिक दमन का घिनौना रूप जिसे भारत सदियों तक झेलने के बाद भी मिल-जुल कर रहने के लिए भुला चुका था, एक बार फिर अपना विकराल रूप धारण करने लगा था. प्रशासन ठप्प पड़ा था या मूक दर्शक बनकर अपनी लाचारी का मातम मना रहा था. हुकुमरान सुरक्षा कवच में थे या फिर घाटी छोड़ कर भाग खड़े हुए थे. चारों तरफ अराजकता और बद-अमनी का माहौल व्याप्त था.

आज कश्मीर घाटी में कश्मीरी पंडित बिलकुल भी नहीं. अगर हैं भी तो वे किसी मजबूरी के मारे वहां पर रह रहे हैं और उनकी संख्या नगण्य है. वादी से खदेड़े जाने के बाद ये लोग शरणार्थी शिविरों (जम्मू और दिल्ली में) या फिर देश के दूसरे स्थानों पर रह रहे हैं. माना जाता है कि 3 लाख के करीब कश्मीरी पंडित जिहादियों के जोर-जब्र की वजह से घाटी से भागने पर विवश हुए. कभी साधन सम्पन्न रहे ये हिंदू/पंडित आज सामान्य आवश्यकताओं के मोहताज हैं. उन्हें उस दिन का इंतज़ार है जब वे ससम्मान अपनी धरती पर वापस जा सकेंगे.

वो बोले जा रहा था मैं हतप्रभ सुनता जा रहा था “तीन लाख” कश्मीरी हिन्दू / पंडित घाटी से भगा दिए गए उनके ही देश में उनको शरणार्थियों का जीवन जीने को विवश कर दिया गया ! हजारो कत्ल कर दिए गए , बलात्कर भी हुए ! और सोच रहा था …
पर इनके लिए कोई 19 जनवरी को ” ब्लैक डे ” नहीं मनाया जाता… क्यों?
रईस मियां से अभी भी यदा कदा बातचीत होती रहती थी..

क्रमशः

इक़बाल सिंह पटवारी

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