स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी के बहाने

लौह पुरुष पटेल तीन समय में काफी चर्चित रहे। पहला था देशी राज्यों के विलयन का काल, दूसरा बापू की हत्या के बाद एक संगठन पर प्रतिबंध लगाने पर और तीसरा मोदी जी के आह्वान के बाद कि लौह पुरुष की प्रतिमा के लिये जनता अपने घरों से लोहे का दान करें।

इसके अलावा वे भी भारत के अन्य स्वतंत्रता सेनानियों की तरह इतिहास और सामान्य ज्ञान की किताबों का हिस्सा बन गये।

आज का सच ये है कि हमारे पास विश्व की सर्वोच्च प्रतिमा है और हमारे एक राजर्षि उससे भी बड़ी मर्यादा पुरुषोत्तम राम की तो कुछ यदुवंशी कृष्ण की मूर्ति बनाने की घोषणा कर चुके हैं और मुझे विश्वास है कि रामजन्म भूमि/ कृष्णजन्म भूमि विवादास्पद रहे या न रहे, पर राम-कृष्ण बनकर रहेंगे।

पचासा पूरा कर रहे अविवाहित युवा के पास भी एक मौका है कि अपने सद्यः घोषित कौल वंश और दत्तात्रेय गोत्र की परंपरा निवाहते हुए काशी में शिव की इन सबसे बड़ी प्रतिमा की घोषणा कर दें। क्या पता भोले भंडारी बहुमत या बहू में से कुछ दे ही दें।

खैर ये तो थी मज़ाक की बात, पर इस स्टैच्यू आफ़ यूनिटी के अनावरण के साथ ही एक शिगूफ़ा चला कि इस में लगे तीन हज़ार करोड़ रुपये को लोहे में ढालने के बजाय 15-15 लाख तो हर भारतीय को देकर अपने ज़ुमले को सच का ज़ामा तो पहनाया ही जा सकता था।

पता नहीं क्यों, पर मैं व्यक्तिगत रूप से इस तर्क से विचलित हुआ और ये मान बैठा कि जिस देश में इतनी गरीबी, अशिक्षा, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और कुपोषण आकंठ समाज को डुबाए हो वहाँ ऐसी घटनाएँ कुछ वैसी ही है जैसे एक भूखे बच्चे को ओस में भीगा गुलाब सुँघा कर उसमें सांस्कृतिक चेतना जगाने की कोशिश की जाये।

फ़िर याद आया त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति ढहाने पर किया गया हंगामा जिससे असहिष्णुता की बुझते हवन कुण्ड में जैसे घृत की आहुति पड़ गई और और तमाम बुद्धिजीवी रुदाली की तरह रोने को तैयार हो गये। कुछ अवार्ड भी वापस होते पर तब तक स्टॉक खत्म हो चुका था क्योंकि त्यागियों ने त्याग कर दिया था और बाकियों की चेतना लौट आई थी कि सब माया है।

पर मेरा सवाल अब भी अनुत्तरित है कि अगर पटेल की प्रतिमा अपव्यय है तो त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति जनता के पैसे का सदुपयोग कैसे था जिसके अनैतिक ध्वंस पर कई रुदालियाँ टेसुए बहाने को तैयार थीं। मूर्ति सबकी बेकार है चाहे भगत की हो या जार्ज पंचम की, शेर की या कुत्ते की, देवी की या महिषासुर की, थलाइवा की या सचिन की। सब पर आज या कल आखिरकार सिर्फ़ परिन्दे ही बीट करेंगे।

लेनिन की मूर्ति तो सेण्ट पीटर्सबर्ग में भी थी और बोरिस येल्त्सिन की जीत के बाद टुकड़े टुकड़े कर दी गयी, कभी उस पर भारतीय साम्यवादी आँखें बरसीं या नहीं, पता नहीं… और तो और बुद्ध को गोद लिया हुआ बाप मानने वाला चीन भी बामियान में उनके चिथड़े उड़ता देख कर भी अपनी आर्थिक और औपनिवेशिक लाभ देखता हुआ खामोश ही रहा।

मान लिया हम भारतीय बेवकूफ़ हैं कि पड़ोसी के फ़ोड़े होने पर अपनी बाँहों पर डिटॉल लगा लेते हैं पर रूस-वासी तो अत्यधिक बुद्धिजीवी थे क्योंकि उस मुंगेरीलाल के सपने को वहाँ सच किया गया जो मानता था कि धर्म अफ़ीम है और दुनिया के मज़दूरों एक हो जाओ। आखिर लेनिन की विशालकाय प्रतिमा बनाई क्यों और बनाई तो फिर ढहाई क्यों? ऐसे मुद्दों पर पूरा साम्यवादी कुनबा पिन ड्रॉप साइलेन्स का उदाहरण बन जाता है।

एक आम सोच है और सच भी कि मूर्तियाँ उसी देश में बहुतायत में पाई जाती जहाँ किसी धर्म को दिल से मानने वाली जनता हो जैसे चीन, जापान, कंबोडिया, इंडोनेशिया, थाइलैण्ड, मारीशस आदि, हाँ अपना भारत भी।

अब सवाल है कि साम्यवादी देशों में इन नेताओं की मूर्तियों की क्या ज़रूरत, जनता के धन का अपव्यय क्यों? तो मैं ये बताना चाहूँगा कि जहाँ विचार या आदर्श एक अमूर्त भाव हैं वहीं विचारक की मूर्ति एक मूर्त सामग्री। छोटे से अमीबा का बड़ा सा काल्पनिक चित्र आपको अमीबा से थोड़ा बेहतर जोड़ता है जबकि अमीबा के बारे के कही गई सारी सच बातें आपमें उतना जुड़ाव पैदा नहीं कर सकती हैं।

कभी आपने सोचा है कि बड़े बड़े कॉलेजों, विश्वविद्यालयों के प्रवेश द्वारों में मोटे मोटे विशालकाय खंभे क्यों बने होते हैं? ये स्तंभ आने वाले छात्रों को प्रतीकात्मक रूप से यह आश्वस्त करता है कि यहाँ उन्हें विशाल, अथाह, अबूझ और अपरिमित ज्ञान की प्राप्ति होगी जैसा कि इन खंभों की विशालता है।

हम यह मान सकते हैं कि बोधि वृक्ष की विशालता का भी बुद्ध के कैवल्य प्राप्ति में थोड़ा योगदान तो रहा ही होगा। साम्यवादी विचारकों ने भी अपने नेताओं की विशाल प्रतिमाएँ बनाई हैं कि उनके विचारों की विशालता को भी आम रियाया महसूस कर सके।

दबे कुचले तबके की आवाज़ बनने की कोशिश और उनका हक़ दिलाने का दिखावटी जुनून साम्यवाद का सबसे बड़ा यूएसपी है जो छात्र मन को बहुत मोहता है और येन केन प्रकारेण बौद्धिक जगत को पूर्णतया प्रभावित भी करता है।

इतिहास लेखन में भी दक्षिण पन्थ लगभग अपना इकतरफा झुकाव रोक नहीं पाता, वहीं अरुणाचल प्रदेश पर चीन का हक़ और जम्मू कश्मीर को आज़ादी का हक़ दिलवाने को न्यायोचित मानने वाला साम्यवाद फ़्रान्स के शार्ली एब्दो कांड, चेचेन्या और उत्तर कोरिया के वामाचार, ईराक में यजीदियों और पाकिस्तान में बलूचों पख्तूनों पर अत्याचार के मामले पर युधिष्ठिर वाला “नरो वा कुंजरो वा” का भाव समेटे रहता है।

इस विचार को फैलाने के लिये कला संस्कृति का रास्ता उसने खुला छोड़ रखा है और आप पायेंगे कि जिन सामान्य विश्वविद्यालयों में लेखक की कोटि के छात्र पढ़ा करते हैं वहाँ का फ़ाइन आर्ट और परफ़ार्मिन्ग आर्ट का विभाग बस कागज़ों पर ज़िन्दा है और नचनियां-बजनियां विभाग की शोहरत हासिल कर पाता है, पर आम तौर पर केन्द्रीय विश्वविद्यालयों जैसे जेएनयू, विश्वभारती, एएमयू आदि या ऐसे विश्वविद्यालय जो खुद को आम से खास मानने लगे जैसे माइनॉरिटी, धार्मिक या सांस्कृतिक दंभ से भरे विश्वविद्यालय जैसे ईसाइयों, सिखों, जैनों या आर्यसमाजियों की यूनिवर्सिटी, पटना विश्वविद्यालय जैसे विवि जो मुट्ठी भर चुनिन्दा मेधावियों को सहेज़ कर अपनी श्रेष्ठता के मद में चूर रहते हैं; ऐसे जगहों पर ये नचनियां-बजनियां विभाग पल्लवित व पुष्पित होते रहते हैं।

यहां वामपंथी छात्र संघों का बोलबाला रहता है और इस विधा के छात्र पूरे भारत में मूर्तियां बनाने का सिंडिकेट बनाये रखते हैं। गया के पथरकट्टी और जयपुर, जबलपुर आदि के संगतराश तो इनके मनरेगा प्रक्रिया के वैतनिक गुलाम हैं। ये निविदा लेते हैं, साँचे बनाते हैं, दर तय करते हैं, पूँजीपतियों, सेठों, नेताओं, देवी देवताओं की मूर्तियाँ अपनी शर्तों पर इन गरीब पत्थर-तराशों के हाथों बनवाते हैं और खुद बिचौलिये का काम करते हैं क्योंकि ऐसे कस्टमर इन बड़े बड़े विभागों में मनचाही मूर्तियाँ बनवाने या ढलवाने की मतलब क्वालिटी काम की उम्मीद रख कर आते हैं और इन छात्रों, प्रोफ़ेसरों की उम्दा कारीगरी की वज़ह से मनमाफ़िक सेवा (मूर्तियों के रूप में) पाते भी हैं।

मज़े की बात कि इन्हीं पूँजीपतियों, सेठों, नेताओं के चमचों या देवी देवताओं के भक्तों से पैसा लेकर फिर ये नुक्कड़ नाटक करते हैं कि धर्म अफ़ीम है। कोई हैरानी नहीं होनी चाहिये कि अगर राम मंदिर बना तो कई खम्भे या सारे खम्भे इन्हीं वामपंथी विभागों के जाये लाल रंग में अंदर बाहर रंगे युवाओं की छेनी और हथौड़ों की चोट या इन्हीं की डिज़ाइन पर भाड़े के कारीगरों के हाथों बने हों जो प्रत्यक्ष में नुक्कड़ नाटक करके राम मंदिर निर्माण को भारत के सेक्यूलर ताने बाने के लिये हानिकारक बता रहे हैं।

पटेल ढाले गये पर वो ढालने वाली भट्ठी नहीं दिखी, राम भी ढलेंगे और शिवाजी महाराज भी। अकबर, शाहजहां और औरंगज़ेब भी ढल गये होते अगर कुरआन शरीफ़ या शरीअत ने ज़िन्दा इन्सानों के मुज़स्सिमे को कुफ़्र करार न दिया होता। पर ये सब ढलेंगे साम्यवादी मूर्तिकारों की डिज़ाइन पर किसी ऐसे ही देश में कारण अपने यहाँ तो रोटियाँ पकाने को चूल्हा हर घर को मयस्सर नहीं तो ये बड़ी बड़ी भट्ठियाँ कौन बनाये और बाद में इनका हश्र क्या हो।

तो बस इतना ही कहना था कि ये मूर्ति विवाद भी वामपंथी प्रॉडक्ट ही है क्यों कि ये पहले ये मूर्ति बनाने का टेण्डर लेते हैं, बनाकर डेलिवर करते हैं, पैसा लेते हैं और फ़िर करते हैं मूर्ति बनाने में की गई सरकारी फ़िजूलखर्ची की खबर जनता तक पहुँचाने के लिये रैलियाँ, नुक्कड़ नाटक और फ़ाइव स्टार होटलों में कॉन्क्लेव भी।

आप को पता हो कि लक्ष्मी, गणेश, वैष्णो देवी, साईंबाबा आदि की मूर्तियां आमतौर पर चीन से आ रही हैं जिनके शासन का मूल कथन है धर्म अफीम है पर पड़ोसी को अफीम बेचकर पैसा कमाना… क्या है आप सब सोचिए।

आपका पैसा आप पर वार। आप सोचते रहिये अबकी बार किसकी सरकार।

पाकिस्तानी पत्रकार की टिप्पणी को चरितार्थ कर रहा है कांग्रेस का आचरण

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