देशकाल की समीक्षा

मोदी शब्द पर लिखने से पहले संघ पर कुछ लिखना चाहूंगा। दो कारण हैं लिखने के, और मेरा लेखन पूर्ण तो नहीं हो सकता क्योंकि केवल वैचारिक दृष्टि से लिख रहा हूँ। फिर भी विचार है।

संघ का उद्देश्य क्या है?

हिन्दुओ को एक करना।

संघ, राष्ट्र के वैभवमय इतिहास और पूर्वपुरुषों की सर्वश्रेष्ठ बातों को लेकर चलता है।

संघ क्या मानता है?

हिन्दू हिन्दू में भेद नहीं मानता। जातिप्रथा आदि नहीं मानता।

नब्बे साल हो गए संघ को बने। क्या जातिप्रथा गयी?

संघ के ये कौन से हिन्दू हैं जो भेदभाव को नहीं मानते, संघ में जो नहीं हैं, वो कौन से हिन्दू हैं जो भेदभाव की गठरी को छोड़ना नहीं चाहते?

नब्बे साल से संघ लड़ किसलिये रहा है? आप विचार करते रहिए, इस पर लिखने की आवश्यकता नहीं है। पर ये निश्चित है कि संघ के हिन्दू ही अन्य हिन्दुओं को मेरी दृष्टि से, सुधारने की लगातार कोशिश में हैं। मानव/ हिन्दू बन जाओ, इतना काफी है।

अब इसे लिखने की आवश्यकता क्या थी? मोदी पर लिखने से पहले संघ की इस नब्बे साल के अस्तित्व और भेदभाव रहित समाज की परिकल्पना के उद्देश्य की सफलता के परसेंट को देखना था। हवा में बात करके कोई वैभव वगैरह पैदा नहीं हो जाता। सतत काम करना पड़ता है।

मोदी को राजनैतिक रूप से सर्वोच्च पद पर देखना सुखद है, चार साल से। संघ से निकले हैं, निष्ठा और विचार पर लेशमात्र भी संदेह नहीं। वो अपना कार्य देश के लिए फिट कर चुके हैं। सत्ता किसी के भी हाथ आये, पर ऐसे चरित्र का नेता मिलना फिलहाल असम्भव है।

पूत के पाँव पालने में नज़र आते हैं। ऐसे ही एक दिन खड़े होकर कोई मोदी के कद का नहीं हो सकता। ये भी कैरियर है। फिलहाल कोई चेहरा नहीं, वही घिसे पिटे थके चेहरे आपको याद आ पाएंगे राजनीति के, आपके खुद के मस्तिष्क में ही कोई दूसरा ऑप्शन नहीं आ पायेगा।

मोदी के नेतृत्व से चार साल में आपने तीन राज्य निकलवा दिए। वो तो छोड़िए। नब्बे साल से संघ जिस भेदभाव रहित वैभवसम्पन्न देश के निर्माण में लगा है, उसको आपने क्या दिया?

अभी तीन राज्य निकल गए तो अनंत कारण बतलाये जा रहे हैं। खानदानी किसान जो होता है न, वो साल में एक बार बारिश न आये, तो घबराता नहीं है, फिर से लग जाता है। नए नवेले बने किसान के एक साल में ही हाथ पांव फूल जाते हैं कि बारिश नहीं हुई। ये वही विचार श्रृंखला है जो कमज़ोर है, जो फेसबुकिया है, और जो खुद कभी मोदी नहीं बन सकती।

ये बात मोदी का पक्ष लेकर नहीं कह रहा हूँ। वो तो भट्टी में तपा स्वर्ण है। महंगा ही है, अनिश्चित विचार और कमज़ोर असंगठित मन स्वभाव वाले जीव के खरीदने लायक बात नहीं है। उसकी पहुंच से दूर ही है।

और इन्हीं लोगों ने हमेशा की तरह मोदी से भी चाहा, संघ से भी चाहा। हल्ला भी खूब मचाया, पर कुछ दिया नहीं। उनका तो जितना रिएलिटी में है, वो स्थिर asset है। वो उनका काम है। आप कितना दे पा रहे हैं, बात उस पर है। या दे भी पाएंगे?

मोदी को हरवा कर या जितवा कर किस पर एहसान कर रहे हैं? न उसकी हार में उसका नुकसान है न उसकी जीत में उसका लाभ है। ये तो दर्पण है बड़ा सा रखा आपके अपने सामने, कौन जीता कौन हारा, ये तो जिसे सत्ता में आप जनता जनार्दन रखेंगे, वही आपके समुच्चय की विवेक शक्ति होगी और भारत जैसे बड़े देश के भविष्य की राह तय करेगा।

नुकसान लाभ तो आपका है, उनका नहीं।

लिखने को लंबा लिख सकता था, पर यहीं समापन करता हूँ। जिसका दिमाग केवल फेसबुक और राजनीति में घनघोर लगा हो, उसका कोई चरित्र नहीं होता, ये लक्षण नोटबुक में note करके रख लीजिएगा। खानदानी किसान का उत्साह आप क्या नष्ट कर पाओगे।

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