अच्छी और बुरी सरकार का अंतर नहीं समझते 99% लोग

अंग्रेज़ी का एक शब्द है Gourmet… यूँ शब्द है तो मूलतः French भाषा का, पर अंग्रेज़ी में खूब प्रयोग होता है… Gourmet… इसमे R और T silent होता है इसलिए इसे पढ़ते हैं गौमे…

Gourmet का अर्थ होता है Culinary Arts यानी पाक कला मने खान पान… इस कला का महारथी या पारखी… बनाना बेशक न जानता हो, पर कम से कम खाना तो जानता हो…

अपनी 54 साल की ज़िंदगी में मैंने ये महसूस किया कि इस धरती पे मौजूद 99% लोग खाना – भोजन जैसी बेसिक चीज़ भी नहीं जानते। मने 99% लोग खाना खाना भी नहीं जानते।

जी हाँ, इस धरती पे मौजूद ज़्यादातर लोग अच्छे और बुरे भोजन में differentiate नहीं कर सकते। दुनिया के 99% रसोइये – जिनमें मर्द औरत सब शामिल हैं, बहुत बुरा खाना इसलिए पकाते हैं क्योंकि उस खाने को खाने वाले ये जानते ही नहीं कि जो खाना वो खा रहे हैं उसे और बेहतर, बहुत बेहतर, बहुत स्वादिष्ट पकाया जा सकता है…

एक और बात ये कि बहुत अच्छे खाने और बहुत बुरे खाने में लगने वाली मेहनत और लागत में बहुत मामूली अंतर होता है…

आपको ये जान कर आश्चर्य होगा कि अच्छा भोजन खाना और उसे relish (आस्वादन) करना भी एक कला है और इसे बाकायदे सीखना पड़ता है… इसमें भी समय लगता है… कई साल का समय लग जाता है…

99% लोग अपनी सारी ज़िंदगी में, मने 50 – 60 – 70 साल तक एक ही किस्म का भोजन खा के अंततः मर जाते हैं… मैं अपने इर्द गिर्द ऐसे सैकड़ों लोगों को जानता हूँ जिन्होंने अपनी ज़िंदगी में अरहर की पानी जैसी पतली दाल और आलू, परवल, भिंडी जैसी कोई भुजिया खा के ज़िंदगी बिता दी… मने सारी जिंदगी में इसके अलावा कुछ खाया ही नहीं…

भोजन में एक शब्द है Cuisine… इसका अर्थ है किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र या culture विशेष का भोजन… जैसे हमारे देश में अकेले कश्मीर में ही 5 किस्म की पाक कला है और सबका अलग distinct taste है। अकेले लेह लद्दाख में ही अलग अलग रीजन का अलग भोजन है। उसी तरह काश्मीरी वजावां अलग है और डोगरी भोजन अलग है।

हिमाचल में मंडी जिले की अपनी अलग पाक कला है जिसे मंडियाली कहते हैं। इनकी भोजन पकाने और खाने की कला बिल्कुल भिन्न है। मंडी जिले का कोई व्यक्ति किसी प्रयोजन में टेबल कुर्सी पे बैठ के भोजन नहीं करेगा, थाली में नहीं खायेगा, चम्मच से नहीं खायेगा… जमीन पे बैठ के, पत्तल में खायेगा, हाथ से ही खायेगा… ये मंडियाली संस्कृति की विशिष्टता है…

वही किन्नौर और लाहौल स्पीति का भोजन बदल जाता है… उसके Ingredients बदल जाते हैं। पकाने की technique बदल जाती है लिहाजा स्वाद बदल जाता है…

क्या आप जानते हैं कि भारत में एक अकेला आलू पकाने खाने की ही हज़ारों recipes हैं… हर रीजन हर cuisine की अलग recipes हैं और सबका taste अलग है, unique है…

इसके अलावा प्रत्येक नये cuisine का भोजन खाना और उसे relish करना सीखना पड़ता है… कोई भी cuisine आप जब पहली बार खाएंगे तो आपको बिल्कुल नहीं भायेगा। हो सकता है कि आप एक कौर भी न खा पाएं…

