हार के आगे क्या

कल एक व्हाट्सएप्प ग्रुप में एक मोदी विरोधी सदस्य ने स्पष्ट रूप से कहा कि भारतीय हिन्दू समाज यही अधिकतम कर सकता था कि एकजुट होकर मोदी को ले आया और अपने कर्तव्यों की इति श्री कर ली, और वो आगे भी अगर ले आया तो सबकुछ मोदी पर ही छोड़ कर निश्चिन्त अपना काम धंधा करेगा, इसलिए मोदी की ये जिम्मेवारी बनती है कि इस समाज के लिए वो कानून बनाये जिसकी मांग ये करता आ रहा है, जिसे सोच कर ये आपको वोट दे रहा है!

बात को समझ रहे हैं आप?

“मोदी की ये जिम्मेवारी बनती है कि इस समाज के लिए वो कानून बनाये जिसकी मांग ये करता आ रहा है।”

इसलिए इन्होने मोदी जी को वोट दिये। और अगर वे यह नहीं करते तो अपेक्षाएँ पूरी न करने के लिए ये इन्हें सत्ता से बेदखल भी करवा सकते हैं। अभी भाजपा को हराने पर ही इनका ‘जितम मया’ चालू था।

यह व्यक्ति बहुत ही स्पष्टता तथा दृढ़ विश्वास के साथ अपनी बात रख रहा था। ऐसे कानून आने चाहिए इस मांग पर वो अडिग था।

ऐसे कानून लाने के परिणाम, लाने के मार्ग में वैधानिक और प्रशासनिक बाधाएँ, तथा लागू होने पर प्राप्त होते परिणामों से उसे कोई लेना देना नहीं था, उनपर बात करना भी गवारा न था।

किसी भी चर्चा को सब से पहले मूर्ख कुतर्क कहना, फिर कायरता कहना और आखिर में जनादेश का विश्वासघात करार देना, यही उसका उत्तर था। वह पूरी तरह से मानता था कि उसके जैसे लोगों के कारण ही मोदी जी सत्ता पा चुके थे और अपना समर्थन हटाकर वो अपनी बात की सत्यता साबित करना चाहता था।

मुद्दा यह है – यह व्यक्ति अपवाद नहीं है। चार साल पहले एक मीडिया संबन्धित व्यक्ति से मिला था जिससे मेरी योजना की चर्चा की। वे बहुत उत्साहित हुए और कहने लगे कि यह बिलकुल करने योग्य है और करना मेरे लिए मुमकिन भी है। मैं इसमें इसको उसको जोड़ता हूँ।

यहाँ उन्होने कई बड़े नाम लिए, और वाकई वे उनको जानते हैं, आभासी या वन वे परिचय नहीं। दो महीने बाद उनसे पूछा क्या हुआ तो उनका जवाब उड़ाऊ था – मैंने मोदी को वोट दिया है, अब उनका काम है, मैं तो बस देखूंगा काम कैसे होता है। हाल में साहब नोटा समर्थक हैं।

ऐसों की संख्या भी गणित बिगाड़ने को पर्याप्त है, जैसे कि अब देख ही चुके हैं।

लेकिन इससे भी एक और गंभीर मुद्दा है। अगर ऐसे लोगों का डेढ़ प्रतिशत होना गणित बिगाड़ता है, तो इससे आप को क्या समझ आता है ?

मुझे युद्धशास्त्र की कसौटी पर जो बात समझ में आती है वह यह है कि काँग्रेस के लिए यह लड़ाई बहुत ही आसान है। बहुत याने, बहुत ही आसान है। और अगर चार साल मिलते हैं तो बिलकुल cakewalk है।

काँग्रेस के लिए हर समय केवल ऐसे डेढ़ प्रतिशत लोगों को खोजना है और उनके गले में यह बात उतारनी है कि कोई संवैधानिक रूप से मुश्किल से असंभव बात को अपना एजेंडा बनाए और फिर यह दिखाएँ कि बीजेपी उस एजेंडा को पूरा करने में फेल हो रही है।

संजय गांधी ने शाऊटिंग ब्रिगेड, याने चिल्लाहट ब्रिगेड की वामी युद्धनीति इसीलिए तो अपनाई थी। आज भी टीवी डिबेट में कोई वामपंथी जब बात करता है तो डिबेट के लिए खास आवाज़ लगाता है। ट्रेनिंग दिखती है। बस, किसी भी विरोधी आवाज़ को शोर से दबा दो, विरोधी होते ही कितने हैं और उतने शोरखोर तो मिल ही जाएँगे।

ऐसी मांगों को जायज़ ठहराना बहुत कठिन नहीं होता। बहुत लोगों को संख्या में विश्वास होता है, अगर वे उस मांग का समर्थन करते बहुत सारे लोग देखेंगे तो वे भी समर्थन करेंगे – आखिर इतने सारे लोग मूर्ख थोड़े ही हैं जो समर्थन दे रहे हैं – ऐसे लोगों को कभी भीड़ से अलग कर के दो सवाल पूछेंगे तो यही जवाब मिलेगा – इतने सारे मूर्ख हैं क्या?

लेकिन इस भीड़ के लिए बहुत ही जल्द, उनका एजेंडा पूरा न करने की असमर्थता को नेता द्वारा उनका अस्वीकार बताया जाता है, जिसे देखते-देखते नेता द्वारा दगा बताया जाने लगता है और आप किंकर्तव्यविमूढ़ देखते रह जाते हैं तब तक वे उसको नेता द्वारा जनता का असह्य अपमान बता चुके होते हैं।

बस, पर्याप्त है भीड़ को एक खूंखार झुंड में परिवर्तित करने के लिए, जो कुछ भी सुनने को तैयार नहीं और खून की प्यासी भी हो सकती है।

पूरी तरह से बरगलाए लोग होते हैं लेकिन यह बरगलाना इतना सफल हो जाता है कि आप कितना भी साबित कर दें, वे कभी नहीं मानेंगे कि वे बरगलाए गए हैं। लव जिहाद में पागल लड़की जैसी हालत होती है जो आपा खोकर आप से लड़ने पर उतारू हो जाती है और उसका तथाकथित ‘प्रेमी’ बाजू में खड़ा रहकर मंद मंद मुसकुराता तमाशा देखता है।

ऐसा कुछ भी नहीं जिससे निराश हुआ जाए

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