इसलिए खिन्न और क्षुब्ध कर रही है शिवराज सिंह चौहान की हार

शिवराज सिंह चौहान की हार से इसलिए मन खिन्न है और बुरी तरह क्षुब्ध है क्योंकि मप्र की जनता उसी तरह हारी है जिस तरह 1927 और 1931 में पूरे हिंदुस्तान की जनता 4 गद्दारों से हार गयी थी।

पूरा लेख बहुत ध्यान से पढ़िए।

पढ़ने से पहले इतना और समझ लीजिए कि अगस्त 1947 से दिसम्बर 2003 तक की 56 वर्ष की समयावधि में 51 साल तक मप्र में कांग्रेस का एकछत्र राज्य था। शेष 5 वर्षों में ढाई-ढाई वर्षों की अल्पावधि की गैर कांग्रेसी सरकारें रहीं। अतः यह लेख शिवराज/भाजपा के 15 वर्ष बनाम कांग्रेस के 51 वर्ष की कहानी भी है।

दिसम्बर 2003 में मध्यप्रदेश की जनसंख्या लगभग 6.25 करोड़ थी। पिछले 15 वर्षों के दौरान इसमें लगभग 30% की वृद्धि हुई और वो आज बढ़कर लगभग 8.10 करोड़ हो चुकी है।

2003 तक मप्र में 7.5 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई होती थी। नहरों के माध्यम से कृषि भूमि की सिंचाई की इस सुविधा में पिछले 15 वर्षों में लगभग 433% की वृद्धि हुई और आज यह सुविधा लगभग 40 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को उपलब्ध हो चुकी है।

2003 तक मध्यप्रदेश में कुल कृषि क्षेत्र 1.99 करोड़ हेक्टेयर था जिसमें पिछले 15 वर्षों में 44 लाख हेक्टेयर की वृद्धि हुई और आज यह बढ़कर 2.43 करोड़ हेक्टेयर हो चुका है।

2003 तक के 56 वर्षों में मध्यप्रदेश में जो खाद्यान्न उत्पादन 1.59 करोड़ मीट्रिक टन के आंकड़े तक पहुंच पाया था उसमें पिछले 15 वर्षों में लगभग 2.62 करोड़ मीट्रिक टन की वृद्धि हुई। आज मध्यप्रदेश 4.21 करोड़ मीट्रिक टन खाद्यान्न का उत्पादन करता है।

2003 तक 18.7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 2018 में मध्यप्रदेश में गेंहू की उत्पादकता 36.5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो चुकी है।

इसी प्रकार धान की उत्पादकता में लगभग साढ़े तीन गुना की वृद्धि हुई है। 2003 तक मात्र 10.7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 2018 में मध्यप्रदेश में धान की उत्पादकता 36.11 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो चुकी है।

मध्यप्रदेश में कुल कृषि उत्पादन जो 2003 तक 2.14 करोड़ मीट्रिक टन था वह आज बढ़कर 5.44 करोड़ मीट्रिक टन हो चुका है।

50 वर्षीय कांग्रेसी शासनकाल के दौरान मध्यप्रदेश की जो कृषि विकास दर मात्र 3% के इर्दगिर्द रहा करती थी उस कृषि विकास दर में अब 500% से की वृद्धि हो चुकी है और आज वह बढ़कर 18.89% हो चुकी है।

50 वर्षों के कांग्रेसी शासनकाल के पश्चात दिसम्बर 2003 तक मध्यप्रदेश की सत्ता से कांग्रेस की विदाई के समय राज्य में 2900 मेगावॉट बिजली का उत्पादन हो रहा था। लेकिन 2003 के पश्चात 15 वर्ष के भाजपा शासनकाल के दौरान राज्य में बिजली उत्पादन में लगभग 533% वृद्धि हुई और मध्यप्रदेश में आज लगभग 18,364 मेगावॉट बिजली उत्पादन हो रहा है।

51 वर्षों के कांग्रेसी शासनकाल के पश्चात दिसम्बर 2003 तक मध्यप्रदेश की सत्ता से कांग्रेस की विदाई के समय तक राज्य में कुल 44,787 किमी लम्बी सड़कों का निर्माण हुआ था। लेकिन 2003 के पश्चात 15 वर्ष के भाजपा शासनकाल के दौरान राज्य में सड़कों की लम्बाई में लगभग 235% की वृद्धि हुई। इन 15 वर्षों के दौरान लगभग 1,05,213 किमी सड़क का निर्माण हुआ और राज्य में आज सड़कों की लम्बाई लगभग 150,000 किमी हो चुकी है।

