अधिक देर तक ज़िंदा नहीं रहती, किसी और के भरोसे रहने वाली सभ्यता

महाभारत अद्भुत है, अब तक की मानव सभ्यता का महानतम ग्रंथ, विश्व का सर्वश्रेष्ठ साहित्य।

मगर क्यों?

क्योंकि इसमें जो भी चरित्र हैं वो सभी, समाज के हर काल में मिल जाएंगे और जो समाज में हैं वो सभी इसमें मिल जाएंगे।

और जो समाज में हैं वही सब राजनीति, कला, धर्म, अर्थतंत्र, शासनतंत्र और सोशल मीडिया में भी होंगे। इन चरित्रों को मैं पहचानने का प्रयास करता हूँ। ऐसा करना बेहद रोचक है। ऐसा करते करते मैं सोशल मीडिया के राष्ट्रवादियों-हिन्दुओं को पांच वर्गों में बांट सकता हूँ।

1. ये राष्ट्रवाद-हिंदुत्व का नकाब पहनकर मोदी-भाजपा आदि का बड़े शातिराना ढंग से विरोध करते हैं। ये बुद्धिमान, मगर चालक और धूर्त हैं। ये दिमाग से खेलते हैं और दूसरे क्षेत्रों की तरह यहां भी सफल हैं। लेकिन ये राष्ट्र-समाज के लिए बेहद हानिकारक हैं।

2. इस वर्ग के लोग दिल से हिंदूवादी हैं! इनका दोष मात्र इतना है कि इनकी बहुत सी अपेक्षायें हैं मगर दिमाग से काम ना ले पाने के कारण ये दिन-रात मोदी-भाजपा विरोध में जुटे रहते हैं। इन वर्ग के लोगों को प्रथम वर्ग के लोगों से अलग करके पहचानना असंभव नहीं मगर आसान भी नहीं। इनके कारण जाने अनजाने में समाज का नुकसान हो रहा है।

3. ये कट्टर होते हैं और ऊपर के दोनों से भिड़ते रहते हैं। इनमें से कम ही हैं जो ऊपर के दोनों में भेद कर पाएं। ये बेहद भावुक हैं मगर इनके कारण हलचल मची रहती है जो फिर दोधारी तलवार के समान है फायदे के साथ साथ नुकसान भी करती है।

4. यह वर्ग सभी के साथ खड़ा हो जाता है। ऊपर के तीनों को पढ़ता है और लाइक कमेंट भी करता है। इसका झुकाव बदलता रहता है। यह फ्लोटिंग है और सक्रिय राष्ट्रवादी-हिन्दुओं में सबसे बड़ी संख्या इन्ही की है। मगर यह किसी काम का नहीं, मात्र भीड़ के समान है।

5. ये वर्ग निष्क्रिय है, अपने में मस्त है, अपनी और परिवार की फोटो डालकर बर्थडे, सालगिरह मना कर कविता सुन-सुना कर खुश है। उसे दुनिया से कोई मतलब नहीं, जब तक उसका टमाटर, पेट्रोल दस पैसे महंगा नहीं हो जाता। यह आम हिन्दू है। और बहुसंख्यक है।

यहां किसी का नाम लेना महत्वपूर्ण नहीं। उपरोक्त वर्गीकरण आप समाज के हर क्षेत्र का कर सकते हैं। राजनीति में जनेऊधारी और धर्म में अनेक हिन्दू नाम के आचार्यों का उदाहरण यहाँ काफी होगा।

मगर उपरोक्त प्रथम और द्वितीय वर्ग से यह सवाल तो पूछा जाना ही चाहिए कि हम सवाल सिर्फ मोदी/ भाजपा से ही क्यों करते हैं। क्या इतने सवाल हमने धर्मगुरुओं, व्यापारी, कलाकार, पत्रकारों से पूछे हैं?

