कहानी दो नेताओं की – 1

यद्यपि फ्रांस के राष्ट्रपति एमानुएल माक्रों डॉक्टर माता-पिता के पुत्र थे, लेकिन वे फ्रांस – या यूं कहिए यूरोप – के सबसे अभिजात्य (एलीट) ‘स्कूल’ या विश्वविद्यालय के ग्रेजुएट थे।

वित्त मंत्रालय में नौकरी करते समय वे अति धनाढ्य लोगो के बैंक – रोथ्सचाइल्ड बैंक – में एक निवेश बैंकर के रूप में कार्य करने लगे जहाँ उन्होंने तीन वर्ष में करीब तीस करोड़ रुपए बोनस और नियमानुसार कमीशन में कमा लिए।

माक्रों के पूर्ववर्ती पदाधिकारी फ्रांस्वा ओलांद एक ‘सामान्य’ राष्ट्रपति और निकोला सार्कोज़ी ‘ब्लिंग-ब्लिंग’ (भड़कीले) राष्ट्रपति के रूप में जाने जाते थे। माक्रों ने फ्रांस के राष्ट्रपति पद की गरिमा को पुनर्स्थापित करने का निर्णय लिया।

उन्होंने कहा कि वे ‘जुपिटेरियन’ प्रेसीडेंसी – जिसमें राष्ट्रपति एक रोमन भगवान के रूप में सम्मानित होगा जो कोई गलत नहीं कर सकता – स्थापित करेंगे जिसमें वे कम बोलेंगे तथा उन तक लोगों की पहुँच सीमित होगी।

इस दिशा में उन्होंने पेरिस के पास स्थित 18वीं सदी के फ्रांस के स्वघोषित ‘सूर्य सम्राट’ लुइस XIV (चौदह) के भव्य वर्साय महल में संसद का सत्र बुलाकर भाषण दिया। इसी वर्साय महल में वे रूस के राष्ट्रपति पुतिन से मिले। एक तरह से उन्होंने अपनी इमेज जनमानस एक ‘सम्राट’ के रूप में स्थापित कर दी थी।

शुरुवाती दिनों में पूरे विश्व में मिली प्रसिद्धि और स्तुति के कारण दो बार वे आम नागरिको से भिड़ गए। पहली बार, एक किशोर ने उनके लिए फ्रेंच भाषा में ‘तुम’ प्रयोग करते हुए उनका अभिवादन किया: “मनु, कैसे हो तुम”? यह सुनकर माक्रों भड़क गए और उस किशोर को टीवी कैमरा के सामने डांट पिलायी कि फ्रांस के राष्ट्रपति से ऐसे बात नहीं करते।

दूसरी बार, एक माली ने उनसे बेरोज़गारी की शिकायत की। जवाब में माक्रों ने उसे भी हड़का दिया और टीवी कैमरा के सामने कहा कि अगर वह उसी समय सड़क पार करके सामने की दुकानों में जाए तो उसे जॉब मिल जाएगा। यानी कि उसकी शिकायत जायज़ नहीं थी।

जब एमानुएल माक्रों ने 39 वर्ष की आयु में सत्ता संभाली, फ्रांस की आर्थिक स्थिति पिछले 15 वर्षो से स्वस्थ नहीं चल रही थी। विकास की दर अब भी 1.8 प्रतिशत के नीचे है। एक समय फ्रेंच इकॉनमी 2.9 प्रतिशत सिकुड़ गयी थी। घरेलू उत्पादन का 56% सरकारी खर्च खा जाता है, जबकि सरकारी कर्मचारियों का वेतन ही जीडीपी का 13% निगल जाता है।

पश्चिमी यूरोप के अन्य देशों की तुलना में फ्रांस में संपत्ति कर और कॉर्पोरेट टैक्स की दर काफी अधिक है जिससे उद्यमी राष्ट्र छोड़कर अन्य यूरोपीय देशों में पलायन कर जा रहे थे। पेंशन, सरकारी सुविधाएं, कम उम्र में रिटायरमेंट, वित्तीय घाटा राष्ट्र के विकास के लिए बजट में पैसा ही नहीं छोड़ रही थी।

इसके अलावा अगर कोई प्राइवेट कंपनी किसी युवा को जॉब देती है, तो फ्रांस के नियमानुसार उस कर्मचारी को जॉब से नहीं निकाला जा सकता, भले ही कंपनी को घाटा हो रहा हो, या कंपनी के उत्पाद की लागत अन्य प्रतियोगियों से महँगी हो।

सत्ता संभालने के बाद माक्रों ने सभी फ्रेंच नागरिकों को कठिन निर्णयों के लिए आगाह किया। उन्होंने युवाओं को बताया कि कठोर श्रम कानून के कारण युवाओं को जॉब नहीं मिल रहा था क्योकि कंपनियों को डर लगता है कि वे किसी भी कर्मचारी को नहीं निकाल पाएंगे भले ही कंपनी दिवालिया हो जाए। अतः उन्होंने नौकरी पर रखने और निकालने के नियम में ढील दे दी।

इसके अलावा उन्होंने कॉर्पोरेट टैक्स की दर को कम कर दिया और संपत्ति कर भी लगभग समाप्त कर दिया। रेल कर्मचारियों की रिटायरमेंट उम्र और आर्थिक लाभ में कटौती कर दी (रेल कर्मियों की सेवा शर्ते अन्य सरकारी कर्मचारियों की तुलना में बहुत उदार थी) और उन कर्मियों के द्वारा तीन महीने हड़ताल पर जाने के बावजूद भी माक्रों नहीं झुके।

यहाँ तक तो फ्रेंच लोग बड़बड़ाते हुए जैसे-तैसे सहन कर ले रहे थे।

लेकिन माक्रों की एक और महत्वाकांक्षा थी। जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल की आभा में, माइग्रेशन के कारण कमी आने से वह अपने आप को यूरोपियन यूनियन तथा लिबरल वर्ल्ड के नेता के रूप में देखने लगे थे। इसके लिए इन्हें यह दिखाना था कि फ्रांस अपने बजट घाटे को कंट्रोल में कर सकता है, सरकारी खर्चों में कमी ला सकता है तथा विकास दर बढ़ा सकता है। क्योंकि तभी यूरोप का सबसे समृद्ध देश जर्मनी फ्रांस को सीरियसली लेगा।

माक्रों ने राष्ट्रपति ट्रंप की आलोचना तथा क्लाइमेट चेंज के पेरिस समझौते को एक सीढ़ी के रूप में प्रयोग किया। उन्होंने फ्रांस में पेट्रोल और डीज़ल के दाम बढ़ाकर ऐसे ईंधन के प्रयोग को कम करने का प्रयास किया।

साथ ही उन्होंने फ्रांस की पेंशन व्यवस्था में सुधार कर दिया जिससे कई सेवानिवृत्त व्यक्तियों की पेंशन में कमी आ गई।

पेट्रोल और डीज़ल के दाम में मामूली सी वृद्धि तथा पेंशन में कमी होने से अधिकतर फ्रेंच लोग माक्रों को धनाढ्य लोगों के हितैषी तथा गरीबों के दुश्मन के रूप में देखने लगे।

और फ्रांस के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले निवासी सरकार के विरुद्ध सड़क पर उतर आए।

क्रमशः…

आखिर हमारे ‘युवा’ नेताओं की भारत के बारे में क्या महत्वाकांक्षा है?

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY