भाजपा मप्र में जीत के भी हार गयी, क्योंकि वरिष्ठ काँग्रेसी कमलनाथ को पता था ‘सच’

हेडलाइन यह बतला रही है कि मध्य प्रदेश में काँग्रेस को 114 सीट मिली, जबकि भाजपा को 109 सीट से ही संतोष करना पड़ा।

चुनाव आयोग की वेबसाइट के अनुसार काँग्रेस को 1 करोड़ 55 लाख 95 हज़ार 153 वोट मिले, लेकिन भाजपा को कुल 1 करोड़ 56 लाख 42 हज़ार 980 मत मिले, यानि कि भाजपा को काँग्रेस की तुलना में 47 हज़ार 827 वोट अधिक मिले।

हैं ना आश्चर्य की बात, जो कोई भी मीडिया नहीं बता रहा है।

काँग्रेस से अधिक वोट मिलने के बावजूद भाजपा कैसे हार गयी?

उचित विश्लेषण के लिए मुझे चुनाव आयोग के द्वारा सभी चुनाव क्षेत्र के डाटा को एक फाइल में जुटाने और अपलोड करने का इन्तजार करना होगा। अभी वेबसाइट में एक-एक कॉन्स्टिट्यूएंसी पे क्लिक करके देखना होता है।

लेकिन मेरा मानना है कि वरिष्ठ काँग्रेसी कमलनाथ ने समुदाय विशेष से जैसा आग्रह किया था, उन्होंने हर चुनाव क्षेत्र में अधिक से अधिक संख्या में – सम्भवतः 90% – के आस-पास मतदान किया और सारे के सारे वोट काँग्रेसियों की झोली में पड़े।

हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार नौ सीटों पर इनकी सँख्या लगभग 50% हैं और 10 सीटों पर इनकी आबादी 40,000 से 50,000 है। मेरे अनुमान से अगली 80-90 कॉन्स्टिट्यूएंसी में संख्या दस हज़ार के आस-पास होगी जो चुनाव के दौरान हमारी बेवकूफियों से निर्णायक साबित हो गयी।

इन वोटों के एक पार्टी को मिलने से एक ऐसी स्थिति बन गयी कि भाजपा को अधिक वोट अवश्य मिले, लेकिन कुछ ‘कांटे’ की कॉन्स्टिट्यूएंसी में निर्णायक नहीं सिद्ध हो पाए।

जैसा कि मैंने 22 नवंबर को लिखा था, चूंकि यह समुदाय अन्य लोगों की तुलना में अधिक से अधिक संख्या में आकर वोट करता है, अतः कुल पड़े वोटों में इनका प्रभाव समस्त मतदाताओं के अनुपात में विषम रूप में अधिक हो जाता है।

इन वोटो को अपनी ‘जेब’ में रखने के बाद काँग्रेस को हर चुनाव क्षेत्र में किसी अन्य दबंग जाति के वोटों को प्रलोभन, शिकायत, डर, पहचान के मुद्दे पर अपनी ओर खींचना था; और सत्ता उनके ‘हाथ’ में।

मित्र लोग नोटा को दोष दे रहे हैं, लेकिन नोटा का रोल नगण्य है। इस बार मध्य प्रदेश में कुल 5 लाख 42 हज़ार 295 लोगों ने नोटा को ‘चुना’। वर्ष 2013 में 6 लाख 43 हज़ार 171 मतदाता नोटा के आगोश में थे। अतः नोटा का प्रभाव कम हुआ है।

मैं जानता हूँ कि लगभग दर्ज़न कॉन्स्टिट्यूएंसी में भाजपा की हार का मार्जिन नोटा को मिले ‘वोटों’ से कम था। लेकिन यही स्थिति वर्ष 2013 में काँग्रेस की थी. फिर भी, अगर 2013 में काँग्रेस को सारे नोटा मिल जाते, तब भी वह चुनाव नहीं जीत सकती थी, ना ही भाजपा से अधिक वोट पा सकती थी।

राजस्थान में भी भाजपा जीत के निकट थी, फिर भी उसे काँग्रेस की तुलना में 1 लाख 77 हज़ार 699 वोट कम मिले जो 0.5 प्रतिशत का अंतर है। इतने कम अंतर पर काँग्रेस की तुलना में 26 सीट कम मिलना यही संकेत देता है कि किसी समुदाय के लोगों ने 90 प्रतिशत के आस-पास मतदान किया है।

लेकिन छत्तीसगढ़ में भाजपा को बुरी हार का सामना करना पड़ा है और इसे काँग्रेस की तुलना में 14 लाख कम वोट मिले हैं। हालाँकि 2013 में भाजपा ने काँग्रेस को केवल 97,000 मतों के अंतर से हराया था, जो महत्वपूर्ण नहीं है और किसी संकट की तरफ इशारा कर रहे थे। छत्तीसगढ़ में भाजपा की बुरी हार का विश्लेषण आवश्यक है जो ज़मीन पर कार्य करने वाले मित्र ही दे सकते हैं।

अंत में, इन तीनों राज्यों की 181 आरक्षित सीटों पर भाजपा को बुरी हार का सामना करना पड़ा है। काँग्रेस ने लगभग 105 सीटें प्राप्त की है जबकि भाजपा को केवल 60 सीटों पर विजय हासिल हुई है। जबकि 2013 के चुनावों में भाजपा को 115 के ऊपर सीटों पर विजय प्राप्त हुई थी। राजस्थान में दलितों के लिए आरक्षित 33 सीटों में से 31 सीटें भाजपा ने जीत ली थी जबकि इस बार केवल 10 सीटों पर ही भगवा ध्वज लहरा रहा है।

एक बात समझ लीजिए। ना तो आरक्षण खत्म होने जा रहा है, ना ही एससी एसटी एक्ट। चाहे आप किसी भी पार्टी को वोट दे दें, या नोटा दबा दें। लेकिन इन दोनों मुद्दों पर अगर आप प्रधानमंत्री मोदी को भला बुरा कहते हैं और अपशब्द का प्रयोग करते हैं तो उसको दलित समुदाय अपने विरुद्ध कहे हुए शब्दों के रूप में ले लेता है और इसका बदला उसने भाजपा से विमुख होकर किया है।

राजनीति तक तो बात ठीक है, लेकिन हम में से कुछ लोगों की गाली गलौज से यही वर्ग जब अपने घरों से हमारे आराध्य देवों की मूर्तियां हटाते हैं तब आपको बहुत बुरा लगता है। आप कहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी को हिंदुओं का साथ देना चाहिए। क्या ये हिंदू नहीं है?

वरिष्ठ काँग्रेसी सदस्य, सांसद, पूर्व मंत्री कमलनाथ को पता है ‘सच’

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