2003 तक मध्यप्रदेश में केवल 32 किमी लम्बाई का फोर लेन हाइवे बना था। जबकि पिछले 15 वर्षों के दौरान इसमें लगभग 63 गुना वृद्धि हुई और मध्यप्रदेश में 2008 किमी लम्बाई के फोर लेन हाईवे बन चुके हैं तथा 1200 किमी लम्बाई के फोर लेन हाइवे निर्माणाधीन हैं जो अगले 2 वर्षों में बनकर तैयार हो जाएंगे। यानि 2020 तक मध्यप्रदेश में फोर लेन हाइवे की लम्बाई 3200 किमी हो जाएगी। यह उपलब्धि 50 वर्ष के कांग्रेसी शासनकाल में बने फोर लेन हाईवे से सौ गुना अधिक है।

2003 तक राज्य में प्राथमिक पाठशालाओं की संख्या 55,980 थी जिनकी संख्या में पिछले 15 वर्षों में लगभग 50% की वृद्धि हुई और राज्य में आज 83,890 प्राथमिक पाठशालाएं कार्यरत हैं। 2003 तक राज्य में माध्यमिक स्कूलों की संख्या 12,490 थी जिनकी संख्या में पिछले 15 वर्षों में लगभग 143% की वृद्धि हुई और राज्य में आज 30,341 माध्यमिक स्कूल कार्यरत हैं। इसी प्रकार पिछले 15 वर्षों के दौरान राज्य में हाई स्कूलों की संख्या में लगभग 178% तथा हायर सेकेंडरी स्कूलों की संख्या में लगभग 135% की वृद्धि हुई है।

यह मप्र में हुई विकास यात्रा के कुछ वो उदाहरण हैं जिनकी दस्तावेज़ी पुष्टि लगातार 9 वर्षों तक कांग्रेसी यूपीए की सरकार भी करती रही। ऐसी ऐतिहासिक उपलब्धियों की सूची बहुत लम्बी है। इसलिए शिवराज सिंह चौहान की हार से मेरा मन खिन्न है और बुरी तरह क्षुब्ध है।

लेकिन अब जरा याद करिये सोशल मीडिया में हिन्दूवादी भेड़ की खाल में छुपे उन चंदाखोर भेड़ियों को जो पिछले काफी लम्बे समय से शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ अपने नीच गलीज़ क्षुद्र तुच्छ धनलोलुप स्वार्थों का ज़हर हिन्दूवाद का ठेकेदार बनकर उगल रहे थे।

आज ये चंदाखोर हिन्दूवादी भेड़िये जब जमकर कोसे गरियाये जा रहे हैं तो दुहाई दे रहे हैं कि मप्र की जनता को मत कोसो।

अतः इन चंदाखोर हिन्दूवादी भेड़ियों को बताना चाहता हूं कि मप्र की उस जनता का कोटि कोटि अभिनंदन जिसने कांग्रेस से ज्यादा वोट भाजपा को दिए हैं। लेकिन वो जनता उसी तरह हारी है जिसतरह 1927 और 1931 में पूरे हिन्दुस्तान की जनता 4 गद्दारों से हार गयी थी।

1927 में बिस्मिल, अशफ़ाक़, रोशन सिंह और लाहिड़ी के साथ पूरा देश खड़ा था लेकिन बनारसी और बनवारी नाम के उन 2 गद्दारों की गवाही की वजह से वो मौत के घाट उतर गए थे जिन दोनों गद्दारों का दावा था कि वो भी देशभक्त और क्रांतिकारी हैं। जबकि सच यह है कि गवाही के लिए दोनों को सज़ा माफ़ी के साथ अंग्रेजों ने 5-5 हज़ार रुपये दिए थे। वह रकम आज के 5 करोड़ से ज्यादा थी।

इसी तरह 1931 में जब पूरे देश की भावनाएं चंद्रशेखर आज़ाद के लिए उमड़ रहीं थीं तब वीरभद्र और यशपाल नाम के 2 गद्दारों की मुखबिरी पूरे देश पर भारी पड़ी थी। उनकी मुखबिरी की सहायता से अंग्रेजों ने चंद्रशेखर आज़ाद को मौत के घाट उतार दिया। इन दोनों गद्दारों का भी दावा था कि वो भी देशभक्त और क्रांतिकारी हैं।

अतः बनारसी/ बनवारी/ वीरभद्र/ यशपाल की परम्परा के चंदाखोर हिन्दूवादी भेड़िये अब मप्र की जनता की ओट में छुपने की कोशिश ना करें।

तब कहां दुम दबाए बैठे थे हिंदुत्व के ‘ये’ ठेकेदार!

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