हमारे मुंह में लाखों करोड़ों Taste Buds यानि स्वाद ग्रंथियां होती हैं …….. वो ग्रंथियां लंबे समय तक एक ही किस्म और एक ही स्वाद का भोजन खा खा के conditioned हो जाती हैं। जैसे ही उन्हें कोई नया स्वाद मिलता है वो विद्रोह कर देती हैं… ये क्या ले आये… ये नहीं चलेगा… Boycott… हड़ताल…

ऐसे में आपको एक क्रूर, निर्मम, अधिनायक… Dictator बनना पड़ता है… और अपनी स्वाद ग्रंथियों को ज़बरदस्ती काम पे लगाना होता है… हरामखोरी नहीं चलेगी… यही खाना है… खाना पड़ेगा… इसलिए खाओ और relish करो…

और फिर कैसा भी भोजन हो, कैसा भी नया स्वाद हो, मीठा, तीखा, चरपरा, खट्टा, कड़वा, कैसा भी स्वाद हो… आपकी taste buds 21 दिन में उस नए स्वाद को स्वीकार कर लेती हैं और फिर उसे relish करने लगती हैं…

पर याद रखिये… 21 दिन… 21 दिन आपको अपनी स्वाद ग्रंथियों से ज़बरदस्ती काम लेना है… हमारे यहां कुछ cultures में cuisines में variety की बहुत कमी है… जैसे हरियाणा और पंजाब में, गुजरात या बंगाल, UP, बिहार की तुलना में बहुत कम विविधता है… गुजराती थाली में जहां आपको 50 से ज़्यादा व्यंजन मिलेंगे वहीं पंजाबी थाली में सिर्फ एक दाल एक सब्जी ही पर्याप्त है…

मैंने यहां बहुत से मित्रों को रामातोरी यानी नेनुआ की सब्जी में मूली डाल के बनाना खाना सिखाया… अब नेनुआ के साथ मूली का एक typical combination है जो पूर्वांचल के कुछ भाग में बड़े शौक से खाया जाता है पर पंजाबियों के लिए ये बिल्कुल नया taste था।

उसी तरह पूर्वांचल के बाटी चोखा में कच्चा सरसों का तेल… और तेल भी सामान्य नहीं बल्कि कच्ची घानी का जिसमें खूब झझक होती है… अब कच्चा सरसों का तेल खाना सबके बस का नहीं… पर UP बिहार बंगाल में इसे बड़े शौक से खाया जाता है…

मैंने अपने एक पंजाबी मित्र को UP का कच्चा चोखा बाटी के साथ खाना सिखा दिया है… उनके अलावा आज तक किसी पंजाबी को मैंने बाटी चोखा खाते या relish करते नहीं देखा… ज़्यादातर लोग भोजन के मामले में इतने rigid होते हैं कि वो नया कुछ try करना ही नहीं चाहते, अपने भोजन में कोई नया experiment करना ही नहीं चाहते…

ज़्यादातर लोग अच्छे और बुरे खाने में differentiate नहीं कर पाते। खाना अच्छा है तो क्यों अच्छा है, बुरा है तो क्यों बुरा है, इसमें क्या पड़ा है जो ये बहुत अच्छा है, अगर बहुत बुरा है तो इसमें क्या किया जाए कि ये बहुत अच्छा हो जाएगा… लोग इन बारीकियों में नहीं पड़ते… ज़्यादातर लोगों को कुछ भी परोस दो, वो खा लेंगे…

मेरे कहने का आशय ये है कि जब इतने सारे लोग भोजन – खाना जैसी बुनियादी ज़रुरत के बारे में कुछ नहीं जानते तो सरकार चुनना तो बहुत पेचीदा काम है… ये नादान बेचारे जानते ही नहीं कि अच्छी या बुरी सरकार में क्या अंतर होता है। 99% लोग जानते ही नहीं कि दरअसल उनको अपनी सरकार से चाहिए क्या? वो ये जानते ही नहीं कि उनकी सरकार उनको क्या क्या दे सकती हैं और क्या दे रही हैं।

99% लोग अच्छी और बुरी सरकार का अंतर नहीं समझते।

अफसोस कि हमको ऐसे ही लोगों के बीच रहना है।

शुक्र है कि इस युद्ध में मोदी हैं हमारे सेनापति

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