मोदी को अपने घर का आदमी मानता है भाजपाई वोटर, और काँग्रेसी…!

5 राज्यों के चुनाव परिणाम पर यह अंतिम लेख है। इन नतीजों का इतने तरीकों से मंथन और परीक्षण किया जा चुका है कि अब कुछ लिखने की इच्छा भी नहीं हो रही।

बात एक समझने की यह है कि दक्षिणपंथी मतदाता (भारत में भाजपा का वोटर, संघ की विचारधारा को माननेवाला या काँग्रेस-वाम विरोधी) राजनीति को भी दिमाग से नहीं, दिल से सोचता है और यह कल के बाद से आ रही प्रतिक्रियाओं में स्पष्ट है।

मुझे याद है जब जेएनयू में विद्यार्थी परिषद के टिकटों का बंटवारा होता था, तो बाकायदा रोआ-रोहट से लेकर झोंटा-झोंटउअल तक हो जाता था।

वहीं, वामपंथी खेमे में विवाद नहीं होता था, ऐसा सोचना भी बेकार है। वे लेकिन बहुत पेशेवर और राजनीतिक तरीके से अपने विवाद सुलझाते थे औऱ एक बार पार्टी का फैसला होने के बाद सारे मतभेद-मनभेद भुलाकर परिषद को नापने में लगते थे।

विद्यार्थी परिषद में जिन विषयों में हमारी स्थिति अच्छी होती थी, वहां एक तो अंतिम समय तक टिकट को लेकर आपाधापी और अनिश्चितता बची रहती थी, ‘कोणक’ (असंतुष्टों को कोने में ले जाकर साधने की प्रक्रिया) और ‘बइठक’ (स्वयंभू और वरिष्ठ नेताओं का साथ बैठकर हल निकालना) का दौर चला रहता था और अंतिम फैसले के बाद भी रोना-धोना, मनभेद और भितरघात चलता रहता था।

ऊपर की बात को भाजपा के संदर्भ में देखिए और समझने की कोशिश कीजिए। इसके कारण क्या थे? पहला तो यह कि अधिकांश समर्थक सामंती और रूढ़िवादी वृत्ति के हैं, जिन्होंने अक्सरहां आदेश दिया है, अपनी ही मनवायी है।

इसके अलावा, दक्षिणपंथी मतवादी स्वतंत्र चेतना और बुद्धि के भी होते हैं। काडर-बेस्ड पार्टी होने के बावजूद भाजपा के समर्थक नोटा का प्रयोग भारी मात्रा में कर सकते हैं, वोट ना देकर घर पर बैठ सकते हैं, भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोल सकते हैं (और बाद में रो सकते हैं। हा हा हा) और एक बड़ी पहचान (यथा हिंदू) के बरअक्स उप-पहचान (यथा, जाति या प्रांत) को तवज्जो भी दे सकते हैं।

मुसलमान या प्राइवेट लिमिटेड पार्टियों के वोटर जैसे काँग्रेस, सपा, राजद, जद-यू, रालोसपा, लोजपा आदि के वोटर ऐसा नहीं करते। क्यों?

…सोचिएगा।

जिस तरह की भावनात्मक प्रतिक्रियाएं पिछले दो दिनों से सोशल मीडिया पर नुमायां हैं, वह क्या बताती हैं?

दक्खिनी टोले का वोटर दिल से सोचता है। वह प्रधानमंत्री को अपने घर का आदमी मानता है, मोदिया, मोदीजी, या फिर नरेंद्र मोदी कहते हुए भी वह बाकायदा पीएम से रूठता है, खिसियाता है और अपने हिसाब से दंडित भी करता है। इसके साथ ही वह इतना चालाक भी है कि वह विधानसभा और लोकसभा चुनाव का गणित भी अलग करता है।

(इस लेख में भाजपा की गलतियों पर बात मैं नहीं कर रहा, वह एक अलग अध्याय है, इसलिए कृपया उस पर प्रश्न या राय न दें)।

इसके उलट देखिए, काँग्रेसी गुंडे क्या करते हैं? वे प्रधानमंत्री का मुखौटा लगाकर चाय सर्व करवाते हैं। उनके मन में चायवाले के प्रति उत्कट घृणा तो है ही, वे पीएम को व्यक्तिगत तौर पर धूल में भी मिलाना चाहते हैं।

ऐसी नफरत और घिन इसलिए कि एक गरीब, भला राहुल बाबा, ज्योतिरादित्य बाबा, सचिन बाबा के लिए बने देश का पीएम कैसे बन गया, नेहरू-राजवंश को छोड़कर भला इस देश पर कोई और शासन कैसे कर सकता है?

यही नफरत और चिढ़ आप काँग्रेस प्रवक्ता उस आलू की बोरी में पाते हैं, जब वह गौरव भाटिया के बाप को गाली देती है, उन कार्यकर्ताओं में पाते हैं, जो पीएम के फोटो पर कीचड़ फेंकते हैं और पीएम का मुखौटा पहनाकर अपने कार्यकर्ता से चाय बंटवाते हैं।

सही सवाल और गुस्सा भी नहीं दिखा रहे आप!

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