एक बैल का खुला पत्र आज के तथाकथित सभ्य इंसान के नाम

सादर अभिवादन,

आजकल हर कोई मुझ से परेशान है। कोई मुझे आवारा कहता है कोई मुझे बेसहारा कहता है। मैं सुनता रहता हूँ, कभी हंस कर बाते टाल देता हूँ, कभी बहुत गुस्सा भी होता हूँ, लेकिन 1970 तक के दशक तक यह बात नहीं थी।

तब तो मेरे जन्म लेने पर खुशियां मनाई जाती थी। यहाँ तक कि अगर किसी के घर में किसी त्यौहार के दिन कोई मौत हो जाती थी तो वह त्यौहार उस घर में दोबारा तभी मनाना शुरू किया जाता था जब उस घर में कोई बहू लड़का या कोई गऊ बछड़ा दे देती थी। और तो और क्षमा करें जाट्टों के गोत्र ढांडा व नारा मेरे नाम से ही निकले प्रतीत होते हैं।

लेकिन आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं और मैं भी यह स्वीकार करता हूँ कि मेरा उपयोग अब ना के बराबर रह गया है। आप लोगों से खुल कर बात करना चाहता हूँ। बात इतनी सी है कि क्या यह धरती सिर्फ इंसान के लिए बनी है??? क्या अन्य किसी भी जीव या पेड़ पौधे का इस पर कोई हक नहीं है???

मुझे ईंजन ने घर निकाला दिया है, जहाँ मुझे बांधा जाता था वहाँ आज आपके ट्रैक्टर, मोटरसाइकिल व कार आदि खड़े होते हैं लेकिन ये आधुनिक तकनीक आए समय ही कितना हुआ है??? पिछले 200 साल में तुम इंसानो ने इस स्वर्ग जैसी धरती को नरक नहीं बना दिया है? 200 साल को तो छोड़ो ये रासायनिक व यांत्रिक हरित क्रांति तो 1970 से ही भारत में आई है, क्या इतने कम समय में तुम्हारे खेत बंजर नहीं होने लगे हैं?? क्या आज जितना बड़ा किसान उतना बड़ा कर्जवान नहीं है?? खैर …

परमात्मा ने, परम सत्ता ने और अगर आप नास्तिक हैं तो कह लें प्रकृति ने कितने सलीके से यह संसार बनाया है लेकिन आप कर क्या रहे हैं???

200 साल पहले CO2 280 ppm थी, जो 2015 तक 440 ppm हो गई थी और 2016 में 443 ppm. एक साल में 3 ppm CO2 पहली बार बढ़ी है। PM 2.5 और PM 10 का हाल तो आप रोजाना अखबारों में पढ़ते ही हैं। अरे मूर्ख इंसान तेरा शरीर प्रकृति ने धरती पर एक निश्चित ऑक्सीजन मान कर बनाया है, उस से कम या ज्यादा में ना तुम जिंदा रह पाओगे और ना ही ये लाख चौरासी योनियां और तुम उसे ही खत्म करने पर लगे हुए हो।

इस धरती को उपजाऊ नदियों ने बनाया, तुमने और मैंने हाड़ तोड़ मेहनत कर इसको समतल किया तथा हजारों साल तक मनमर्जी की फसल उगाई लेकिन तुझे बिजली व पैट्रोलियम क्या मिले तू तो खुद को ही भगवान समझ बैठा।

आज मैं और मेरे साथी झोटे, ऊंट, घोड़े व गधे आदि तुम्हें आवारा लगने लगे, बेसहारा लगने लगे??? जिन्होंने तेरा सदियों तक साथ दिया, तेरा हर काम किया, वो तूने एक झटके में खुद से अलग कर दिए। माफ करना तेरी फितरत ही ऐसी है कि तू तो अपने बूढ़े मां बाप को घर से निकाल देता है, मैं तो हूँ ही कौन???

सुना अब तू ऐसे प्रयोग करने पर लगा है जिससे बस बछड़ियां पैदा होंगी, बछड़े पैदा ही नहीं होंगे। शाबाश, एक ऐसा प्रयोग भी कर जिससे सिर्फ औरत ही पैदा हों या सिर्फ मर्द ही पैदा हों।

क्या इसी को बोलते हैं जीओ और जीने दो???

खैर तुझे बिजली चाहिए ना??? कार, बस, ट्रैक्टर, स्कूटर ही चलाने हैं ना??? यही है ना तेरे विकास का पैमाना??? इस से ही चलता है ना सब कुछ??? मुझे बता मैं बनाकर देता हूँ तुझे बिजली, मैं चलाऊंगा तेरी कार और वो भी ऐसी जिससे इस प्रकृति पर कोई असर ना पड़े, जिससे CO2 तथा PM 2.5 या 10 भी ना पैदा हों। बस मुझे चारा खिलाना पड़ेगा।

आज हर शहर में इंजीनियरिंग कॉलेज खुले हुए हैं जो हर साल लाखों इंजीनियर पैदा करते हैं। तो सुनो हे इंजीनियरों भौतिकी का एक सिंद्धांत है कि जब 300 लीटर हवा 25 बार तक दबा दी जाती है तो उसमें एक किलोवाट/ घंटा बिजली (विद्युत शक्ति) समा जाती है। इसी सिंद्धांत पर हवा से कार चलती हैं तथा विश्व के अनेक देशों में बिजली बनती है। आप मुझ से हवा दबवाईए, थारी सोगंद मैं हजारों लीटर हवा सैंकड़ों बार तक दबा सकता हूँ।

मैं चाहूँ तो इसका पेटेंट ले कर अरबों कमा सकता हूँ लेकिन नहीं, मैं चाहता हूँ कि हर किसान, हर गांव व हर गौशाला की बिजली की कमी पूरी हो, मुझे सम्मान मिले, विश्व प्रदूषण मुक्त हो तथा भारत दोबारा सोने की चिड़िया बने। मुझ से बिजली बनाने की सरलतम व पर्यावरण हितैषी ऐसी विधि कि हींग लगे ना फिटकरी और रंग भी चौखा। आज ग्यारह दिसम्बर दो हजार अठारह के दिन के बारह बजे राजधानी दिल्ली में हवा की स्थिति तो देखिये। यही हाल समस्त भारत का है।

  • बेज़ुबान बैल की आवाज

डॉ शिव दर्शन मलिक
वैदिक भवन, रोहतक (हरियाणा)

कुएं में ही भांग मिली है, ये कुआं आंट कर नया कुआं खोदना किसी के बस का नहीं

तथाकथित गौरक्षकों को ज़रूरत है जल्लीकट्टू के पीछे चल रहे षडयंत्र समझने और समझाने की

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY