राष्ट्रवादी खेमे का दिवास्वप्न : बस भगवान अवतार लेंगे और सब ठीक हो जाएगा

मेरे पास रामचंद्र गुहा द्वारा लिखित/ सम्पादित कुल पाँच पुस्तकें हैं जिसमें से अभी तक मैंने चार पढ़ी हैं। वे सभी एक से बढ़कर एक हैं। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि गुहा की पुस्तकें पढ़कर मैंने उसके विचारों को आत्मसात कर लिया।

मैं जो कुछ भी पढ़ता हूँ विवेक के साथ पढ़ता हूँ। मेरा चित्त शुद्ध है और मेरे अन्तःकरण में मेरे विचार एकदम व्यवस्थित सुलझे हुए रूप में विद्यमान होते हैं। जब तक मैं अपने मन में उमड़ते घुमड़ते विचारों की गुत्थी सुलझा नहीं लेता तब तक उन्हें व्यक्त नहीं करता यह मेरा स्वभाव है। मैं अपने विचारों की उलझी हुई गठरी खोलकर किसी के सामने ‘मत’ अथवा ‘सिद्धांत’ के रूप में प्रस्तुत नहीं कर सकता।

राष्ट्रवादियों के सामने यही सबसे बड़ी समस्या और चुनौती दोनों है। राम गुहा ने इतिहास को देखने का गलत दृष्टिकोण प्रचारित किया है यह सत्य है किंतु हमें सही दृष्टिकोण से इतिहास लिखने से किसने रोका है?

हम सूचनाओं के उलझे हुए जंजाल को ज्ञान का भंडार समझ बैठे हैं यह हमारी भूल है। छोटे-छोटे ‘पोस्ट’ और ‘लेख’ अल्प समय के लिए पीड़ा का निवारण करते हैं रोग को पूरा समाप्त नहीं करते।

किसी के प्रोपगेंडा को काटने के लिए सूचनाओं में भले ही आज हम भारी पड़ें किंतु ज्ञान के भंडार पर आज भी वामियों का कब्जा है।

रामचंद्र गुहा एक दिन बीफ खाकर मर जायेगा उसका ‘वायरल’ चित्र और उसपर पड़ी हमारी गालियां भी फेसबुक ट्विटर और व्हाट्सएप के किसी सर्वर में अनन्त फाइलों के नीचे दब जाएंगी उन्हें कोई पूछने न जाएगा। जो जीवित रह जायेगा वह हैं दूकानों पर सजी गुहा की पुस्तकें और वह अवधारणा जिससे ग्रसित होकर वे लिखी गईं थीं।

वामपंथ वस्तुतः अपने भिन्न-भिन्न रूपों में मनोवैज्ञानिक संकुचन की एक अवस्था है जिसकी व्यवस्था राम गुहा जैसे लेखकों ने बड़ी मेहनत से बनाई है। यह व्यवस्था शिक्षा के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी नए ‘एडिशन’ के रूप में हस्तांतरित होती रही है।

इस व्यवस्था से निकलना एक चुनौती है तथा स्वतंत्र मुक्त चिंतन की सनातनी व्यवस्था खड़ी करनी है जिसे राष्ट्रवादी खेमा समझता तो है किंतु स्वीकार नहीं करता। राष्ट्रवादी खेमा इसी दिवास्वप्न में है कि एक दिन भगवान अवतार लेंगे और सब ठीक हो जाएगा।

यहाँ तो ऐसे भी लोग हैं जो अर्थतन्त्र पर कब्जा कर लेने को ही ‘ज़मीनी काम’ समझ कर कर्त्तव्यों से इतिश्री कर लेते हैं। वे ज्ञानतंत्र पर अधिकार की बात ही नहीं करते।

मैं फिर कहता हूँ कि राम गुहा उसी गिरोह का सदस्य है जो अपने गुर्गों को जोड़े रखने के लिए बीफ खाता चित्र साझा करता है। उसे हमारी गालियों से अंतर नहीं पड़ता।

व्यक्ति धरती पर आता है और चला जाता है किन्तु जो चिर सनातन है वह है ‘ज्ञान’। हमारी ज्ञान परम्परा का उद्धार कब होगा इस पर चिंतन कीजिए, गुहा को जो खाना है वो खायेगा ही।

काँग्रेस और गो-वध बंदी का पाखंड

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