2019 के लिए यह अच्छा सबक है…

अस्वीकरण : सलमान खान की फिल्मों और राहुल गांधी की राजनीति को सराहने वाले ‘परम’ तत्वों के लिए मैं नहीं लिखता हूं।

मनोरंजन चैनलों की गलाफाड़ चीख-चिल्लाहट और तू-तू मैं-मैं के बाद, वामपंथी पक्षकारों की भीनी मुस्कान और रवीश जैसे कर्मठ पक्षकारों की तिर्यक हंसी पर रीझे मेरे भोले-भाले श्रोताओं, दर्शकों और पाठकों…

आप सभी को नमस्ते और धूल बैठने के बाद ये रही कुछ जानकारियां :

1. कांग्रेस का सूपड़ा मिज़ोरम से साफ हो गया है। तेलंगाना में महाठगबंधन की भ्रूण-हत्या हो गयी है। छत्तीसगढ़ में उसे बंपर जीत मिली है।

2. राजस्थान में पिछले दो-तीन वर्षों से महारानी के खिलाफ ज़बर आक्रोश था। करणी सेना, पद्मावत, आरक्षण और सवर्णों ने रही-सही कसर पूरी कर दी। ऐसे में भी कांग्रेस अगर सामान्य बहुमत मात्र ला पायी (और सीटों पर उसकी जीत का अंतर नोटा के मिले मतों से कम है) और गुलाम उसे राहुल की जीत बता रहे हैं, तो मुझे कुछ नहीं कहना है।

3. मिथिला में एक कहावत है। जातिगत है, इसलिए जाति को छोड़िए। होता यह है कि एक मूर्ख किसी सर्पदंश के मृतक को देखता है। सांप ने उसे आंख के नीचे काटा होता है। मूर्ख अफसोस जताते हुए कहता है कि भला हुआ सांप ने आंख में नहीं काटा, वरना आंख ही फूट जाती।

कांग्रेस की भी आंख फूटने से रह गयी, वरना अध्यक्षजी तो पेंचकस और पाना लेकर निकल चुके थे। तनिक भी चूक रह गयी होती, तो कांग्रेस के हाथ से यह राज्य गया था, शिवराज ही राज करते। 15 वर्षों के बाद शिवराज, भाजपा और मोदी का यह प्रदर्शन अगर काबिल-ए-तारीफ नहीं है, तो गुजरात और महाराष्ट्र में तो भाजपा वैसे भी हार ही गयी थी न!

4. मुझे मोदी से समस्या है, भाजपा से भी है, होनी चाहिए। हालांकि, मेरी समस्या मूर्खता की उस सीमा को नहीं छूती, जो राहुल (हे भगवान) तक को देश का पीएम स्वीकार सकती है। (यह बात दीगर है कि मैं उस महान राज्य का निवासी हूं जो राबड़ी को सीएम बना चुका है, अब उसके बेटों को भी बना सकता है, इस देश ने देवगौड़ा जैसा पीएम भी झेला है… लेकिन राहुल! वह इंतहा है)।

5. उन हिंदुओं को भी धन्यवाद, जिन्होंने मोदी को इतनी बड़ी सज़ा दी। भैए, मोदी का क्या बिगड़ना है? अब जो बिगड़ेगा, वो एमपी, राजस्थान और छग का बिगड़ेगा। छग में शहरी नक्सल राजकीय अतिथि बनेंगे, उनके सेमिनार होंगे, फिर से हमारे जवान नक्सलियों का शिकार बनेंगे, म.प्र. और राजस्थान जो बहुत मुश्किल से बीमारू राज्य की श्रेणी से निकले हैं, उनको कांग्रेस राजवंश के मनसबदार फिर से वहीं धकेलेंगे।

6. प्रदीप सिंह सर ने एक बात कायदे की कही है – आत्मंथन और चिंतन बीच युद्धभूमि में नहीं होता है। वह अपने शिविर में किया जाता है। आत्मघात में हिंदुओं का ज़ोर नहीं है। वे सब कुछ देखते हुए भी कुल्हाड़ी को शरीर में लपेटकर कूद जाने में सिद्धहस्त हैं।
(ऐसी सपाटबयानी भी मत कीजिए कि कांग्रेस और भाजपा में अंतर नहीं है। यदि आप यही मानते हैं, तो यह लेख आपके लिए नहीं है। मैंने पहले ही कहा है कि यह लेख बेसिक अध्ययन की मांग करता है)
कैराना, दादरी, कठुआ, सुप्रीम कोर्ट, कसाब, याकूब, बंगाल, सबरीमाला, जलीकट्टू… लंबी फेहरिस्त है, नोटावीरों। अब उम्मीद करें कि यह सब कुछ बहुत जल्द दुरुस्त हो जाएगा।

7. मैं विश्लेषण नहीं करूंगा। हार तो हार है। भाजपा इसे सिर झुकाकर स्वीकारे और जनता के मन को समझने का हौसला रखे। यदि उसे सब्सिडी चाहिए तो आप गिव-अप सब्सिडी के भरोसे नहीं लड़ सकते। यह वक्त भाजपाइयों के मैदान में उतरने का है।

और हां… मोदीजीवा से जितनी भी नाराज़गी रहती है न, आज जैसे दिन जब वामपंथी-कांग्रेसी गिरोह के कमज़र्फ ठगों की तिर्यक हंसी देखता हूं, तो दिल वापस उसी बुड्ढे पर चला जाता है…।

2019 के लिए यह अच्छा सबक है…

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