मैं भी बनूंगा गुलूकार…

कुछ ऐसा इत्तेफाक हुआ कि तीन दिन पहले देश के एक जाने-माने शायर साहब से मैंने संपर्क किया। जाने-माने शायर के लाखों करोड़ों दीवाने हैं और कुछ तो ऐसे भी कि प्राणत्याग से पहले मुंह में तुलसी दल लेने के बदले उनकी नज़्म ही सुनना चाहें। एकदम राजेश खन्ना इस्टाइल में.. मैं शायर बदनाम..!

खैर, साहब का नंबर उपराया गया। पता चला कि शायर साहब के लख्त ए जिगर यानी उनके बेटे बात करते हैं। तो मैंने उन्हें ही फोन लगाया। दबी ज़ुबान में कहा, जनाब दिल्ली से एक नाचीज़ बोल रहा हूं.. आपके अज़ीम अब्बा हुजूर के चीखते कंठ से झरते पराग को कुछ लोग समेटना चाहते हैं। बड़े प्यारे बच्चे हैं। आपके अब्बा हुजूर के पंखे। करीब दो घंटे का कार्यक्रम होगा। आपके ही शहर में होगा सो आने जाने की समस्या भी नहीं रहेगी। आगे आप बताएं.. क्या सेवा करनी होगी?

लख्त ए जिगर ने छूटते ही पूछा कि जो कार्यक्रम करवाना चाहते हैं क्या वो अफोर्ड कर पाएंगे..? अब मुझे काटो तो खून नहीं। मैंने सोचा कि हिन्दी के दलिद्दर महाविद्वान कवियों ने तो क्या-क्या कष्ट न भोगे। ये कौन हैं जो पूछ रहे कि शायरी सुनना क्या अफोर्ड कर पाएंगे.. शायरी सुननी है कोई सन्नी लियोनी नाइट थोड़ी ना है.. लेकिन मैंने अपनी शिष्टता को बनाए रखते हुए कहा.. जी जी बस वही जानना था कि आपके आदरणीय पिता जो कि तुकबंदी के तैमूर हैं, वे कितने पैसे पेलते हैं!!

लख्त ए जिगर ने कहा कि अगर प्रोग्राम सोलो है तो पैंतालीस मिनट के दो लाख रुपये होंगे। और हां, पैंतालीस मिनट से ज्यादा का वक्त नहीं होता। अब चूंकि आप मेरे ही शहर में कार्यक्रम कर रहे तो तीस हजार कम हो जाएंगे। मैंने जब रेट सुना तो सारी उतर गई। भक्क से भगजोगनी जैसी आंखें जल उठीं। ज्ञान की प्राप्ति हो गई। बोधिवृक्ष के नीचे नहीं बल्कि दस बटा दस के कमरे में ही। लगा जैसे साक्षात चचा ग़ालिब की गली में आ गया हूं।

इन लंतरानी के लुच्चों को हमारे देश में सुन-सुन कर सिर पर चढ़ाया गया है। ऐसी गज़लें जो हगते-मूतते… लिख दी जाय, उसे ही सुनने का सुरूर है। वाह वाह… लीजिए कलाम पेश है ..

पेशाब का रंग जरूरत से ज्यादा पीला है…
हुजूर बिलेंडर और रायल स्टेग का टकीला है…!

हिन्दी भाषा यूं ही दरिद्र नहीं हुई। जिस मंच पर कभी श्रेष्ठ कवि और ऊंचे दरजे के शायर बैठते थे, वहां ये सड़कछाप छुछुंदर छाने लगे और जनता लोट गई। हमारे चैनलों में भी कई अज़ीम गीतकार हैं। वाह… वाह अद्वितीय, अनुपम, अतुलनीय.. सेर भर नमन रहेगा! इन दुटकिया शायरों ने हिन्दी भाषा का जितना अहित किया उतना करुणानिधि भी न कर सके थे।

मैंने अपने कई पढ़े लिखे दोस्तों को भी हिन्दी कविता से दूर रहते हुए देखा है। उन्हें लगता है कि जो वो नहीं समझ पाए वह कूड़ा है। तो बेहतर है कि ऐसी ही ग़ज़ल लिखी जाय। कसम उड़ान झल्ले की गदर मचा दूंगा… दिन में पाँच गजलें लिखूंगा… नोट की नदी बहा दूंगा.. कई नामों पर विचार चल रहा है, जैसे कि

लफंदर जालंधरी..
भौकाल भागलपुरी..
कब्ज कलंदरी..
लल्लनटाप लखनवी…
गुटखा फच्च फुच्च कानपुरी…
हग्गन सिंह हंसते हंसते
चिचा मुरादाबादी
दद्दा कसरती
पद्दा सुरसुरी
पेलू पटनियां

बाक़ी तो सब ठिक्के है। अमां यार पान खा के आने दो। आक थू….

गणित के सिद्धांत बदलने की राजनीतिक साज़िश का पर्दाफाश

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