याद कीजिये 2014 के बाद का कालखंड, जब हम सब मिल कर इन सब हिन्दू विरोधी हिन्दुओं से भिड़ रहे थे। तब सब कुछ हिल गया था। सारे देशविरोधी परेशान थे। और फिर धीरे धीरे ऊपर के प्रथम वर्ग के लोगों ने अपना दांव खेलना शुरू किया जिसमें फिर धीरे धीरे दूसरे वर्ग के लोग जुड़े, फिर प्रतिक्रिया में तीसरे वर्ग के लोग आ गए और फिर हम बंटते चले गए। आज हम कहाँ आ खड़े हुए हैं देख लीजिये।

एक राष्ट्रवादी लेखक हैं (यहां फेसबुकिया लेखक की बात नहीं कर रहा), वैसे तो हम बहुत कम संख्या में हैं, इतने कम कि उँगलियों पर गिने जा सकते हैं, बताने लगे कि उन्होंने अनेक हिन्दू धर्मगुरु और व्यापारियों को अपनी पुस्तकों के आर्थिक समर्थन के लिए कहा, मगर उनमें से एक ने भी अरबपति होते हुए भी 200 रूपये की एक किताब नहीं खरीदी। एक लेखक भी इंसान है उसका भी परिवार है, वो बिना कमाई के कैसे गुजारा कर सकता है?

मेरा अपना अनुभव भी बेहद खराब है, यूं तो ईश्वर की कृपा से पैसो की ज़रूरत नहीं मगर राष्ट्रवादी-हिंदुत्व के लेखन के प्रचार प्रसार में अब तक एक हिन्दू वो भी छोटा व्यापारी मिला, अन्यथा कटु अनुभव ही हुए।

लेखन से बौद्धिकता और विचारधारा से ही इको सिस्टम बनता है। मगर बिना आर्थिक सहायता के राष्ट्रवादी लेखन पत्रकार कैसे पैदा होंगे? अरबों में खेल रहे किसी बाबा से हम नहीं पूछते, किसी व्यापारी से हम सवाल नहीं पूछते। हम स्वयं कितना योगदान किसी भी रूप में करते हैं?

क्या आप को पता है दूत और पूत को कहाँ से आर्थिक सहायता पहुँचती है? क्या आप जानते हैं कि जिस दूत पूत की हम बात करते हैं वे पूर्व में सब हिन्दू ही थे। तो फिर ऐसा क्या हुआ कि वे धर्मपरिवर्तित होते ही आज हमारे लिए देश के लिए चुनौती बन गए?

क्योंकि वो सिर्फ राजनीतिक ही नहीं, धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक, व्यवसायिक, विचारधारा अर्थात हर तरह संगठित हैं। और एक हम हैं कि एक मोदी और भाजपा को पकड़कर बैठ गए हैं। जबकि राजनीति समाज का महत्वपूर्ण पक्ष होते हुए भी अकेला नहीं है, अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्र भी हैं।

महाभारत में वेदव्यास कहते हैं कि हे राजन मैं महाविनाश को देख रहा हूँ। ऐसा नहीं कि सिर्फ वेदव्यास को ही भविष्य देखने का सामर्थ्य था। हममें से कोई भी देख सकता है। जो मैं देख पा रहा हूँ वो भयावह है। मुझे यह भी पता है कि मेरा हिन्दू धृतराष्ट्र बना हुआ है और हिन्दुओं का अहंकार मूर्ख दुर्योधन की तरह है जो सर्वनाश करके ही मानेगा। वो वीर भी है तो अर्जुन की तरह जो बीच युद्ध में विचलित और कन्फ्यूज़ है। ऐसे में अब कहाँ से लाऊँ श्रीकृष्ण को।

एक बार एक कश्मीरी पंडित से बात हो रही थी। वो लगे सब पर दोषारोपण करने। सुनते सुनते जब थक गया तो सिर्फ इतना कहा था कि जब तुम लोगों ने घाटी से पलायन किया था तब तुम लोग दो-ढाई लाख थे, अगर एक साथ सड़क पर उतर जाते तो चाहे जो होता मगर पृथ्वी के स्वर्ग से पलायन नहीं करना पड़ता। और जो कीमत चुकानी पड़ती, वो आज दी गई कीमत से कम ही होती। सुनकर बुरा मान गए थे।

हिन्दुओं का भी यही होना है, जो सभ्यता किसी और के भरोसे रहती है वो अधिक देर तक ज़िंदा नहीं रह सकती, जीवित रहने के लिए खुद साँस लेनी पड़ती है।

महाप्रश्न का उत्तर हैं श्रीकृष्ण के कर्म और श्रीराम के आदर्श

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